बिहार का व्यवस्थित शोषण

मोहन गुरुस्वामी

मोहन गुरुस्वामी दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी ऑल्टरनेटिव्स के संस्थापक अध्यक्ष तथा केंद्रीय वित्त मंत्रालय के पूर्व सलाहकार हैं. उनसे mohanguru[at]gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के लिए सवा लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की है. कुछ इसी तरह जुलाई महीने की 12 तारीख को उन्होंने जम्मू-कश्मीर के लिए एक लाख करोड़ का पैकेज देने की बात कही थी. ऐसे में पहला सवाल यही उठता है कि देश के सबसे गरीब और पिछड़े राज्य को भी जम्मू-कश्मीर के लगभग बराबर पैकेज क्यों दिया जा रहा है. जम्मू-कश्मीर में गरीबी कम है, जबकि बिहार देश का सर्वाधिक गरीब और पिछड़ा राज्य है. बिहार की आबादी 10.30 करोड़ है, जबकि जम्मू-कश्मीर की जनसंख्या 1.25 करोड़ है. बिहार कम्मू-कश्मीर से आठ गुना बड़ा और कई गुना गरीब है. बिहार में प्रति व्यक्ति आय 29 हजार है, तो जम्मू-कश्मीर की 58 हजार. इसमें न्याय कहां है? क्या इसका मतलब यह है कि बिहार भी केंद्र सरकार का ध्यान खींचने के लिए उग्रवाद-प्रभावित हो जाये? स्पष्ट है कि बिहार की अवहेलना जारी है. अगर केंद्र सरकार में समता की भावना होती, तो वह जम्मू-कश्मीर के स्तर पर नहीं, तो कम-से-कम राष्ट्रीय औसत के हिसाब से मदद अवश्य देती. उस स्थिति में पैकेज की धनराशि पांच लाख करोड़ होती.bihar

यह कोई नयी कहानी नहीं है. प्रथम पंचवर्षीय योजना के समय से ही बिहार को केंद्रीय कोष से उसका समुचित और आवश्यक हिस्सा नहीं देकर राज्य का निरंतर शोषण किया गया है. उस योजना में सिंचाई के लिए राष्ट्रीय स्तर पर 29,106.30 लाख रुपये तय किये गये थे. इसमें पंजाब को 10,952.10 लाख यानी 37.62 फीसदी मिला. इसके बरक्स बिहार को मात्र 1,323.30 लाख यानी 4.54 फीसदी ही मिल सका था.

ऐसा अब भी हो रहा है. वर्ष 2010 में अविभाजित आंध्र प्रदेश का योजनागत आवंटन 30 हजार करोड़ का था, जबकि तुलनात्मक रूप से अधिक आबादी और गरीबी वाले राज्य बिहार के लिए यह मात्र 14 हजार करोड़ थी. मोदी से यही सवाल है कि क्या बिहार को राष्ट्रीय औसत तक लाने की उनकी कोई योजना है या ऐसा ही चलता रहेगा? अगर राज्य की प्रगति नहीं होगी, तो भारत भी कभी विकसित न हो सकेगा. यह एक सच है. आप भारत के 10वें हिस्से को पीछे छोड़ आगे नहीं जा सकते हैं. बिहार देश के लिए चक्की का पत्थर बन चुका है.

बिहार में हालात इसलिए खास हो जाते हैं क्योंकि भारत का यही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां इसके हर हिस्से में उच्च स्तर की गरीबी (46-70%) एक समान रूप से पसरी हुई है. बिहार की सालाना प्रति व्यक्ति आय 27,202 हजार है जो 68,000 रुपये के राष्ट्रीय औसत का 40 फीसदी ही है. बिहार एकमात्र ऐसा राज्य है जिसकी अधिकतर आबादी अशिक्षित है. राज्य में यह आंकड़ा 52.47 फीसदी है.

लेकिन बिहार के हिस्से में चमकदार बिंदु भी हैं. राज्य में शिशु मृत्यु दर अभी प्रति एक हजार में 62 है, जो 66 के राष्ट्रीय स्तर से थोड़ा नीचे है. पर, दिलचस्प बात यह है कि यह दर न सिर्फ उत्तर प्रदेश (83) और उड़ीसा (91) जैसे राज्यों से, बल्कि आंध्र प्रदेश और हरियाणा (दोनों राज्यों में दर 66 है) से भी बेहतर है. जीवन प्रत्याशा के मामले में भी एक औसत बिहारी पुरुष राष्ट्रीय औसत (62.4 वर्ष) से एक वर्ष अधिक (63.6 वर्ष) जीता है. पिछले तीन सालों में जीवन अवधि बढ़ाने में राज्य का प्रदर्शन अधिकतर राज्यों से बेहतर रहा है.

