जाति मनुष्य के मरने के बाद भी नहीं जाती !

अब्दुल हफीज़ गाँधीअलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं और वर्तमान में कॉंग्रेस पार्टी से जुड़े हैं. श्री गाँधी से abdulhafizgandhi[at]gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

अब्दुल हफीज़ गाँधी

समाज में लोग अक्सर बराबरी और सभी के एक जैसे होने की बात कहते मिल जायेंगे, पर यदि हम इन बातों को इतिहास की दृष्टि से देखें तो यह बातें और दावे खोखले और सच से परे मिलेंगे. यह हक़ीक़त सिर्फ़ भारत के सन्दर्भ में ही नहीं बल्कि दुनिया के दूसरे देशों के बारे में भी उतनी ही कड़वी है. भारतीय समाज ने मनुष्य को जन्म के आधार पर बाँटना सदियों पहले शुरू कर दिया था. इस बंटवारे में किसी को समाज के शीर्ष पर रख दिया गया और किसी को निचले पायदान पर. इसी के आधार पर मनुष्य की सामाजिक हैसियत और स्थान का फ़ैसला किया जाने लगा.   

हर मनुष्य जिंदा रहने के लिए खाना खाता है, साँस लेता है और अपने जीवन को आगे बढ़ाने के लिए अपनी सुरक्षा के हरसंभव इंतजाम करता है. कहने का तात्पर्य यह कि प्रकृति तो मनुष्य को जीने और रहने के बराबर अवसर प्रदान करती है लेकिन पैदा होते ही समाज मनुष्य को जातियों में बाँट देता है और जाति को ही समाज में व्यक्ति के बड़े या छोटे होने का मापदंड बना देता है. यह विडम्बना नहीं तो और क्या है ? यह विडम्बना समझ के हर पैमाने से परे है. कई बार सोचता हूँ कि मनुष्य की पैदाइश तो एक ही तरीके से होती है तो फिर उसको पैदा होते ही अलग-अलग जातियों और बिरादरियों में क्यों बाँट दिया जाता है? पैदा होते ही धर्म और जाति की चादर नवजात को ओढ़ा दी जाती है. यह सब तब होता है जब उसे यह मालूम भी नहीं होता कि धर्म और जाति के क्या मायने हैं. जाति व्यवस्था के कारण शोषण भी संस्थागत होता चला गया. इसी जाति व्यवस्था के तहत छोटी कही जाने वाली जातियों के लोगों को सदियों से शिक्षा से दूर रखा गया. जाति से ही समाज में सम्मान और स्थान निर्धारित किया जाने लगा. परिणाम यह हुआ कि समाज का एक बड़ा तबका लगातार पिछड़ता चला गया. और यह प्रक्रिया आज तक चली आ रही है. भारत ने स्वतंत्रा तो हासिल कर ली और हमने संविधान में बराबरी का अधिकार भी दे दिया पर असल में समाज में अभी भी जाति प्रथा का प्रभाव है. यह प्रभाव पिछले 65 सालों में कम ज़रूर हुआ है पर यह संतोषजनक नहीं है. इसमें आई कमी के मुख्य कारण शिक्षा का प्रसार-प्रचार, उद्योगों का विकास, शहरीकरण, तकनीक और संवैधानिक अधिकार का मिलना है. 

