‘और दमिश्क देता है अरबियत को उसका रूप’

प्रकाश के रे बरगद के संपादक है.

सब्ज़ ट्यूनीशिया, तुम तक आया हूँ हबीब की तरह
अपने ललाट पर लिये इक गुलाब और इक किताब
क्योंकि मुझ दमिश्की का पेशा मुहब्बत है

बरसों पहले इन हर्फ़ों को लिखते हुए सीरिया के मरहूम शायर निज़ार क़ब्बानी ने शायद ही सोचा होगा कि आने वाले वक़्त की इन्क़लाबी करवट में ट्यूनीशिया और सीरिया साथ गूंथे होंगे. इन हर्फ़ों को सीरिया के तानाशाह ने भी नहीं पढ़ा होगा. तभी तो वह बड़े इत्मीनान से इस साल के शुरू में कह रहा था कि सीरिया ट्यूनीशिया नहीं है. आँखों के डॉक्टर बशर अल-असद को वह नहीं दिखा जिसे शायर बार-बार दिखाने की कोशिश कर रहा था. उसने तो बशर अल-असद के पिता हाफ़िज़ अल-असद और अरब के अन्य तानाशाहों के लिये तो यहाँ तक लिख दिया था-

ओ सुल्तान, मेरे मालिक, बड़े-बड़े नाखूने वाले तुम्हारे कुत्तों ने तुम्हारी शह पर मेरी पोशाक को तार-तार कर दिया है.

क़ब्बानी की यह बात पूरे अरब में तानाशाही के ख़िलाफ़ मुहावरे के रूप में कही जाने लगी थी. कुछ समय पहले तक की सिसकी अब बुलंद नारे में तब्दील हो गयी है. यह नारा ट्यूनीशिया, मिस्र और यमन होते हुए जल्दी ही सीरिया पहुंचा गया जब उत्तर-पूर्वी सीरियाई शहर अल-हसका के हसन अली ने सरकार के दमन-तंत्र के ख़िलाफ़ 26 जनवरी को आत्मदाह कर लिया. दिसंबर की 17 तारीख़ को मोहम्मद बाऊज़ीज़ी के आत्मदाह ने ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति बेन अली के ख़िलाफ़ विद्रोह का बिगुल फूंका था. हसन अली की मौत के दो दिन बाद अल-राक्क़ाह कस्बे में दो कुर्द सैनिकों की मौत के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुआ लेकिन आमतौर पर सीरिया शांत रहा. 3 फ़रवरी को फेसबुक, ट्वीटर और कुछ ब्लॉग पन्नों पर घोषणा की गयी कि अगले दो दिन विरोध दिवस के रूप में मनाये जाएँ और सरकारी दफ़्तरों पर राजनीतिक सुधारों की मांग के लिये प्रदर्शन किये जाएँ. लेकिन इन दो दिनों सीरिया के बाहर ही अधिक प्रदर्शन हुए और उनमें लोगों की भागीदारी भी कम ही रही. अल-हसका शहर के विरोध-प्रदर्शन को भी तुरंत रोक दिया गया. फ़रवरी के आख़िर में लीबिया की जनता के पक्ष में राजधानी दमिश्क में लीबियाई दूतावास के बाहर बड़ा प्रदर्शन हुआ जिसे पुलिस ने बड़ी बेरहमी से तीतर-बीतर कर दिया. कर्नल गद्दाफ़ी के नेतृत्व वाली लीबिया की तत्कालीन सरकार के बशर अल-असद से बड़े अच्छे सम्बन्ध थे. बाहरी दुनिया को अब ऐसा लगने लगा था कि अरब के कई देशों में चल रही इन्क़लाबी लहर सीरिया को बिना छुए गुज़र जायेगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