बिहार में 7.04 मिलियन हेक्टेयर भूमि सिंचित है और पैदावार का औसत 1,679 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. हालांकि यह 1,739 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के राष्ट्रीय औसत से कम है, परंतु छह अन्य राज्यों से बेहतर है जिनमें कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे बड़े कृषि राज्य शामिल हैं. इसके बावजूद बिहार सामाजिक-आर्थिक मामलों में कुल मिलाकर बहुत बुरी दशा में है.

पिछले तीन वर्षों में 7,935 रुपये के अखिल भारतीय प्रति व्यक्ति विकास खर्च के विपरीत बिहार में यह खर्च मात्र 3,633 रुपया ही है, जो आधे से भी कम है. विकास खर्च कई कारकों पर निर्भर होते हैं जिनमें राज्य का राष्ट्रीय कोष में योगदान भी शामिल है. लेकिन कोई भी तर्क इस बात का स्पष्टीकरण नहीं दे सकता है कि दसवीं योजना में बिहार का यह खर्च 2,533.80 रुपया ही क्यों था जो गुजरात (9,289.10 रुपया), कर्नाटक (8,260 रुपया) और पंजाब (7,681.20 रुपया) से बहुत ही कम है. यही रूझान 11वीं और 12वीं योजना में भी जारी रहा है.

एक साधारण, पर उचित आर्थिक तर्क हमें बताता है कि जब कोई क्षेत्र पिछड़ा हुआ हो, तो उसकी प्रगति और विकास के लिए अधिक मात्रा में निवेश की जरूरत होती है. यह ठीक उसी तरह है, जैसे परिवार के कमजोर या बीमार बच्चे को बेहतर पोषण और ज्यादा देखभाल मुहैया कराया जाता है. ऐसा सिर्फ जानवरों में देखा जाता है, जहां सबसे मजबूत ही बचता है तथा कमजोर और विकलांग की अवहेलना की जाती है, उसे वंचित रखा जाता है तथा अक्सर मार भी दिया जाता है. इसके बावजूद आर्थिक और सामाजिक जरूरत के मुताबिक अतिरिक्त सहायता, जो उसका अधिकार भी है, की जगह हम देख सकते हैं कि बिहार को लगातार इंकार का सामना करना पड़ रहा है.

अत्यंत न्यून प्रति व्यक्ति निवेश से यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार बिहार को बहुत कम आवंटन कर उसे निरंतर वंचित कर रही है. यह भी है कि बहुत लंबे समय तक बिहार को केंद्र सरकार से राजनीतिक विरोध का खामियाजा भी भुगतना पड़ा है. वर्ष 1992 से 2015 तक यही स्थिति रही है. तब भी, परियोजनाओं के पूरा होने के मामले में 11वीं योजना में बिहार ने कई राज्यों से बेहतर प्रदर्शन किया था. इसने 66,000 करोड़ यानी 109 फीसदी खर्च किया जबकि पड़ोसी छत्तीसगढ़ ने सिर्फ 73 फीसदी और आदर्श राज्य गुजरात ने 96 फीसदी खर्च किया. इससे आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि बिहार का सकल घरेलू उत्पादन विकास दर 22 फीसदी रहा था, जबकि गुजरात में यह दर 16 फीसदी ही था. जो राज्य राजनीतिक रूप से केंद्र के नजदीक रहे, उन्हें बेहतर केंद्रीय सहायता मिली. आंध्र प्रदेश इस बात का उदाहरण है. वर्ष 2012-13 में बिहार को केंद्र से 5,088 करोड़ मिले थे, जो सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को मिली कुल सहायता का 5.42 फीसदी था. इसकी तुलना में आंध्र प्रदेश को 15,542 करोड़ मिले थे.

आर्थिक रूप से बिहार का गला घोंटने का परिणाम राज्य सरकार की चार बड़ी विकास परियोजनाओं में बहुत कम निवेश के रूप में देखा जा सकता है. सड़क पर बिहार का प्रति व्यक्ति खर्च 44.60 रुपया है जो राष्ट्रीय औसत (117.80 रुपया) का सिर्फ 38 फीसदी है. इसी तरह सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण पर बिहार महज 104.40 रुपये प्रति व्यक्ति खर्च करता है जबकि इस मद में राष्ट्रीय औसत 199.20 रुपया है. अब सवाल यह है कि बिहार ने कितना ‘छोड़’ दिया है? अगर आवंटन के प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय औसत के हिसाब से देखा जाये तो 10वीं पंचवर्षीय योजना में बिहार को 48,217 करोड़ रुपये मिलने चाहिए थे, जबकि उसे 21 हजार करोड़ ही आवंटित हुए थे. यदि पहली योजना से जोड़ा जाए, तो बिहार की कुल कमी 10 लाख करोड़ बैठती है. यह बहुत बड़ा नुकसान है, लेकिन हमारे बेपरवाह प्रधानमंत्री ने अपने चिर-परिचित बड़बोलेपन के अंदाज में सिर्फ सवा लाख करोड़ के पैकेज की बात कही है. आइए, इस संख्या का विश्लेषण करते हैं और देखते हैं कि सही मायनों में इसमें बिहार को क्या मिला है.