ऐसा नहीं है कि इस प्रथा के खिलाफ लोगों ने आवाज़ नहीं उठाई. सभी धर्मों ने जाति प्रथा के ख़िलाफ़ बात कही है. चूंकि यह प्रथा अपने आप में ही शोषण करने वाली थी इसलिए इसके ख़िलाफ़ कुछ उदार और आधुनिक सोच रखने वाले समाज सुधारकों ने आवाज़ उठाई. नारायण गुरु, पेरियार, ज्योतिबा फुले और अम्बेदकर ने तो इस प्रथा के खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाये और लोगों में इस प्रथा को ख़त्म करने के लिए एक मज़बूत सोच पैदा की. अम्बेदकर की किताब ‘Annihilation of Caste ‘ यानी ‘जाति का ख़ात्मा’ एक मज़बूत चोट थी इस प्रथा के ऊपर. हिन्दू धर्म के मानने वाले कुछ समाज सेवियों ने जाति प्रथा के खिलाफ एक लम्बी लडाई लड़ी. परन्तु भारत में दूसरे धर्मों के मानने वालों में जाति-प्रथा के खिलाफ कम संघर्ष और मुहीम देखने को मिलती हैं. सही मायनों में देखा जाये तो इस्लाम, सिख, बौद्ध और ईसाई धर्म जाति-प्रथा के समर्थक नहीं हैं. इन धर्मों में बराबरी के सिद्धांत को मूल माना गया है. इस्लाम धर्म में तो आखिरी रसूल ने अपने अंतिम ख़ुतबे में यहाँ तक कहा है कि किसी अरबी को किसी ग़ैर-अरबी पर और किसी ग़ैर-अरबी को किसी अरबी पर, किसी गोरे को किसी काले पर और किसी काले को किसी गोरे पर कोई महत्त्व हासिल नहीं होगा. यानी सब मनुष्य बराबर हैं. इसी तरह सिख, बौद्ध और ईसाई धर्म उसूलन बराबरी पर आधारित हैं. लेकिन असलियत में ज़्यादातर लोग जाति-प्रथा के समर्थक मिलेंगे. मेरी समझ से बात बाहर है कि जब ये सभी धर्म इस प्रथा के ख़िलाफ़ हैं तो इनके अधिकतर लोग इसके समर्थक कैसे बन जाते हैं? इसका एक ही मतलब निकलता है कि या तो ये अपने धर्म से पूरी तरह परिचित नहीं हैं या तो फिर यह जान-बूझ कर इस प्रथा को आगे बढ़ाना चाहते हैं? जाति प्रथा को लेकर इन धर्मों के ज़्यादातर मानने वालों में कहने और करने में ज़मीन-आसमान का अंतर दिखाई देता है. कहते तो सभी मिल जायेंगे कि हम जात-पाँत को नहीं मानते लेकिन असल में वे जाति प्रथा के समर्थक निकलते हैं. इसमें इन धर्मों की ग़लती नहीं है. ग़लती है उन धर्म के मानने वालों की जो धर्म में कही गयी बातों से पूरी तरह या तो अनजान हैं या धर्म के उन उसूलों को मानना ही नहीं चाहते जो जाति प्रथा पर एक मज़बूत प्रहार करते हैं.

जात-पाँत ने समाज पर इस क़दर कब्ज़ा जमाया हुआ है कि अक्सर लोग इससे निकल नहीं पाते. यह एक ऐसा जाल है जिसमें समाज के अधिकतर लोग क़ैद होना चाहते हैं और इससे बाहर निकलने की कोशिश नहीं करना चाहते हैं. हिन्दू धर्म में इस जाति-प्रथा का असर यह है कि जातियों के बीच खाने-पीने और शादी-विवाह के सम्बन्ध नहीं होते. आधुनिकीकरण और समाज में आई तब्दीली की वजह से अब यहाँ थोड़ा बहुत खान-पान ज़रूर शुरू हो गया है पर अंतरजातीय शादी-विवाह तो लगभग मुमकिन नहीं है. अगर कोई अंतरजातीय विवाह कर भी ले तो जातीय पंचायतें फाँसी तक का फरमान सुना देती हैं. इस तरह के तुग़लकी फ़रमान की भेंट कई युवा-युवतियाँ चढ़ भी गए है, जो बेहद शर्मनाक है. हमारे समाज में ऐसे उदार हिन्दू भी मिल जायेंगे जो जाति प्रथा को नहीं मानते पर दुर्भाग्य से ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है. समतामूलक समाज की स्थापना के लिए उदार चेहरों की आज बहुत अधिक आवश्यकता है. 

