‘नी ऊथाँ वाले टूर जाण गे’

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

अमिताभ बच्चन और रेखा की कहानी एक दूसरे के बिना अधूरी है, चाहे यह कहानी उनके कैरियर की हो या ज़िंदगी की. इनके बारे में जब भी सोचता हूँ तो कहीं पढ़ा हुआ वाक़या याद आ जाता है. बरसों पहले एक भारतीय पत्रकार दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला से साक्षात्कार कर रहे थे. बातचीत के दौरान उनके प्रेम संबंधों पर सवाल पूछ दिया. तब मंडेला और मोज़ाम्बिक के पूर्व राष्ट्रपति की बेवा ग्रासा मशेल के बीच प्रेम की खबरें ख़ूब चल रही थीं. असहज राष्ट्रपति ने पत्रकार से कहा कि उनका संस्कार यह कहता है कि वे अपने से कम उम्र के व्यक्ति से ऐसी बातें न करें. अमिताभ और रेखा के व्यक्तिगत संबंधों पर टिप्पणी करना मेरे लिए उस पत्रकार की तरह मर्यादा का उल्लंघन होगा. जन्मदिन की बधाई देने (10 और 11 अक्टूबर ) के साथ उन दोनों से इस के लिए क्षमा मांगता हूँ.

फ़िल्मी सितारों के प्रेम-सम्बन्ध हमेशा से चर्चा का विषय रहे हैं. सिनेमा स्टडीज़ में दाख़िले से पहले इन चर्चाओं को मैं भी गॉसिप भर मानता था लेकिन पहली कुछ कक्षाओं में ही यह जानकारी मिली कि फ़िल्म इतिहास, जीवनी, स्टारडम, पब्लिसिटी, फ़ैन्स, प्रोडक्शन आदि से सम्बंधित शोध में ये गॉसिप स्रोत और सन्दर्भ के तौर पर गंभीरता से लिए जाते हैं. मंटो और बाबुराव पटेल के गॉसिप-लेखों के बिना तो 1940 और 1950 के दशक का तो इतिहास ही नहीं लिखा जा सकता है. जब कभी बॉम्बे सिनेमा के गॉसिपों को कोई सूचीबद्ध करेगा तो यह पायेगा कि बड़े लम्बे समय तक अपनी छवि, लोकप्रियता और लगातार काम के साथ छाये रहने वाले अमिताभ बच्चन और रेखा के तीन दशक पहले के संबंधों से जुड़े गॉसिप भी लगातार चलन में रहे और चाव से सुने-कहे-पढ़े जाते रहे हैं. अभी कुछ दिनों से उनके एक साथ हवाई जहाज़ में होने की तस्वीर चर्चा में है.

रेखा की कहानी परदे पर और फ़्लैश की चमक में दमकते ‘अल्टीमेट दिवा’ के खूबसूरत चेहरे के पीछे छिपे उसके मन की व्यथा की मार्मिक दास्तान है. उनके माता और पिता शादीशुदा नहीं थे, पिता ने बेटी को बेटी तब माना जब वह बड़ी हो गई थी. वे यह भी कहते रहे कि बेटी की वज़ह से ही उनके और उसकी माता के बीच दूरियाँ बनी रहीं. बेटी अपनी ‘कल्पना’ में तो पिता से बात करती रही लेकिन जब वे मरे तो अंतिम संस्कार में नहीं गई. पिता की चिता सुदूर दक्षिण में जलती रही. बेटी की आँखें हिमाचल की वादियों में बरसती रहीं. लेकिन उन्हें वह कभी माफ़ नहीं कर पाई. बाद में टेलीविज़न पर जब इस बारे में उनसे पूछा गया तो उनके चेहरे पर उदास ख़ामोशी पसर गई. इन तमाम बरसों में उनको अपनी माँ के दुःख का अहसास तो था ही उनके अपने दुःख भी कुछ कम न थे. पिता के प्रेम से मरहूम वह फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध में भरोसे का कंधा खोजती रही. भरोसे टूटते रहे.silsila

चाँद तनहा है आसमाँ तनहा
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तनहा

ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तनहा है और जाँ तनहा

मीना कुमारी ने तो जाते-जाते अपना दर्द कह दिया, रेखा अब कुछ नहीं कहतीं. पहले कह देती थीं. पिता के बारे में भी और प्रेम के बारे में भी. 1970 के दशक के आख़िरी और 80 की दहाई के शुरूआती सालों में उनके और बच्चन साहब के संबंधों की बड़ी चर्चा थी. दोनों कैरियर के शिखर पर थे. कई सफल फ़िल्मों में साथ काम कर चुके थे. ज़िंदगी में परदे के पीछे चल रही कहानी सिलसिला बनकर परदे पर भी आ चुकी थी. यह इस जोड़ी की आख़िरी फ़िल्म थी. असल जीवन में भी प्रेम परेशानी में था. बालज़ाक ने लिखा है कि स्त्री अपने प्रेमी के चेहरे को उसी तरह जानती है जैसे नाविक समुद्र को जानता है. रेखा अपने प्रेमी के बदलते हाव-भाव को समझने लगी थीं. अब यह जो भी था- कोई बेचैनी, असुरक्षा की भावना या सबकुछ कह कर मन को हलका करने की कोशिश- रेखा ने एक साक्षात्कार (फ़िल्मफ़ेयर, नवम्बर 1984) में जीवन, प्रेमी, परिवार, हर चीज़ पर बेबाकी से बोल दिया.

तब वह तीस की हो रही थीं. कभी मिले तो वह साक्षात्कार ज़रूर पढ़िए. तब रेखा दो नहीं, दर्ज़न भर बच्चों की माँ होने की बात कर रही थीं. उन पर और उनकी माँ पर जो बीती थी उसको याद कर वो बिना शादी के बच्चे नहीं करने की बात कर रही थीं. अमिताभ बच्चन से अपने प्रेम पर इतरा रही थीं और कह रही थीं कि ‘इसे मत छापियेगा’ क्योंकि अमिताभ इससे ‘इनकार’ करेंगे और उनका ‘कैम्प’ बयान देगा कि ‘शी इज़ नट्स लाइक परवीन बाबी’. तब उन्होंने जया बच्चन पर भी कुछ टिप्पणी की थी.

बरसों बाद में एक आयोजन में जब रेखा ने जया बच्चन को गले लगाया होगा तो दोनों के मन में कितना कुछ टूटा और बना होगा! क्या समय सचमुच कुछ घाव भर देता है या उन पर भावनाओं की नई मरहम लगा जाता है! इस टूटने-बनने की शुरुआत के दो महीने बाद एक साक्षात्कार (BBC एशिया अगस्त 2010) में यश चोपड़ा के इस प्रेम कहानी पर फिर से चर्चा छेड़ देने से क्या असर पड़ा होगा! अगर आज जहाज़ में साथ होने की बात सही है तो इन दोनों ने छूटे वक़्त की दूरी को कैसे लांघा होगा! बारी निज़ामी के गीत में चले जाने वाले ऊँट के सवार क्या फिर आते हैं! अगर वे लौट भी आते हैं तो क्या मरुथल की विरहणी के पाँवों की टीस और दिल के कचोट का ईलाज हो जाता होगा! अच्छा होता कि यश जी वह बात ना करते. अच्छा होगा कि हम भी चुप हो जाएँ. निज़ामी कहते हैं कि इश्क़ की राह में रास्ता भटकने वालों को लम्बी दूरी तय करनी होती है.

चवन्नी चैप से

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