कालाधन के रूप अनेक

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

प्रख्यात लेखक रोहिंग्टन मिस्त्री ने अपने उपन्यास ‘फैमिली मैटर्स’ में एक जगह लिखा है कि काला धन हमारी सफेद अर्थव्यवस्था में इस तरह से पैबस्त है, मानो दिमाग के बीचो-बीच ट्यूमर हो गया हो; अगर आप इसे हटाने की कोशिश करेंगे, तो रोगी मर जायेगा. लेकिन, यह भी एक समझ है कि जब तक सांस है, तब तक आस है. कालेधन को बाहर लाने या उस पर अंकुश लगाने के लिए सरकारें समय-समय कुछ करतब करती रहती हैं और कानून बनाये जाते हैं. फिलहाल इस सिलसिले की कड़ी में हम नोटबंदी और निश्चित मात्रा में सोना रखने की कवायद को देख रहे हैं. आय और संपत्ति के संबंध में कानून हमेशा से रहे हैं और गाहे-बगाहे उनमें संशोधन भी होते रहते हैं तथा जरूरत पड़ने पर नये कानून भी बनाये जाते हैं. भ्रष्टाचार से संग्रहित या कर चोरी से जुटाये गये धन को खपाने का एक बहुत पुराना तरीका बेनामी संपत्ति है. ऐसी संपत्तियां धन निवेश करनेवाला व्यक्ति किसी दूसरे के नाम से खरीद लेता है ताकि वह कानून की नजर से बच जाये. नवंबर के महीने से सरकार ने बेनामी संपत्ति के मालिकों पर सख्ती करने का संशोधित कानून भी लागू कर दिया है. बेनामी संपत्ति से संबंधित 1988 के पुराने कानून में इस साल अगस्त में संशोधन किया गया था. इस कानून में दोषियों के लिए पांच से सात वर्षों के कारावास और अर्थदंड की व्यवस्था है. सरकार को बेनामी संपत्ति जब्त करने का अधिकार है. इसमें यह भी प्रावधान है कि सरकार समाज कल्याण के लिए सक्रिय ट्रस्टों और धार्मिक संगठनों को छूट भी दे सकती है.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि बेईमानी से कमाये धन का बड़ा हिस्सा अचल संपत्तियों में निवेशित कर दिया जाता है. इसी वजह से जानकारों ने बार-बार यह कहा है कि नोटबंदी से कालेधन की समस्या पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि नकद धन इस हिसाब-किताब का पांच-छह फीसदी हिस्सा ही है. वित्तीय संस्था मॉर्गन स्टेनली के भारत प्रमुख रिधम देसाई ने हाल में एक साक्षात्कार में कहा है कि बरसों से एकत्र हो रहे काले धन ला बड़ा भाग अचल संपत्तियों और सोने के रूप में है. लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या बेनामी संपत्तियों को पकड़ पाना आसान होगा. भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कानून तो पहले से ही रहे हैं, और कालेधन को खपाने की प्रक्रिया में लेन-देन के कागजात भी उन कानूनों के अनुरूप तैयार किये जाते हैं. कानूनी प्रक्रिया के अपने पेंच हैं और हमारा प्रशासनिक तंत्र भी भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है जिसका राजनीतिक और आर्थिक जगत से गहरा संबंध है.

यह भी सोचा जाना चाहिए कि क्या कुछ संपत्तियों को जब्त कर और कुछ भ्रष्ट लोगों को दंडित कर ऐसे धन को बाहर लाया जा सकता है. एक मुश्किल यह भी है कि बेनामी संपत्तियों का ठीक-ठाक अंदाजा हमारे पास नहीं है. वर्ष 1991 में नव-उदारवादी नीतियों के लागू होने से और अभी तक चल रही सुधार प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप धन के निवेश के नये-नये तरीके सामने आये हैं. अचल संपत्तियों में निवेश परंपरागत तरीका है. कालेधन का मालिक अब शेयरों और इक्विटी निवेश के जरिये धन को तेजी से बढ़ा सकता है. वह बाहर के देशों में बनीं फर्जी कंपनियों के मार्फत अपने धन को काले से सफेद कर सकता है. उस धन को भारत में निवेशित कर सकता है. कानूनों के संजाल और भ्रम का फायदा उठाकर वह देश में भी कंपनियां बना कर अपने धन को पार्क कर सकता है.

लेकिन, यह कहने का अर्थ यह नहीं है कि बेनामी संपत्तियां कम हैं या उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए. कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए और सरकार की कोशिशों से उम्मीद भी रखना चाहिए. पर, सबसे पहले सरकार के पास एक अनुमान अवश्य होना चाहिए कि देश के भीतर और बाहर कितना कालाधन हो सकता है. अफसोस की बात है कि न तो मौजूदा सरकार के पास इसका कोई लेखा-जोखा है, और न ही पूर्ववर्ती सरकार के पास था. तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने 21 मई, 2012 को लोकसभा के पटल पर केंद्र सरकार की ओर से काले धन पर श्वेत-पत्र प्रस्तुत किया था. इसमें कालाधन की मात्रा के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गयी थी. सरकार का कहना था कि यह आकलन कर पाना बहुत मुश्किल है. इस दस्तावेज में जानकारी दी गयी है कि 2010 में भारत के प्रति स्विस बैंकों की देनदारी 7,924 करोड़ थी जो उन बैंकों की कुल देनदारी का 0.13 फीसदी था. हां, यह जरूर बताया गया था कि कालेधन को रोकने के लिए कुछ उपाय किये जाने चाहिए. उदाहरण के तौर पर, कर दरों का पुनरीक्षण और डिजिटल तकनीक के उपयोग से कर जमा करने में होनेवाले खर्च में कमी, काला धन उगाने वाले व्यावसायिक क्षेत्रों में आवश्यक आर्थिक सुधार, काला धन कारोबार को हतोत्साहित करने के लिए प्रयास जिनमें गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) जैसे पहल शामिल हैं, इसके अलावा प्रत्यक्ष कर प्रशासन के कामकाज में आवश्यक सुधार, लोगों में जागरूकता फैलाना और विदेशों में काला धन रखने वालों को एक बार मोहलत देना ताकि उनमें सुधार हो सके. संतोष की बात यह है कि मौजूदा मोदी सरकार भी इन पहलों पर जोर दे रही है. इन प्रयासों के परिणामों के लिए हमें कुछ समय इंतजार करना होगा.