इस्लाम तो जाति प्रथा के बिलकुल ख़िलाफ़ है पर इसके मानने वालों का हाल बुरा है. आपने आप को इस्लाम के हर उसूल पर चलने वाला बताने वाले अधिकतर मुसलमान (ख़ासकर भारतीय उपमहाद्वीप के  मुसलमान) जब जात और बिरादरी की बात आती है तो इस्लाम के बताये हुए सारे उसूल भूल जाते हैं और जाति प्रथा के कट्टर समर्थक बन जाते हैं. मैं सभी मुसलमानों की बात नहीं करता पर ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो जात और बिरादरी का समर्थन करते मिल जायेंगे. जाति प्रथा के मामले में हिन्दू और मुस्लिम समाज में एक ही फ़र्क़ है (ध्यान रहे कि मैं हिन्दू और इस्लाम धर्म की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि हिन्दू और मुस्लिम समाज की बात कर रहा हूँ) कि हिन्दू न नीची जात कहे जाने वाले लोगों के साथ खाना पसंद करते हैं और न शादी-विवाह के सम्बन्ध, पर हाँ मुस्लिम समाज खाना तो खाता है अपने से नीची कही जाने वाली बिरादरियों के साथ पर आज भी वह शादी-विवाह के मामले में अपनी बिरादरी में ही देखता है कि लायक लड़का और लड़की मिल जाये. अगर आपने ग़लती से यह सवाल कर लिया कि आप शादी दूसरी बिरादरी वाले से क्यों नहीं करते तो आपको सुनने को मिल जायेगा- “मियाँ तौबा करो. सुबह से कोई और नहीं मिला बनाने के लिए. समाज को देख कर और उसको साथ लेकर चलना ही पड़ता है. हम ऐसा करके बिरादरी से पंगा नहीं ले सकते. ज़्यादा पढ़ने-लिखने से तुम्हारा सर तो नहीं फिर गया मियाँ”. और अगर इनको इस्लाम में कहे गए उसूल याद दिलाएं तो सुनने को मिलेगा कि हाँ यह तो आप सही कह रहे हैं पर —-???? जाने जाने कितने सवालिया निशानों की बौछार आप पर होगी जिसका आप अनुमान भी नहीं लगा सकते? इसके बाद एक लम्बी स्पीच बिरादरी के समर्थन में सुनने को मिल जाएगी. मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि जब यह सब लोग ऐसा सोचते हैं तो कहीं मैं हीं ग़लत तो नहीं हूँ. पर थोड़ा गौर करने पर इस नतीज़े पर पहुँचता हूँ कि नहीं मैं तो ग़लत नहीं हूँ क्योंकि इस्लाम तो जाति-प्रथा के खिलाफ पुरज़ोर तरीके से बोलता है पर इस्लाम को मानने वाले मुस्लिम समाज के लोग ही हैं जो इस पर अमल नहीं करना चाहते. और फिर सच तो सच ही रहेगा, चाहे कोई उसे पसंद करे या न करे.

कमोबेश यही हाल सिख, इसाई और बुद्ध धर्म के मानने वालों का है. यह सभी धर्म जाति-प्रथा के ख़िलाफ़ ही खड़े हुए थे. इन सभी धर्मों में हर इन्सान को बराबर का दर्जा है पर वाह रे इन धर्मो के अनुयाईयों, आपने तो ग़ज़ब कर दिया. आप उस जाति-प्रथा के समर्थक बन बैठे जिसका विरोध आपके गुरुओं, भगवान् और धर्म संस्थापकों ने किया. इतने सालों बाद भी समाज में ऊँच-नीच ख़त्म नहीं हुई.

अजीब बात है यह कि समाज में लोगों को जो चीज़ ग़लत है उसका डर ज़्यादा है, अपने धर्म का नहीं जिसने सभी को एक ही नज़र से देखने की हिदायत दी है. यहाँ पर धर्म से अधिक मजबूत जाति हो गयी है क्योंकि एक ही धर्म से सम्बन्ध रखने के बाद भी लोग शादी नहीं कर पाते क्योंकि उनकी जातियां अलग-अलग होती हैं. समाज में शादी से पहले लड़के और लड़की की जात-पाँत  का ब्यौरा निकाला जाता हैं. अख़बार वर-वधुओं के जातिगत ब्यौरों से भरे रहते हैं. लड़के-लडकी की शैक्षिक योग्यताएं और दूसरी सलाहियतें एक तरफ और उसकी समाज में कही जाने और पाई जाने वाली जात और बिरादरी एक तरफ. यहाँ सवाल उठता है कि क्या जाति धर्म से भी समाज में मजबूत हो चुकी है ? क्या पढ़-लिख जाने से भी जाति पर कोई असर नहीं पड़ता? बाबा साहेब आंबेडकर विदेशों से आधुनिक और उदार शिक्षा प्राप्त करके आये पर भारत में आने पर उन्हें भी इसके कोप का भोगी बनना पड़ा. यह कैसी व्यस्था है जहाँ आपकी उच्च-शिक्षा भी इसके सामने नगण्य हो जाती है? यह कैसी व्यवस्था है कि जीवन भर इन्सान इसके कुचक्र को नहीं भेद पाता? जाति इतनी मजबूत है कि मरने के बाद भी यह पीछा नहीं छोड़ती. मृत्यु के बाद भी आप इन्हीं जाति रुपी शब्दों से पहचाने जाते हैं.  

