अनुराग कश्यप की नाइंसाफी

 सुशील झा बी बी सी में कार्यरत हैं. उनकी शिक्षा जादूगोड़ा (झारखण्ड), जे एन यू और IIMC, दिल्ली में हुई. उनसे sushilkumar.jha@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

सुशील झा

अनुराग कश्यप ने बहुत नाइंसाफी की है आधी फिल्म दिखाकर. जहां आप तैयार होते हैं फिल्म के लिए वहीं आकर फिल्म खत्म हो जाती है. एक कशिश छोड़कर. फिर पीछे मुड़कर सोचना पड़ता है कि आखिर ये क्या था. फिल्म…डॉक्यू-ड्रामा..डॉक्यूमेंट्री या फिर इतिहास का एक ऐसा पन्ना जिसे कोई फिल्मकार शायद ही पलटना चाहता.

अनुराग बधाई के पात्र हैं जिन्होंने एक ऐसे मुद्दे पर फिल्म बनाई जिसपर आज के दौर में शायद ही कोई फिल्ममेकर पैसा लगाने की हिम्मत करे..लेकिन अनुराग कश्यप सिर्फ और सिर्फ इसीलिए अनुराग कश्यप हैं.

आधी फिल्म है इसलिए इसकी समीक्षा करना उचित नहीं होगा. समीक्षा पूरी फिल्म की होनी चाहिए और पूरी फिल्म आने में वक्त है लेकिन फिर भी कई बार वक्त से पहले गुबार निकाल ही लेना चाहिए.

अनुराग कश्यप (चित्र: प्रकाश के रे)

कोयला…गुंडई….मुसलमान…दबंगई…धनबाद…राजनीति…आदि आदि आदि के मुद्दों पर बनी गैंग्स ऑफ वासेपुर इतिहास है उन लोगों का जिसे हम कस्बाई लोग कहते हैं. छोटे शहरों के लोग कहते हैं. वो जीते हैं इसी गंदगी में और अपने सपने बुनते हैं…अपना रास्ता तय करते हैं. कहानियां हमेशा कही जाती हैं बड़े लोगों की…या गरीब लोगों की. बीच के लोगों की कहानी कहना हिम्मत की बात है.

तकनीक, शॉट्स और शैली

फिल्म के नाम पर अगर जाया जाए तो सीधे सीधे गैंग्स ऑफ न्यूयार्क का नाम याद आता है जो मार्टिन स्कार्सी की फिल्म है और उसमें भी एक शहर का इतिहास दिखाया गया है कुछ कुछ इसी तरह. अगर कोई ये कहे कि फिल्म के बारे में सोचते समय अनुराग के मन में गैंग्स ऑफ न्यूयार्क का ख्याल नहीं था तो ये कोरा झूठ होगा.

कमाल की बात यही है कि अनुराग कॉपी नहीं करते वो प्रेरणा लेते हैं. रक्त, हिंसा और कहानी कहने की प्रेरणा अपने अनोखे ढंग से. जाहिर तौर पर फिल्म की तकनीक, शैली और फिल्मांकन पर अनुराग की छाप स्पष्ट है.

फिल्मी तकनीक के बारे में मेरी समझ नगण्य है लेकिन इतना कह सकता हूं कि ओपनिंग के जो शॉट्स हैं खास कर के ब्लैक एंड व्हाइट वाले वो हॉलीवुड के कई फिल्मों में फिल्माए जा चुके हैं…ये शॉट्स देखते ही सिन सिटी की याद आ जाना स्वाभाविक सा लगता है. सन सिटी कई निर्देशकों ने मिल कर बनाई थी जिसमें कुछ शॉट्स क्वेंटिन टैरेनटिनो के भी थे जो हिंसा वाली पृष्ठभूमि के लिए जाने जाते हैं. किल बिल किसे याद नहीं होगी.

