मनोज भावुक का परदे पर आना

अरविन्द कुमार यादव स्वतंत्र पत्रकार है और दिल्ली में रहते हैं।

अरविन्द कुमार यादव

अरविन्द कुमार यादव

यह वर्ष जहाँ भारतीय सिनेमा का शताब्दी-वर्ष है, वहीँ यह भोजपुरी सिनेमा का अर्द्ध-शताब्दी वर्ष भी है। 22 फरवरी 1963 को भोजपुरी में बनी पहली फ़िल्म गंगा मईया तोहें पियरी चढ़ईबो प्रदर्शित हुई थी जिसका निर्देशन कुंदन कुमार ने किया था। भोजपुरी-प्रेमियों के साथ-साथ यह साल भोजपुरी के जाने-माने लेखक और टेलिविज़न से जुड़े मनोज भावुक के लिए भी ख़ास है। 2012 के शुरू में उन्होंने अभिनेता के बतौर फिल्मों में प्रवेश किया था। मनोज ने भोजपुरी सिनेमा के इतिहास पर एक फ़िल्म बनाई है और ‘भोजपुरी सिनेमा के विकास यात्रा’ शीर्षक से एक महत्वपूर्ण शोध आलेख लिखा है जो शोधार्थियों के लिए आधारभूत सन्दर्भ बन चुके हैं। दिलचस्प संयोग है कि उनकी पिछले साल प्रदर्शित पहली फ़िल्म- सौंगंध गंगा मईया- के नाम में भी गंगा शामिल थीं। इस विशेष वर्ष के पूरा होने के साथ ही उनकी दूसरी फ़िल्म- रखवाला- 26 जनवरी को प्रदर्शित हो रही है जिसमें उन्होंने एक ईमानदार पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई है।

मनोज भावुक

मनोज भावुक

अभिनेता के रूप में मनोज भले ही नए हों लेकिन भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री उनके लिए नया नहीं है। मनोज बताते हैं कि इस इंडस्ट्री से उनका नाता डेढ़ दशक पुराना और गहरा है. मनोज तिवारी, रवि किशन, निरहुआ, पवन सिंह, कुणाल सिंह, अभय सिन्हा, मोहन जी प्रसाद, रानी चटर्जी, रिंकू घोष, पाखी हेगड़े, संगीता तिवारी, अक्षरा, स्मृति, संजय पाण्डेय, अवधेश मिश्रा जैसे जाने-माने नाम उनके परिचित व आत्मीय हैं। मनोज ने भोजपुरी सिनेमा के बिखरे इतिहास को सहेजने और समेटने की कोशिश में अमिताभ बच्चन, सुजीत कुमार, राकेश पाण्डेय, कुणाल सिंह, रवि किशन, मनोज तिवारी, कल्पना समेत 50 से ज्यादा फ़िल्मी हस्तियों का साक्षात्कार किया था। 2012 में आई उनकी डाक्यूमेंट्री ने सिनेमा में भोजपुरी की मौज़ूदगी को रेखांकित करते हुए 1948 से लेकर 2011 तक के फ़िल्मों को खंगाला है। पिछले साल मार्च में दिल्ली में आयोजित विश्व भोजपुरी सम्मलेन के फ़िल्म सत्र में इस डाक्यूमेंट्री का विशेष प्रदर्शन किया गया था।

भोजपुरी सिनेमा के वरिष्ठतम कलाकारों में शुमार कुणाल सिंह ने मनोज भावुक जानकारी और शोध से प्रभावित होकर उन्हें ‘भोजपुरी सिनेमा का इनसाइक्लोपीडिया’ कहा है। मनोज की जानकारी, साहित्यिक रुझान और वक्तृत्व के कारण उन्हें अभिनेत्री श्वेता तिवारी के साथ विश्व भोजपुरी सम्मलेन का संचालन का जिम्मा भी दिया गया था। पटना में हुए स्वर्णिम भोजपुरी समारोह में भोजपुरी सिनेमा में भाषा और महिलाओं की स्थिति विषय पर आयोजित सेमिनार का संचालन भी मनोज भावुक ने किया था जिसमें शारदा सिन्हा, मनोज तिवारी, रविकिशन, मालिनी अवस्थी, बीएन तिवारी, अभय सिन्हा, टीपी अग्रवाल, अजय सिन्हा, विनोद अनुपम, लाल बहादुर ओझा और नितिन चंद्रा ने शिरकत किया था। टेलीविज़न पर मनोज भोजपुरी सिनेमा के जुड़े कई विशेष कार्यक्रम भी संचालित कर चुके हैं और अनेक परिचर्चाओं में भाग ले चुके हैं।बतौर अभिनेता सिनेमा के परदे पर मनोज का आगमन भले ही हालिया हो लेकिन वे कई वर्षों से थियेटर में सक्रिय रहे हैं। वे यूनेस्को के पटना स्थित बिहार केंद्र बिहार आर्ट थियेटर, कालिदास रंगालय से नाट्यकला में प्रशिक्षित हैं और बकरा किस्तों का, मास्टर गनेसी राम, हाथी के दांत, नूरी का कहना है, बाबा की सारंगी, पागलखाना, ख्याति समेत दर्जनों नाटकों में अभिनय कर चुके हैं।

मनोज कहते हैं कि उन्हें फिल्मों में अभिनय करने में थियेटर के अनुभव का लाभ मिलता है। 16 वर्ष पूर्व पटना दूरदर्शन पर भोजपुरी साहित्यकारों और कलाकारों के साक्षात्कार से मनोज ने पत्रकारिता की शुरुआत थी और फिर 1998 में भोजपुरी के प्रथम टीवी सीरियल ‘सांची पिरितिया’ में बतौर अभिनेता और 1999 में ‘तहरे से घर बसाएब’ टीवी सीरियल में बतौर कथा-पटकथा, संवाद व गीत लेखक जुड़े। वर्तमान में अंजन टीवी में बतौर एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर कार्यरत हैं। rmaकलात्मक रुझान वाले मनोज पेशे से इंजिनियर रहे हैं और मुम्बई, युगांडा, और इंग्लैंड में लगभग एक दशक तक काम कर चुके हैं लेकिन रंगमंच, रेडियो, टीवी और पत्रकारिता में उनकी रूचि ने उन्हें स्वदेश बुला लिया। मनोज कहते हैं, “हालांकि बार बार रास्ता बदलना ठीक नहीं है ..जर्क आता है …एनर्जी डिस्ट्रीब्यूट हो जाती है . कबीर दास ने कहा है ‘एक साधे सब सधै , सब साधे सब जाय’ लेकिन क्या किया जाय- मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे / मुकद्दर में चलना था, चलते रहे”।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी मनोज दिल से शायर हैं। वे कहते हैं कि जब दिल में टीस उठती है या हलचल मचती है तो जज़्बात तस्वीर जिन्दगी के और चलनी में पानी के रूप में काग़ज पर उतर हीं आते हैं। उम्मीद तो यही है कि साहित्य और रंगमंच के क्षेत्र में खूब प्रशंसा और अनेक पुरस्कार पा चुके मनोज जल्दी अभिनय की दुनिया में भी ख़ास मुक़ाम हासिल कर सकेंगे।

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