क्या इज़रायल को ट्रंप का अंध-समर्थन अस्थिरता को बढ़ावा देगा?

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप और हिलेरी क्लिंटन में इस बात की होड़ लगी थी कि कौन इज़रायल का सबसे बड़ा पैरोकार है. इसका तात्कालिक कारण कट्टर अमेरिकी-यहूदियों का वोट और चंदा था, पर इसके दीर्घकालिक कारण अमेरिका का स्थायी इजरायल प्रेम है जो अरब के देशों पर दबाव की राजनीति का एक हथियार भी है.

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ट्रंप और नेतन्याहू (फोटोः ट्रंप के फेसबुक पेज से)

बहरहाल, बुधवार को राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नेतन्याहू की बीच बातचीत से यह बात स्पष्ट हो गयी कि ट्रंप को अलग फिलिस्तीनी राज्य से परहेज है, उन्हें वेस्ट बैंक में जबरन बनायी जा रही कॉलोनियों से कोई परेशानी नहीं है तथा वे अमेरिकी दूतावास को तेलअवीव से जेरूसलेम स्थानांतरित करने की प्रक्रिया में हैं.

हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि दोनों पक्ष ‘शांति’ के लिए जो तय करेंगे, उन्हें मंजूर होगा. वहीं इजरायली प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर दो अलग राज्य बनते हैं, तो पूरे इलाके की सुरक्षा का जिम्मा इज़रायल के हाथों में होगी.

मतलब यह कि आधिकारिक रूप से अमेरिकी की दो-राज्य नीति को खारिज तो नहीं किया गया, पर विवरण से साफ है कि फिलस्तीन को अलग करने में ट्रंप की कोई दिलचस्पी नहीं है.

ट्रंप के निर्वाचन के साथ ही इजरायल का धुर-दक्षिणपंथी तबका जोश में है और कब्ज़ा की गयी जमीन पर यहूदियों को बसाने का काम तेज कर दिया गया है. नेतन्याहू अपनी आक्रामक नीति पर ट्रंप की मुहर लेकर वाशिंगटन से लौटेंगे.

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