पीछे सूत्रधार के ज़रिए कहानी कहने और अख़बारों की कटिंग अलग तरह से दिखाए जाने की परंपरा नई बिल्कुल नहीं है लेकिन इतिहास बताने का तरीका ज़रुर अलग और अच्छा है. शायद अनुराग के दिमाग में Mumbai velvet ( ज्ञान पांडे की पुस्तक जिस पर अनुराग फिल्म बना रहे हैं ) रही होगी जिसमें मुंबई का इतिहास मैगज़ीन, पत्रिकाओं और कार्टून सीरिज़ इत्यादि के कटिंग्स के ज़रिए कहा गया है.

कुछ शॉट्स-कुछ ज़रुरी कुछ गैर ज़रुरी

गोश्त के ज़रिए हिंसा को प्रदर्शित करना नया नहीं रहा है.. बूचड़खाने, जानवरों के गोश्त और लटके हुए भैंसों के ज़रिए जो प्रभाव अनुराग पैदा करते हैं वहां दिखता है कि अनुराग कोशिश कर रहे हैं.. ये कोशिश त्रुटिरहित नहीं रही है. पता चलता है कि अनुराग बहुत अधिक मेहनत कर रहे हैं. शॉट्स पर. ये काम बिना किसी त्रुटि के होना चाहिए. याद कीजिए देव डी का वो शॉट जिसमें अभय देओल नशे में पहाड़गंज की गलियों से गुज़र रहे हैं. हिलता कैमरा. बिना किसी कोशिश के सीन दर्शकों के जेहन में घर कर जाता है कि नशे में है अभिनेता.

बीच बीच में तालाब के शॉट्स हैं जहां एक बच्चा नाव के एक छोर से दूसरे छोर पर जाता है. शॉट्स बहुत अच्छा है लेकिन ये कहानी में कुछ जो़ड़ता नहीं है. इस तरह के कुछ और शॉट्स हैं लेकिन बहुत अधिक नहीं.

कुछ डॉयलॉग-ज़रुरी भी गैर ज़रुरी भी

स्थानीय बोली और तरीके का इस्तेमाल निश्चित रुप से अच्छा है लेकिन कई डॉयलॉग ऐसे हैं जिसकी ज़रुरत नहीं थी. खास कर के सुल्तान के चरित्र को कबूतर वाला डॉयलॉग बिल्कुल शोभा नहीं देता है. ये डॉयलॉग रामपुर के लिए है और ये समलैंगिकता से जुड़ा हुआ वाक्य है. लेकिन लगता है कि अनुराग इस डॉयलॉग को किसी भी तरह इस्तेमाल करना ही चाहते थे.

इसी तरह का डॉयलॉग है ड्राइवर खोखा बेच के अमीर हो जाएगा. अत्यंत लोकप्रिय और बिहार के बाहुबलियों की जुबान पर पहले से ही चढ़ा हुआ डॉयलॉग. कुछ नया करते तो फिर वो लोगों की जुबान पर चढ़ सकता था.

लेकिन यहां पर ये भी कहना सही होगा कि फिल्म के कई डॉयलॉग अच्छे हैं. अश्लील ही सही लेकिन थाने में मनोज वाजपेयी का संवाद कि फलां चीज़ जितनी भी बड़ी हो जाए फलां के नीचे ही रहती है….वो बहुत कुछ कहता है जेपी सिंह के चरित्र के बारे में. अश्लील होते हुए भी मारक क्षमता वाला और नया संवाद.

चरित्र और अभिनय

मनोज वाजपेयी (सरदार खान), नवाजुद्दीन सिद्दीकी (फैज़ल खान) और पीयूष मिश्रा के बारे में कुछ लिखना ज़रुरी नहीं है क्योंकि ये लोग बेहतरीन प्रतिभा के धनी हैं और इनके बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है. लिखना नगमा यानी रिचा चड्ढा के बारे में भी नहीं हैं क्योंकि उनका अभिनय ज़ोरदार है और उनकी तारीफ में कई पन्ने काले हो चुके हैं.

