जेल से आजादी की सदायें

प्रकाश के रे bargad.org के संपादक हैं.

इजरायल की जेलों में बंद हजारों फिलीस्तीनी कैदी रविवार से भूख हड़ताल पर हैं. उनकी प्रमुख मांग कैदखानों की बदहाली दूर करने की है. इस विरोध का नेतृत्व फतह के नेता मारवान बरगौती कर रहे हैं जो लंबे समय से जेल में हैं. हाल के दिनों में हुए सबसे बड़े विरोधों में से एक इस भूख हड़ताल में फतह समर्थकों के साथ हमास और इस्लामिक जेहाद जैसे संगठनों से जुड़े कैदी भी हिस्सा ले रहे हैं. फिलीस्तीन के प्रधानमंत्री रामी हमदल्लाह और गाजा के हमास नेताओं ने भी भूख हड़ताल का समर्थन किया है. फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन के निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों का नेशनल कौंसिल भी इस विरोध के साथ है.

माना जा रहा है कि इस हड़ताल में दो हजार से अधिक कैदी शामिल हो सकते हैं. इस साल वर्ष 1967 के छह दिनों के युद्ध में इजरायल द्वारा फिलीस्तीन के बड़े हिस्से पर कब्जे के 50 साल भी पूरे हो रहे हैं. 

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फिलीस्तीन पर जोर के दम से दमन कर रहे इजरायल के आपराधिक और बर्बर रवैये का एक प्रमाण उसके जेल हैं जहां हजारों फिलीस्तीनियों को अमानवीय स्थितियों में रखा जाता है. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने फिलीस्तीनी प्रिजनर्स सोसाइटी के हवाले से बताया है कि इजरायल की जेलों में फिलहाल 6,500 फिलीस्तीनी कैदी हैं जिनमें कम-से-कम 300 बच्चे शामिल हैं. इन्हें विभिन्न 17 जेलों में रखा गया है जिनमें से 16 इजरायल में हैं. कैदियों में 57 महिलाएं हैं जिनमें 18 साल से कम उम्र की 13 लड़कियां हैं. फिलीस्तीनी लेजिस्लेटिव कौंसिल के 13 सदस्य भी हिरासत में हैं. कम-से-कम 500 ऐसे कैदी हैं जिन पर अभियोग नहीं लगाया गया है और न ही कोई मुकदमा चल रहा है.

मनमाने ढ़ग से लोगों को हिरासत में रखने पर रोक के अंतरराष्ट्रीय कानून का यह सरासर उल्लंघन है. उल्लेखनीय है कि 1967 से अब तक 200 से अधिक कैदियों की जेलों में समुचित मेडिकल सुविधाएं न मिलने से जान जा चुकी है. 

बेमानी आरोपों में गिरफ्तारी और बिना मुकदमे के बंद रखने के साथ इजरायल कैदियों को उनके रिश्तेदारों से मिलने से वंचित करने की पूरी कोशिश करता है. कब्जेवाले क्षेत्रों के जिन निवासियों को गिरफ्तार किया जाता है, उन्हें इजरायल में स्थित जेलों में रखा जाता है जो कि अवैध है. चूंकि वेस्ट बैंक और गाजा के लोगों को इजरायल में घुसने के लिए परमिट लेनी पड़ती है, तो उन्हें कैदियों से मिलने में बहुत कठिनाई होती है. आम तौर पर परमिट दिया नहीं जाता है. यह जेनेवा कन्वेंशन के खिलाफ है.

इस रवैये का सबसे बुरा असर गाजा के कैदियों पर पड़ा है क्योंकि इजरायली सेना दो महीने में एक बार ही यहां के परिवारों को परमिट जारी करती है. गाजा के कैदियों की संख्या करीब 365 है. इजरायल ने लगभग 1000 कैदियों को कथित सुरक्षा कारणों से रिश्तेदारों से मिलने से रोक हुआ है. करीब 20 ऐसे भी कैदी हैं जिन्हें अलग अकेले सेल में बंद कर रखा गया है. 

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वर्ष 1969 से अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस कमिटी वेस्ट बैंक और गाजा के कैदियों के रिश्तेदारों के मिलने-जुलने के मामले को देखती है तथा उसे इजरायल से किसी भी तरह के संसाधन या धन मुहैया नहीं कराये जाते हैं. इन इलाके के लोग परमिट के लिए रेड क्रॉस के जरिये आवेदन देते हैं और उन्हीं के द्वारा उपलब्ध कराये गये वाहन से कैदियों से मिलने जाते हैं. यह सब इजरायली जेल सेवा की मर्जी के मुताबिक तय होता है. पिछले साल जुलाई में रेड क्रॉस ने महीने में एक बार मुलाकात निर्धारित कर दिया जो पहले दो बार होता था. लेकिन महत्वपूर्ण अवकाशों में तीन अतिरिक्त मुलाकातों का इंतजाम भी किया गया है. 

बहरहाल, अब देखना यह है कि कैदियों का यह संघर्ष क्या असर करता है, पर इतना जरूर है कि इस भूख हड़ताल ने फिलीस्तीनी आजादी की लड़ाई को नया तेवर दिया है. वर्ष 2012 में करीब 1,500 कैदियों ने करीब महीनेभर भूख हड़ताल कर कई अधिकारों को हासिल करने में कामयाबी पायी थी. दो साल बाद 800 कैदियों ने 63 दिनों का अनशन किया था.

अपने पत्र में मारवान बरगौती ने लिखा है कि आजादी और आत्मसम्मान सार्वभौमिक अधिकार हैं जो मानवता में अंतर्निहित हैं तथा ये सभी देशों और सभी मनुष्यों को मिलने ही चाहिए. फिलीस्तीनी इस संदर्भ में अपवाद नहीं हो सकते हैं.

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