50_inr_obs_lrपरंतु, इन पहलों से अधिक उत्साहित होने का भी कोई कारण नहीं है. फरवरी, 2012 में अंतरराष्ट्रीय पुलिस नेटवर्क इंटरपोल के प्रथम भ्रष्टाचार निरोधक सम्मेलन में बोलते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो के तत्कालीन निदेशक एपी सिंह कालेधन के अपराध में राजनेताओं की मिलीभगत की ओर संकेत करते हुए उन्होंने एक प्रसिद्ध मुहावरा प्रयुक्त करते हुए कहा था- ‘यथा राजा, तथा प्रजा’. काले धन और अवैध वित्तीय लेन-देन पर नजर रखनेवाली शोध संस्था ग्लोबल फाइनेंसियल इंटेग्रिटी ने भारत से बाहर गये काले धन पर 2010 में एक विस्तृत रिपोर्ट जारी किया था जिसमें 1948 से 2008 तक के अवधि में हुए धन की अवैध निकासी का ब्यौरा दिया गया था. इस रिपोर्ट के निष्कर्ष अत्यंत चौंकानेवाले थे. इन 60 वर्षों में भ्रष्टाचार, हवाला और आपराधिक गतिविधियों से अर्जित 462 बिलियन डॉलर की परिसंपत्तियां भारत से बाहर भेजी गयी हैं. इसका सीधा अर्थ यह है कि हर दिन लगभग 240 करोड़ रुपये देश से बाहर भेजे जा रहे हैं. यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि 1991 में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के दौर के बाद अवैध धन निकासी में बड़ी तेजी आयी है. इस बात का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 125 बिलियन डॉलर की संपत्ति सिर्फ 2000 और 2008 के बीच बाहर भेजी गयी है. हाल ही में लिश्टेंस्टीन बैंक, एचएसबीसी और पनामा घपले के दस्तावेज सामने आये हैं. कोबरापोस्ट ने खुलासा किया था कि अनेक बड़े देशी-विदेशी बैंक कालेधन को सफेद करने के काम में लिप्त हैं. नोटबंदी के बाद भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं.

संरचनात्मक सुधार के आर्थिक उदारीकरण के दौर में कर नीतियों में फेर-बदल हुए हैं और हो रहे हैं. इसके बावजूद कर चोरी, हवाला कारोबार में बढ़ोतरी और भ्रष्टाचार के बड़-बड़े मामले भी सामने आये हैं. पिछले दो दशकों में कॉर्पोरेट करों को 50 से 55 फीसदी से घटाते हुए 10 फीसदी के स्तर तक ला दिया गया है. इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार के सीधे व प्रत्यक्ष करों में भारी कटौती की गयी है. इसी प्रकार अप्रत्यक्ष करों में भी कमी हुई है. आर्थिक सुधारों से काले धन के कारोबार और भूमिगत अर्थव्यवस्था में कमी नहीं आयी है. वर्ष 2002 से 2006 के बीच हर वर्ष औसतन 16 बिलियन डॉलर अवैध तरीके से देश के बाहर भेजा गया. वर्ष 1995 के बाद टैक्स हेवन कहे जाने वाले द्वीपीय देशों में अधिक धन जमा होने लगा. ध्यान रहे, ये वही देश हैं, जहां से उस काले धन का बड़ा हिस्सा वैध रूप में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की शक्ल में वापस भारत में निवेशित कर दिया जाता है. कहा जाता है कि विदेशों में जमा अवैध धन देश की भूमिगत अर्थव्यवस्था का 72 फीसदी है. इस हिसाब से देश के सकल घरेलू उत्पाद का 50 फीसदी विदेशों में अंटका पड़ा है. यह भी एक अनुमान है कि काले धन का सिर्फ 27.8 फीसदी ही देश में है, इसका मतलब यह है कि अधिकांश जमाखोर सरकार और कानून की नजर से बचे रहने के लिए काला धन विदेशों में ही रखना पसंद करते हैं.            

बहरहाल, काले धन की समस्या चाहे जितनी बड़ी और जटिल हो, इस मामले में लगातार कोशिशों की जरूरत है, लेकिन यह बात भी ध्यान में रखने की जरूरत है कि इस मामले में जल्दी किसी परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती है. किसी सकारात्मक परिणाम तक पहुंचने में वर्षों लग सकते हैं और यह सब सरकार और एजेंसियों की ईमानदार कोशिशों पर निर्भर करेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार इस मुद्दे पर कुछ ठोस हासिल कर लेते हैं, तो समाधान के अनेक और रास्तों के खुलने की संभावनाएं बन सकती हैं.

(राष्ट्रीय सहारा के ‘हस्तक्षेप’ में इस लेख का संपादित अंश 4 दिसंबर, 2016 को प्रकाशित)

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