हिंदुस्तान के साथ हुए हर हादसे का एक रूपक है गैंग्स ऑफ वासेपुर

शिव विश्वनाथन समाज विज्ञान के एक यायावर हैं. यह लेख फर्स्ट पोस्ट की साइट पर छपा है, जिसे प्रकाश के रे ने हिंदी में भाषांतरित किया है.

शिव विश्वनाथन

मेरे एक दोस्त ने कभी मुझसे कहा था कि जब भारत में धनबाद है, तो इसे गुलाग (सोवियत संघ में जबरिया श्रम को सुनिश्चित करनेवाली सरकारी एजेंसी) की जरूरत नहीं है। एक शहर के रूप में धनबाद आधुनिक भारत के साथ हुए हर हादसे का एक रूपक है। विडंबनात्मक दृष्टि से, धनबाद यह गारंटी है कि सुधार की हर लहर दरअसल भ्रष्टाचार का एक नया बहाना है। धनबाद एक परिदृश्य है, जो दिखाता है कि कैसे समाजवाद, राष्ट्र-राज्य और लोकतंत्र – सभी को विकृत किया जा सकता है। धनबाद की कहानी कोयले की कहानी है।

कोयले में कुछ ऐसा है जो भारतीय लोक के अचेतन में गहरे तक असर करता है। कोयला अपराध, हिंसा, भ्रष्टाचार को ध्वनित करता है। माफिया सिर्फ कोयले को नहीं, बल्कि लोकतंत्र को भी उपनिवेशित करता है। यह बताता है कि यही आधुनिक भारत का वास्तविक भविष्य है। कोयला, एक कैनवास के रूप में, हिंसा की हर बड़ी बोली को उकेरता है।

तब सवाल यह उठता है कि एक फिल्मकार कोयले की इस कथा-गीत को कैसे प्रस्तुत करता है?

अनुराग कश्यप की गैंग्स ऑफ वासेपुर विविध चरित्रों का पचमेल रचती है, जो हिंसा की हर बारीकी को पकड़ता है। कश्यप को यह एहसास है कि हिंसा और बॉलीवुड का पहला नियम एक ही है। सहयोगी चरित्रों की जितनी अधिक संख्या होगी, हिंसा की ताकत भी उतनी ही बड़ी होगी। छोटी-छोटी भूमिकाएं हिंसा की विविधता की रूपरेखा रचती हैं।

अनुराग कश्यप (चित्र: प्रकाश के रे)

इस फिल्म में लड़ाई कुरैशी और पठान के बीच है। पठान सीमांत के सरेआम हिंसा को दर्शाता है, कसाई के रूप में कुरैशी देह के विखंडन को प्रतिबिंबित करता है। उनके जीवन और व्यवसाय ही युद्ध-क्षेत्र का निर्धारण करते हैं।

फिल्म की दृश्य-शक्ति कोयले की हिंसा को दर्शाती है। इसकी सरंचना की प्रकृति को जब फिल्म चीरती है, तो इसके निष्कर्षण से निकलता सब कुछ हिंसा को प्रतिबिंबित करता है। कश्यप हास्य के रूप में कोयले के लिए महीन पत्तर बनाते हैं, बॉलीवुड शैली में, इसमें मढ़ देते हैं। यदि वासेपुर हिंसा है, तो बॉलीवुड लालसा है, दोनों एक-दूसरे के साथ सजना पसंद करते हैं। कश्यप का कौशल इस एहसास में है कि यह दो महान मिथकों का संगम है, हिंसा का मिथक और लालसा का मिथक – दो अलहदा रूपों में होते हुए। अपराधी बॉलीवुड शैली में लड़का-लड़की मिलने के क्षणों में मानवीयता का स्पर्श पाते हैं। एक परिवेश की कामुकता दूसरे परिवेश की हिंसा में प्रतिध्वनित होती है। कश्यप रेखांकित करते हैं कि धनबाद का सरगना अपना प्रतिरूप बॉलीवुड के हीरो में पाता है। कहा नहीं जा सकता कि अमिताभ सूरज देव सिंह में कुछ जोड़ते हैं या सूरज देव सिंह अमिताभ में। आधुनिक भारत के इन दो सबसे बड़े मिथकों के इस युगल-गीत को रच कर कश्यप यह जता देते हैं कि वह कोयले के कथा-गीत को समझते हैं।