सवा लाख करोड़ के पैकेज में 54,713 करोड़ राजमार्गों के लिए, 21,476 करोड़ पेट्रोलियम और गैस के लिए, और 2,700 करोड़ हवाई अड्डों के लिए हैं. राजमार्ग बिहार से होकर ही गुजरेंगे क्योंकि दिल्ली से कोलकाता को या उत्तर भारत को पूर्वी भारत से जोड़ने का और कोई रास्ता नहीं है. यह राष्ट्रीय योजना का हिस्सा है. इसे बिहार की योजना बताना कुछ फर्जी बात है. अगर बिहार के पास उद्योग और अर्थव्यवस्था होती, तो राजमार्ग उसके लिए उपयोगी हो सकते थे. बिहारियों को सड़क बनाने में मजदूरी जैसे काम जरूर मिल सकते हैं, लेकिन इनका निर्माण बाहर की कंपनियां ही करेंगी. इससे जो तात्कालिक आर्थिक लाभ होगा, वह गुजरनेवाले वाहनों के लिए चाय-समोसा बेचना होगा.

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के बारे में प्रधानमंत्री की घोषणा और भी अधिक कमजोर है. इसे सबसे पहले 2013 में यूपीए सरकार ने घोषित किया था. इसके तहत गेल 2,050 किलोमीटर लंबी हल्दिया-जगदीशपुर पाइपलाइन बना रही है जिससे प्राक्रुतिक गैस का संचरण और वितरण होगा. यह पाइपलाइन बिहार के 14 जिलों से होकर गुजरेगी. इसका मेनलाइन चार जिलों- कैमूर, रोहतास, औरंगाबाद और गया से तथा सहयोगी लाइनें 10 अन्य जिलों से होकर गुजरेंगी. गेल इस रास्ते के बड़े शहरों में सिटी गैस वितरण की संभावनाओं को भी टटोलेगा. इसमें बिहार के भीतर गैस आपूर्ति पर कुछ भी निश्चित नहीं है. यह भी गुजरने का एक रास्ता भर हो सकता है.

हवाई अड्डों की योजना तो और भी भ्रामक है. देश के नये हवाई अड्डों में से आधे का इस्तेमाल नहीं हो रहा है. ऐसे में सीतामढ़ी और दरभंगा की उड़ान कौन भरेगा?

जो धन बिहार और बिहारियों पर और उनके लिए खर्च किया जाएगा, वह करीब 38 हजार करोड़ रुपया है. इसकी तुलना मोदी के जम्मू-कश्मीर को देने के वादे के साथ करें. बिहार को दिया गया ‘आवंटन’ मौजूदा पंचवर्षीय योजना का हिस्सा भर है. इसमें कुछ भी नया नहीं है. जो है, सो मोदी की चिर-परिचित हवाबाजी और जुमलागिरी है. अगर मोदी सही मायने में गंभीर होते, तो उन्हें आज भी बिहार से हो रहे वित्तीय पलायन की चिंता करनी चाहिए थी.

बिहार को मौजूदा क्रेडिट/डिपॉजिट अनुपात का लाभ उठाने के लिए बैंकों से ऋण के रूप में एक लाख करोड़ मिलना चाहिए था, जबकि उसे सिर्फ छह हजार करोड़ ही मिले हैं. बिहार का यह अनुपात 29 है, जबकि हरियाणा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु का क्रमशः 102, 110 और 116 है. बिहार का यह अनुपात देश में सबसे कम है. इससे स्पष्ट है कि देश के सबसे गरीब राज्य से पूंजी का बड़ा पलायन हो रहा है. यह एक क्रूर विडंबना है. एक दुष्चक्र है. सच तो यह है कि बिहार को व्यवस्थित तरीके से शोषित किया जा रहा है और केंद्रीय कोष से उसके अधिकार को न देकर उसे तबाह किया जा रहा है.

प्रधानमंत्री को अगर बिहार की जरूरत का अहसास होता, तो वे सवा लाख करोड़ की जगह पांच लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा करते. अगर प्रधानमंत्री बिहार के सच का सामना नहीं करना चाहते हैं और समुचित कदम उठाने में हिचक रहे हैं, तो उनकी सोच और समझ पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं. जरूरत इस बात की है कि बिहार के दोहन का सिलसिला रूके और उसका उचित हिस्सा राज्य को दिया जाए.

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