वाह री जाति और वाह री बिरादरी तू तो धर्म से भी बढ कर निकली. कैसी है तू कि धर्म के उसूलों का तुझ पर कोई असर नहीं पड़ता. लोगों में कैसा लगाव है तेरा कि लोग धर्म से जियादा तुझ में आस्था रखते हैं. ज्यादातर धर्म तेरे विरोधी है और फिर भी तू फल-फूल रही है? तेरी हिम्मत को भी दाद देनी पड़ेगी. लेकिन तुझे कमजोर करने की कोशिशें हर दौर में होंगी. 

कभी-कभी सोचता हूँ कि मैं 21 शताब्दी में रह रहा हूँ या पाषाण युग में?  ऐसा इसलिए सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ क्योंकि लोग अभी तक इस बुरी व्यवस्था से बहार नहीं निकल पाए हैं और  विडम्बना यह कि निकलना भी नहीं चाहते हैं. लोग कहते हैं हमारा समाज बहुत आधुनिक और विचारों से विकशित हो गया है लेकिन मैं आज के इस समाज को प्रगतिशील तभी मानूंगा जब जातिवाद और बिरादरीवाद से ऊपर उठ कर लोग आपस में बातचीत करेंगें, सम्बन्ध रखेंगें, समाज में अंतरजातीय-विवाह को बुरा नहीं मानेगें और इसको स्वीकृति प्रदान करेंगें. 

एक बात और, अपने आपको उदार और वामपंथी विचारधारा का कहने वाले भी जातिप्रथा में जकड़े हुए हैं | यह लोग बातें तो बहुत अच्छी करते मिल जायेंगे परन्तु अगर थोड़ा इनकी गहराई में जायेंगे तो दूध के धुले यह लोग भी नहीं मिलेंगे. इन सारी चीज़ों को देखकर निराशा तो होती है और सोचता हूँ कि कौन सा दिन होगा जब इस जाति-प्रथा के  प्रकोप का अंत होगा? वह कौन सा दिन होगा जब समाज अपने उदारवादी तथा आधुनिक कल-कारखानों से नहीं बल्कि उदारवादी,आधुनिक और प्रतिशील विचारों से जाना जायेगा? पर निराशा वादी  होने से काम नहीं चलेगा. मुझे समाज से उम्मीद तो बांधनी ही  होगी. हालात तो एक दिन बदलेंगे ही. हाँ समय ज़रूर लगेगा.

मैं ऊपर कही बातों के सिलसिले में एक बात साफ़ कर दूं कि मैं जाति और बिरादरी के खात्मे की बात करता हूँ पर जो लोग समाज में जातिगत शोषण के कारण सदियों से शिक्षा और विकास में पीछे रहे हैं उन्हें सरकार सहारा देने का काम करे मैं इसका समर्थक हूँ. एक समाज द्वारा जानबूझ कर अस्वस्थ किये गए इंसान को सामाजिक न्याय के आधार पर सहारे की ज़रुरत तो होगी ही. इसलिए  इसमें मुझे कोई बुराई नहीं दिखती. समाज और देश तभी बेहतर बनेगा जब हम कमजोर और पिछड़ों को विकास और समाज में सम्मान दे पाएंगे. समाज में पिछड़े हुए लोगों को बेहतर अवसर देने का मैं हमेशा समर्थक रहा हूँ और आगे भी रहूँगा जब तक समाज में शिक्षा और रोजगार के समान अवसर सभी को प्राप्त नहीं होते.  

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