अनुराग कश्यप हिंसा के किस्सागो और दार्शनिक हैं। कोयला, माफिया और संघर्ष के बारे वह बताते हैं कि ये सभी शरीर को बेमतलब मानते हैं। जीवन की कीमत सबसे कम है और ताकत का मतलब जीवन के ऊपर काबिज होना है। हिंसा की ताकत हत्याओं की दर में निहित है। लगभग यह ऐसा है मानो इसकी किसी को परवाह भी नहीं है। हिंसा को हिंसा की जरूरत है ताकि संघर्ष की बतकही जारी रहे। हिंसा वह मानक चौखट है, जिसके भीतर जीवन घटित होता है। लगता है मानो बदला कहानी की रीढ़ रचता है और प्रेम, कामुकता, परिवार बस बहार से जुड़ी पसलियां भर हों।

गैंग्स ऑफ वासेपुर में हिंसा आख्यान बन जाती है, जिसमें कथा का हर हिस्सा हिंसा की एकांकी बन जाता है। किस्सागो हिंसा से अभिभूत है। हिंसा एकमात्र कथानक बन कहानी के कथानक को बर्बाद कर देती है। परोक्ष रूप से कश्यप दिखाते हैं कि हिंसा जीवन को निष्ठुर बनाती है और इसे उपनिवेशित करती है। कथानक का खो जाना उस हिंसा का लक्षण बन जाता है, जिस कश्यप समझने की कोशिश कर रहे हैं।

अनुराग कश्यप दिखाते हैं कि हिंसा एक शृंखला की तरह घटित होती है। कोयला जो पुरुषों के साथ करता है, पुरुष वही महिलाओं के साथ करते हैं। यह वैषम्य निरंतर है। प्रकृति के बतौर महिलाएं लालसा पैदा करती हैं, लेकिन प्रकृति की तरह ही खोद कर नंगी की जाती हैं और छोड़ दी जाती हैं। कश्यप हिंसा की भाषा, उसकी देह, उसकी तकनीक को समझते हैं। अपनी क्रूरता के साथ चाकू हाथ का एक विस्तार है। जैसे ही हाथ में बंदूक या बम आता है, हिंसा और अधिक अवैयक्तिक हो जाती है। जब ऑटोमैटिक मशीनगन आती है, मौत औद्योगिक हो जाती है। ऑटोमैटिक के देसी शब्द बनने के साथ हिंसा की अवैयक्तिकता अपनी शक्ति में आठ गुनी बढ़ोतरी करती है।

धनबाद कोयलियरी का एक दृश्य

चारों ओर कोयला के होते हुए लोकतंत्र और समाजवाद के लिए किसी जगह की गुंजाइश नहीं है। कोयला कायदे के परिवेश के हर शब्द-विशेष को मायने को उलट देता है। इसीलिए मजदूर संगठन माफिया हो जाते हैं। लोकतंत्र विकृत हो जाता है। लोक कल्याण निजी उद्यम के रूप में शोषित होता है। वास्तव में कोयला फिल्म का नायक और खलनायक है। कश्यप जानते हैं कि हिंसा एक महाकाव्य है और कहानी की पूरी ताकत को सामने लाने के लिए एक उत्तरकथा की जरूरत है। यह एक स्वीकारोक्ति है कि शायद ही कभी हिंसा समाप्त होती है और जो बात हिंसा के बारे में सच है, वही बात उसकी कथाओं के बारे में भी सच है।

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