15 मार्च को देश के सारे बड़े शहरों में एक साथ विरोध-प्रदर्शन हुआ. अरब का वसंत सीरिया पहुँच चुका था. छोटे-बड़े प्रदर्शन शहरों-क़स्बों में होने लगे. 25 मार्च के प्रदर्शनों पर बशर अल-असद का क़हर टूटा और बड़ी संख्या में लोग मारे गए. लेकिन महीने के अंत तक शासन को समझ में आने लगा था कि सिर्फ़ ताक़त के बूते जनता को रोका नहीं जा सकता है. हिंसा पर अफ़सोस जताते हुए राष्ट्रपति ने 200 से अधिक राजनीतिक बंदियों की रिहाई की घोषणा की और प्रधानमंत्री सहित पूरे मंत्रिमंडल का इस्तीफ़ा ले लिया गया. लेकिन दिखावे की इन कोशिशों के साथ सरकारी दमन भी जारी रहा. लेकिन जनता के प्रदर्शनों में कोई कमी नहीं आई और अब उसकी बस एक ही मांग थी- बशर गद्दी छोड़ो. पिछले नौ महीने में सीरिया की सरकार ने विरोध को कुचलने के लिये साधारण सेना के साथ-साथ वायु सेना और नौ सेना का भी इस्तेमाल किया है तथा ठगों, भूमिगत बंदूकधारियों और बा’थ पार्टी के गुर्गों ने कार्यकर्ताओं, कलाकारों और पत्रकारों की घात लगा कर हत्याएँ की हैं. जुलाई तक सीरिया के विरोध-प्रदर्शन ट्यूनीशिया और मिस्र की तरह शांतिपूर्ण थे और दमन के बावजूद लोगों ने हिंसा का सहारा नहीं लिया था. लेकिन हज़ारों लोगों की हत्या और भयावह दमन के कारण सेना के एक हिस्से ने विद्रोह कर सरकारी ठिकानों और सुरक्षा-तंत्र पर हमला शुरू कर दिया. शुरू में तो ऐसे हमले या सेना के साथ झड़पें छिटपुट थीं लेकिन पिछले महीने से विद्रोही सैनिक बड़े हमले करने लगे हैं जिसमें सैन्य ठिकाने और सत्ताधारी बा’थ पार्टी के कार्यालय शामिल हैं. इन हमलों और बशर द्वारा जारी दमन से यह आशंका होने लगी है कि अगर जल्दी ही सीरिया में शांति-बहाली की गंभीर कोशिशें नहीं की गयीं तो स्थिति लीबिया की तरह हो सकती है.

सीरिया में तानाशाही की दास्तान ट्यूनीशिया, मिस्र, यमन, लीबिया या बहरीन से अलग नहीं है. निरंकुश सत्ता, भयानक दमन, बुनियादी अधिकारों और सुविधाओं का अभाव, संसाधनों की लूट आदि से त्रस्त लोग आज जान की बाजी लगाकर अपनी सरकारों के ख़िलाफ़ खड़े हुए हैं. आश्चर्य नहीं है कि इन तानाशाहों ने जनता के विद्रोह को एक ही तरह से देखने की कोशिश की कि यह आतंकियों-कट्टरपंथियों, अमेरिका, इज़रायल आदि का षड्यंत्र है. जब ये तानाशाह हर कोशिश से विरोधों को रोक नहीं पाए तो कहने लगे कि अगर हमने सत्ता छोड़ दी तो गृह-युद्ध भड़क जायेगा और दुनिया में आतंक बढ़ जायेगा. बशर भी यही कह रहे हैं. बशर अपने पिता हाफ़िज़ अल-असद की मृत्यु के बाद 2000 में सीरिया के बाद राष्ट्रपति बने थे. तीस सालों तक पद पर रहने के बाद 10 जून 2000 को राष्ट्रपति हाफ़िज़ की मृत्यु हुई थी. बा’थ पार्टी के अन्दर हुए तख्ता-पलट में हाफ़िज़ 13 नवम्बर 1970 को राष्ट्रपति बने थे. सेना से सम्बद्ध हाफ़िज़ तब रक्षा मंत्री थे. हाफ़िज़ ने अपने विश्वासपात्र सैन्य-अधिकारियों, रिश्तेदारों और पार्टी के नेताओं के माध्यम से अपनी सत्ता को लगातार मज़बूत करते रहे तथा इस कोशिश में सीरिया में गिरफ़्तारियों, हत्याओं, नर-संहारों का लंबा दौर चला जो अब तक जारी है. 1982 की फ़रवरी में होम शहर में विरोध को कुचलने के लिये पूरे शहर पर सैन्य हमला कर 20 हज़ार से अधिक लोगों को मार दिया गया. होम का नरसंहार अरब के तानाशाहों के दमन के इतिहास का सबसे बड़ा तांडव है. कभी अमरीका का विरोध तो कभी उसके साथ गठजोड़ अरब की राजनीति का स्थाई पहलू है. इससे सीरिया भी अछूता नहीं रहा. 1990 में ईराक द्वारा कुवैत के कब्ज़े के विरुद्ध अमरीकी नेतृत्व वाले सैन्य-अभियान में सीरिया ने भी भाग लिया था.

