Saving democracy from the corporate veil

Five things the US should do to quell the global outrage after the recent verdict in the Bhopal gas leak case and provide some justice to the victims. –Gopal Krishna, Convenor, ToxicsWatch Alliance… Continue reading

कहे कबीर का कीजै

पुस्तक समीक्षा –प्रकाश कुमार राय (दैनिक भास्कर में 26 जून 2010 को प्रकाशित) पुस्तक: अकथ कहानी प्रेम की- कबीर की कविता और उनका समय लेखक: प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन मूल्य: 500… Continue reading

Censor Board denies certificate to “Flames of the Snow”

Board says, film justifies Maoist ideology …. Indian Censor Board has refused to certify ‘Flames of the Snow’, a documentary on Nepal, for public screening. The Board feels that the film ‘tells about… Continue reading

बहसतलब (दो): मोहल्‍ला लाइव, यात्रा बुक्‍स और जनतंत्र का आयोजन

दिल्ली में यूँ तो रोज़ाना अनेक गोष्ठियां अनेक विषयों पर होती रहती हैं, लेकिन ऐसी गोष्ठियां कभी-कभार ही होती हैं जिनमें विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी, विशेषज्ञ, पेशेवर, कार्यकर्ता आदि एक साथ किसी एक… Continue reading

सार्कोज़ी, ज़रदारी, दलाली और आतंक

प्रकाश के रे बरगद के संपादक है. प्रसिद्ध अमरीकी साहित्यकार नैथनियल हव्थोर्न ने लिखा था कि गुज़रा हुआ समय वर्तमान के ऊपर किसी मृत दानव के शरीर की तरह पड़ा होता है. इस बात… Continue reading

Scrap Unique Identification Number (UID)/ Aadhar project involving biometric data collection linked to National Population Register (NPR): Gopal Krishna

Following is an open letter addressed to the Citizens of India by an activist Gopal Krishna. His contact details are given at the end of the article. We must engage with the topic… Continue reading

Free Roman Polanski: Milan Kundera

Free Roman Polanski! Although I do not know the director personally, Roman Polanski has been on my mind more than any other person for the past eight months. By Milan Kundera This article… Continue reading

इज़रायल की बर्बरता

हालाँकि इस हमले ने ग़ाज़ा की नाकेबंदी और फलस्तीन की आज़ादी के सवाल को एक बार फिर दुनिया के सामने रख दिया है, लेकिन यह चिंता भी स्वाभाविक है कि पिछली घटनाओं की तरह यह मामला भी निंदा और दुःख प्रकट करने तक ही सीमित रह जायेगा. हमें यह समझना होगा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, ख़ासकर अमरीका, यूरोप, चीन आदि की चुप्पी ने ही मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को नाकेबंदी तोड़ते हुए ग़ाज़ा पहुँचने की कोशिश के लिये मजबूर किया है.