दिल्ली विश्वविद्यालय में भेदभाव
गंगा सहाय मीणाजवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में सहायक प्रोफेसर हैं. उनसे gsmeena.jnu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

गंगा सहाय मीणा
दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक कक्षाओं में प्रवेश के लिए आवेदन के क्रम में ही अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव की शुरूआत हो चुकी है. भेदभाव की कुछ बाहरी और स्पष्ट दिखाई दे रही मिसालें हैं- पहली, सामान्य श्रेणी के लिए ऑनलाइन फॉर्म भरने की सुविधा है जिसके तहत विश्वविद्यालय सूत्रों के मुताबिक शुरूआती 4 दिनों में ही 52,000 से अधिक फॉर्म भरे जा चुके हैं. अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थियों को ऑनलाइन सुविधा से वंचित करने का विश्वविद्यालय का फैसला समझ से बाहर है. यह दूरदराज के इलाकों में रह रहे अनुसूचित जाति और जनजाति के उम्मीदवारों के साथ खुला भेदभाव है. जनगणना विभाग के अनुसार दिल्ली राज्य में अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या शून्य है. जाहिर है अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित साढे सात प्रतिशत सीटें बाहर से आने वाले उम्मीदवारों से ही भरनी हैं. ऑनलाइन की सुविधा न होने और दिल्ली से बाहर फॉर्म की अनुपलब्धता के कारण बडी संख्या में अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार उम्मीदवारी से वंचित रह जायेंगे. सीमित आवेदनों में विश्वविद्यालय के पास सीटें खाली रखने का और यह कहने का बहाना मिल जाएगा कि अनुसूचित जनजाति में पर्याप्त उम्मीदवार ही नहीं मिले. इसी कुतर्क का विस्तार यह कहकर किया जाएगा कि अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों में मेरिट ही नहीं है. अवसर की समानता के बिना मेरिट का तर्क कितना थोथा है, यह किसी से छिपा नहीं है.
अनुसूचित जाति और जनजाति के उम्मीदवारों के साथ दूसरी बडी समस्या ऑफलाइन या छपे हुए फॉर्म की उपलब्धता को लेकर है. अजा और अजजा के उम्मीदवारों को जाति प्रमाण पत्र तथा अन्य दस्तावेजों की मूल प्रति दिखाने पर ही फॉर्म दिया जा रहा है. यानी कोई व्यक्ति दिल्ली से बाहर रह रहे अपने किसी रिश्तेदार या परिजन के लिए आवेदन पत्र भेजना चाहे तो वह भी संभव नहीं है. कल्पना करिए कि कोई आदिवासी लडकी दिल्ली विश्वविद्यालय में पढना चाहे तो कैसे अपना आवेदन प्राप्त करेगी और कैसे भरकर कहां जमा करेगी? सामान्य श्रेणी के लिए दस्तावेजों का सत्यापन एक ही बार होगा, जब वे कट ऑफ में नाम आने पर संबंधित कॉलेज में प्रवेश के लिए जायेंगे. अजा/अजजा उम्मीदवारों को बेवजह ही सत्यापन की इस दोहरी प्रक्रिया में फंसाया जा रहा है.
भेदभाव का तीसरा चरण यह है कि सामान्य श्रेणी के आवेदन पत्र निर्धारित पोस्ट ऑफिसों में भी मिल रहे हैं, जबकि अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के नहीं. इसी प्रकार अनुसूचित जाति और जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आवेदन प्राप्त करने का समय कुछ जगह 1 बजे तक और कुछ जगह 2 बजे तक रखा गया है, जबकि सामान्य श्रेणी के लिए यह समय 4 बजे तक है. इसी का अगला चरण अनुसूचित जाति और जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आवेदन पत्र प्राप्त करने के कुल 4 केन्द्र हैं, जबकि सामान्य श्रेणी के लिए पोस्ट ऑफिसों सहित काफी संख्या में केन्द्र बनाए गए हैं.
अनुसूचित जाति और जनजाति के साथ भेदभाव की शुरूआत के ये सारे स्तर पूर्णतया ज्ञात, स्पष्ट और खुले हैं. इसके भीतर भी न जाने कितने स्तर होंगे जो काफी मेहनत-मशक्कत के बाद प्रवेश लेकर वहां पहुंचे विद्यार्थी भोगते होंगे. उसी का एक नमूना यह है कि आरक्षित तबकों के विद्यार्थियों को कोर्स, विषय और कॉलेज चुनने की वैसी आजादी नहीं, जैसी सामान्य श्रेणी के विद्यार्थियों को है. यह विश्वविद्यालय और कॉलेज प्रशासन तथा उस तंत्र में काम कर रहे कर्मचारियों की जातिवादी मानसिकता का परिणाम है, जहां अनुसूचित जातियों और जनजातियों का प्रतिनिधित्व नगण्य है. सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारी के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके अधीनस्थ कॉलेजों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के संकाय सदस्यों के हजारों सीटें खाली हैं, जो वर्षों से भरी नहीं जा रहीं. संकाय सदस्यों की सीट न भरी जाने का एक सामान्य सा लगने वाला खतरनाक कारण यह है कि लंबे समय तक ये सीटें दिल्ली के खास समाचार पत्र के एक खास परिशिष्ठ में ही विज्ञापित होती रहीं. अब जो दिल्ली से बाहर रहता है, वह तो पहले ही अयोग्य हो गया उस पद के लिए, क्योंकि उसे उस विज्ञापन की सूचना ही नहीं मिल पाई.
विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति और जनजातियों के आरक्षण के प्रति घृणाभाव इतना अधिक है कि विश्वविद्यालय की प्रवेश हेल्पलाइन पर जब अजा/अजजा के ऑनलाइन आवेदन न होने के बारे में पूछा गया तो फोन उठाने वाली महिला का जवाब था, ”यह तो कोटे वालों की किस्मत है कि उनके लिए ऑनलाइन फार्म भरने की सुविधा नहीं है”. उसका यह जवाब दलित और आदिवासियों के साथ उनकी किस्मत बताकर लंबे समय से किये जा रहे शोषण का विस्तार कथन है. लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन या प्रवेश प्रक्रिया से जुडे तमाम लोग इस बात को भूल रहे हैं कि अब वह युग बीत गया जब लोग अपने साथ हो रहे अन्याय को किस्मत मानकर चुप हो जाया करते थे.
भेदभाव की शुरूआत हो चुकी है. इससे लड भी लिए तो तीन साल तक कदम-कदम पर होने वाले दृश्य और अदृश्य भेदभाव से कैसे लडेंगे? जरूरत है सवर्ण समुदाय को आरक्षण के प्रति सोच बदलते की. वास्तव में ये सारी समस्याएं आरक्षण से ऊंची जातियों की घृणा का प्रतिफल है. सवर्ण समुदाय को सोचना चाहिए कि ये कॉलेज, ये विश्वविद्यालय और ये देश किसी एक समुदाय की बपौती नहीं है. इस पर सभी समुदायों का उचित प्रतिनिधित्व होना चाहिए. आरक्षण उसी प्रतिनिधित्व की संवैधानिक व्यवस्था है. सारी लडाई अवसरों की कमी की वजह से होती है. जरूरत है अधिक अवसरों के लिए साझी लडाई लडने की ताकि पढने के इच्छुक हर व्यक्ति को शिक्षा मिले.