हाफ़िज़ अल-असद की मौत के तुरंत बाद सीरिया के संविधान की व्यवस्था को बदलते हुए कठपुतली संसद ने राष्ट्रपति बनने की न्यूनतम आयु 40 से घटाकर 34 साल कर दी ताकि बशर अल-असद इस पद के लिये योग्य हो सकें. 10 जुलाई 2000 को जनमत-संग्रह के द्वारा बशर को निर्वाचित घोषित कर दिया गया. इसमें सिर्फ़ बशर के नाम पर ही मत हुआ था और कथित तौर पर उन्हें लगभग 98 फ़ीसद मत मिले थे. बशर ने वादा किया था कि सीरिया में सुधारों का क्रम शुरू होगा लेकिन छिटपुट आर्थिक सुधारों के अलावा और कुछ नहीं हुआ. तानाशाही को राजनीतिक कवच देने के लिये बशर ने इज़रायल के ख़िलाफ़ बोलना और हमास तथा हिज़बुल्लाह को समर्थन देना जारी रखा. बरसों से लेबनान की आतंरिक राजनीति में दख़ल देना सीरिया की क्षेत्रीय नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. अपने नागरिकों को जबरदस्ती वहाँ की नागरिकता दिलवाना और देश के भीतर फौजी ठिकाने बनाना सीरिया ने हाफ़िज़ अल-असद के समय से ही शुरू कर दिया था. यह प्रक्रिया को लगाम 2005 में लगी जब अंतर्राष्ट्रीय दबाव में उसे फौजें हटानी पड़ीं. इस दौरान सीरिया के भीतर राजनीतिक और धार्मिक विरोधियों का दमन चलता रहा और लगातार आपातकाल लागू रहा.

बहरहाल, आज सीरिया की क्रांति अपने निर्णायक दौर में पहुँच गयी है. इसी के साथ अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति भी तेज़ हो गयी है. रूस और चीन अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों तथा दुनिया में अमरीकी प्रभुत्व के बरक्स अपनी स्थिति की मजबूती के लिये बशर अल-असद के साथ खड़े हैं. उनके साथ ईरान है. उधर अमरीका और यूरोपीय ताक़तें इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं ताकि मनपसंद सरकार सीरिया में आ जाये. इससे उन्हें ईरान के प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी. साथ ही, इज़रायल की मुश्किलें थोड़ी कम हो जायेंगीं. इस मक़सद को पूरा करने में उनका साथ सऊदी अरब जैसा पारंपरिक सीरिया विरोधी देश दे रहा है. इसी कारण से सीरिया के मामले में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने उस तरह से तत्परता नहीं दिखाई जैसा ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया या यमन के मामले में हुआ. अभी कुछ दिन से अरब लीग ने कुछ कड़े कदम उठाते हुए बशर से विरोधियों से बातचीत करने और नागरिकों पर हिंसक दमन रोकने की मांग की है लेकिन अभी तक सीरिया के तानाशाह पर कोई असर नहीं पड़ा है.

सीरिया की क्रांति के भविष्य के बारे में निश्चित तौर पर कुछ कह पाना अभी संभव नहीं है लेकिन इतना तो तय है कि बशर की तानाशाही के दिन अब गिने-चुने हैं. इतना ही नहीं, सीरिया का भविष्य अरब के भविष्य को भी निर्धारित करेगा. अरब की राजनीति, इज़रायल, ईरान-अरब सम्बन्ध, अरब में अमरीका, यूरोप, चीन आदि महाशक्तियों की खींचतान भी एक नए दौर में प्रवेश करेगी.

काश! बशर अब भी अपने शायर निजार क़ब्बानी को पढ़ लें-

और दमिश्क देता है अरबियत को उसका रूप
और उसकी धरती पर ज़माने लेते हैं आकार

इन पंक्तियों को लिखते हुए मैं उतना सहज नहीं महसूस कर पा रहा हूँ जैसा मैं अरब की अन्य क्रांतियों के बारे में लिखते-बोलते महसूस करता हूँ.

जब मैं सीरिया में मारे गए और घायल हुए हज़ारों नागरिकों के बारे में सोचता हूँ तो सिहर उठता हूँ. सीरिया के नागरिकों के इस दमन का गुनहगार हिन्दुस्तान भी है. पिछले कुछ सालों में हिन्दुस्तान ने अरबों रुपये के घातक हथियार, टैंक और यंत्र सीरिया को बेचा है जिनका उपयोग एक तानाशाह अपने ही नागरिकों की हत्या के लिये कर रहा है.

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