Tag Archive: prakash k ray

Some Sufi Tales and A Desperate Housewife

The novel ‘The Forty Rules of Love’ is actually two novels being played out in two different lands and have a distance of seven centuries in between. This ambitious title authored by well-known Turkish writer Elif Shafak consists of two simultaneous narratives intertwined together.

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सीरिया में शांति की उम्मीद

पांच सालों से अधिक समय से चल रहे सीरियाई गृह युद्ध के सिलसिले में आगामी दिनों में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं. पर, स्थायी शांति की अभी कोई गारंटी नहीं दी सकती है. लेबनान का सशस्त्र गुट हिजबुल्ला भी सीरिया में है. इसे ईरान और बशर अल-असद का समर्थन भी है. यमन में भी ईरान हौदी विद्रोहियों का समर्थन कर रहा है जिनके विरुद्ध सऊदी अरब का बड़ा गंठबंधन लड़ रहा है. रूस के प्रभाव के प्रति अमेरिका और यूरोप के नकारात्मक रवैये में भी बहुत जल्दी कोई अंतर नहीं आनेवाला है. फिर इसलामिक स्टेट और अल-कायदा से जुड़े गिरोहों की सक्रियता शांति वार्ताओं के परिणामों पर निर्भर नहीं करती है.

मराठी सिनेमा से जगतीं उम्मीदें

मुंबई फिल्म उद्योग में भी बीते सालों में प्रयोगधर्मिता का सिलसिला शुरू हुआ है तथा दक्षिण से भी कुछ उम्दा फिल्में आई हैं, पर उनका मुख्य स्वर अब भी मुनाफे और सतही मनोरंजन को ही संबोधित है. इन इलाकों में फिल्मों से जुड़े लोग मराठी से सीख रहे हैं और उन्हें सीखना भी चाहिए. इतिहास में ऐसे अवसर बार-बार नहीं आते हैं, जब कलात्मक निराशा के दौर में उम्मीद की बिजलियां लगातार चमकती हों.

Tales of A Continuing Carnage

Look at the officers and that Kodnani featured in ‘Gujarat Files’. No one is sorry for his or her role. All are playing victim card. That is chilling. The overarching personality terror of two top guys, then and now, is terrifying in those pages. The fear and submission at large, after Gujarat, now all over, is becoming a normal. India is becoming Gujarat of the post-2002 years. Rana Ayyub’s book is a profound indicator of that. Not the content of the book, but its publication story. The content is important for its evidential value. All is known for too long.

ब्रिक्स के पतन की शुरूआत !

दुनिया की सातवींं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की प्रगति अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़ी मिसाल रही है. ऐसे में उसका पतन महाशक्तियों की नीतियों की वैधता के लिए जरूरी है.

A Rejoinder to Deborshi’s letter to Kanhaiya

It is about the basic rights. About the release of those framed in fake cases. And the rights to speak. Against the puffed up bullies. The next stage is a next stage, and that depends on this struggle.

राज्य का नैतिक लबादा

जिजेक कहते हैं कि पूँजीवाद आज इतना सक्षम हो चुका है कि उसे लोकतंत्र की जरूरत भी अब नहीं है. उनकी भविष्यवाणी है कि दोनों का संबंध-विच्छेद बहुत जल्दी हो जायेगा. इस प्रक्रिया को हम रोजमर्रा में घटित होते देख सकते हैं. परंतु पूँजीवाद स्वयं को बहाल रखने और मजबूत करने के तर्क तो देता ही रहेगा. बस अब यह हो रहा है कि वह आर्थिक तर्क नहीं दे पा रहा है क्योंकि उसके पुराने सभी वादे असफल रहे हैं.

लोकतंत्र का छुआछूत संस्करण

अगर लोग शिक्षित नहीं हैं या उनके पास शौचालय की सुविधा नहीं है, तो यह राज्य की असफलता है, उन लोगों की नहीं. और, फिर एक ही देश में चुनाव से संबंधित अलग-अलग नियम बनाने का क्या तर्क है! कहीं ऐसा तो नहीं है कि राज्य क्रमशः लोगों के बुनियादी अधिकारों से अपना पिंड छुड़ाना चाहता है. आर्थिक स्तर पर बहिष्करण की व्यापक प्रक्रिया पहले ही गंभीर हो चुकी है, जहाँ देश के सबसे धनी 100 लोगों के पास आबादी के निचले 70 फ़ीसदी यानी करीब 75 करोड़ लोगों की संपत्ति से अधिक धन है.

An Open Letter to Ashutosh (Spokesperson of Aam Aadmi Party)

History is moving in zig-zags and by roundabout ways. – Lenin Dear Ashutosh Ji, After reading your article, Modi lessons for CPM, in The Indian Express, a famous quote of Marx (the another… Continue reading

पत्रकार मार्खेस

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं. हमारे समय की एक बड़ी त्रासदी यह है कि हमारे समाज जैसे औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक समाजों की समझ के लिए हम पश्चिमी आधुनिकता की अवधारणाओं पर… Continue reading

मोदी, मूट और टाइम पत्रिका

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं. राजनेताओं द्वारा सोशल मीडिया में और ऑनलाइन प्रचार के लिए पब्लिक रिलेशन कंपनियों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है और यह भी अक्सर सुनने में… Continue reading