मेरे लिए इस फिल्म में सबसे बेहतरीन अभिनय रहा उस अदाकार का जिसने शाहिद खान का किरदार किया है. कलाकार हैं जयदीप अहलावत. सिर्फ बीसेक मिनट में शाहिद खान का डील डौल, छोटे छोटे संवाद और एक्शन बेहतरीन है. चाहे कोयला खदान में काम करने वाला शॉट हो या फिर पहलवान को पत्थर से कूटने का. ये कलाकार बीस मिनट में मनोज वाजपेयी पर भी भारी पड़ता है.

पूरी फिल्म में हम रामाधीर सिंह को पहचानने की कोशिश करते रहे कि इन्हें कहीं देखा है. आखिर में नंबर पर देखे कि ये तिगमांशू धूलिया है. यकीनन अदभुत अदाकारी है. ठाकुरों वाली ठसक साफ दिखती है. नपा तुला संयमित अभिनय एक ऐसे बाहुबली का जो शह और मात के खेल में पक कर आगे बढ़ा है. तिगमांशू धूलिया की अदाकारी सचमुच ताजगी भरी रही.

और अब तुलना दर्शकों की

मैंने ये फिल्म बिहार के एक शहर में भी देखी और दिल्ली में भी. उम्मीद कर रहा था कि दोनों जगहों पर प्रतिक्रिया अलग अलग होगी लेकिन आश्चर्य ऐसा नहीं हुआ.

पूर्णिया में भी उन्हीं डॉयलॉग्स पर तालियां बजी जिन पर दिल्ली के प्रिया सिनेमा में तालियां पीटी गईं. वहीं पर दिल्ली वाले भी हंसे जहां बिहार के लोग हंसे. दिल्ली के लिए ये प्रतिक्रिया सामान्य थी लेकिन बिहार की ऐसी प्रतिक्रिया देखकर थोड़ा अचंभित था.

बिहार में दर्शकों का कहना था कि फिल्म उनकी ही है. इसमें कुछ नया नहीं है. ये वो कहानी है जो वो हर दिन अपने सामने होते हुए देखते हैं. दबंगई. गुंडई, राजनीति, दलाली और मारपीट ये आम जीवन का हिस्सा रहे हैं बिहार में…लोग खुश इस बात से हैं कि अब इन चीज़ों को फिल्मों में दिखाया जा रहा है और वो नेगेटिविटी में नहीं. मां बहन करने वाला गुंडा हीरो है पर्दे पर लेकिन फिल्म को देखकर बिहार में कोई गुंडई के डॉयलॉग नहीं रटेगा तय मान लीजिए क्योंकि बिहार में अभी भी लोग कह के लेते हैं…..

आखिरी कुछ पंक्तियां अनुराग के लिए

मुझे नहीं पता कि अनुराग हिंदी में लिखे रीव्यू पढ़ते हैं या नहीं.लेकिन फिर भी. अनुराग कश्यप भी अब उन लोगों में से हो गए हैं जिनकी आलोचना करने से लोग कतराने लगे हैं…(ऐसा ही कुछ आमिर खान के साथ होता है). मैं मानता हूं कि अनुराग आलोचना सुनते हैं और ध्यान देते हैं इसलिए कहना चाहूंगा कि गैंग्स ऑफ वासेपुर (आधी-आधी) अनुराग की सर्वोत्तम कृत्ति नहीं है. अभी भी देव डी की तुलना में वासेपुर काफी पीछे मानी चाहिए.

अनुराग की फिल्में आम तौर पर रीलिज़ होने के कुछ महीनों बाद लोगों को बहुत अधिक पसंद आती है जैसा कि गुलाल के साथ हुआ. मुझे शायद पूरी वासेपुर देखने के बाद अधिक पसंद आए ये फिल्म. वासेपुर देखने से हफ्ते भर पहले मैंने एक बार फिर अनुराग की सारी फिल्में (पांच को छोड़कर) देखी ताकि रीव्यू करने में आसानी हो. फिर भी यही कहूंगा देव डी में अनुराग कमाल करते हैं. वासेपुर में ऐसा कुछ नहीं है लेकिन सुना है कान में बड़ी तारीफ हुई है…मैं उम्मीद करता हूं कान अनुराग का दिमाग खराब नहीं करेगा और वो हमें इससे बेहतर फिल्में देते रहेंगे.

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