जेरेमी कोर्बिन

चन्दन श्रीवास्तव

  (chandan[at]csds.in) दिल्ली स्थित सीएसडीएस के सीनियर फेलो हैं.

एक व्यक्ति के रुप में ब्रिटेन की लेबर पार्टी के नये नेता जेरेमी कोर्बिन की कथा बड़ी मोहक है, खासकर भारतीयों के लिए. अगर आपका जन्म 1970 के दशक में हुआ हो या फिर 1990 के दशक के पहले पाँच सालों में आप अपनी उम्र के दो दशक पूरा कर चुके हों, आपने स्कूली किताबों में पढ़ा हो कि भारत एक लोक-कल्याणकारी राज्य है और इसी के अनुकूल जीवन के शुरुआती दशकों में घर के बड़े-बुजुर्गों से निरंतर ‘सादा जीवन-उच्च विचार’ का उपदेश सुना हो तो बड़ी संभावना है कि आप जेरेमी कोर्बिन की कथा को पढ़कर उनके भीतर छोटा-मोटा गांधी देखने लगें. लेबर पार्टी के नेता के रुप में चुनाव- प्रचार ने जोर पकड़ा तो कोर्बिन के बारे में ब्रिटेन के अखबारों में ऐसी कथाएं इफरात से छपीं.

एक कथा यह है कि कोर्बिन के घर में एक दफे चोर घुसा. चोर को घर में बस इतनी ही चीजें मिलीं कि उन्हें एक साथ निकालकर खुद को ‘कम-खर्च’ कहने वाले इस सांसद के घर की छोटी सी खिड़की के रास्ते आसानी से फरार हो सके. और, जाते-जाते चोर के मन में भी कोई शंका रही होगी कि जो चीजें वह उठाकर लाया है, उनका बाजार में कुछ मोल मिलेगा भी या नहीं, तभी उसने अपनी समेटी हुई चीजों की गठरी से एक कोट निकालकर आखिरकार खिड़की के बाहर बरामदे में फेंक दिया. बाजार के मोल के हिसाब से चोर को कोर्बिन का जो कोट बेमोल का लगा, रंग खो चुका वही कोट कोर्बिन की नजर में इस लायक था कि वे ब्रिटेन की महारानी की मां की मृत्यु (2002) की शोक-सभा में पहनकर जा सकें.

https://encrypted-tbn2.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcQD11HvKEZHsocQTUpZm7x9V5SwrIQg0u7SoD2XVnze_f4nEU6xकोट-पतलून और टाई से जुड़े ब्रिटिश-अदब के साथ कोर्बिन के बरताव से जुड़ा भी एक किस्सा उनके सोच पर रोशनी डालने के लिहाज से सुनने लायक है. एक दफे (1984) बीबीसी के कार्यक्रम ‘न्यूजनाइट’ पर बहस चल रही थी कि ‘हाऊस ऑफ कॉमंस’ में बैठने वाले सांसदों की पोशाक कैसी हो. उस वक्त कार्बिन की यह कहकर आलोचना होती थी कि वे सांसद होने के बावजूद हाऊस ऑफ कॉमंस में खुले गले की शर्ट पहनकर चले आते हैं. बहस में इसी आलोचना को तूल देते हुए एक वक्ता ने कार्बिन पर निशाना साधा कि अगर पोशाक के मामले में कोई सांसद सुरुचि का प्रदर्शन नहीं करता तो फिर उसे संसद से बाहर कर देना चाहिए. इस पर कोर्बिन का जवाब था कि मान्यवर, हाऊस ऑफ कॉमंस कोई ‘ फैशन परेड नहीं है, यह ‘जेन्टिलमैन’ विशेषणधारी लोगों का जमावड़ा भी नहीं है और न ही बैंकर्स का कोई संस्थान है, यह तो वह जगह है जहां अवाम की नुमाइंदगी करने वाले लोग बैठते हैं.”

किफायतशारी को कोर्बिन सार्वजनिक जीवन में ही नहीं निजी जिन्दगी में भी एक मूल्य की तरह बरतते हैं. सांसद के रुप में तीन दशक से ज्यादा का समय बीता चुके 66 साल के इस बुजुर्ग को कहीं आने-जाने के लिए साइकिल चलाना ज्यादा अच्छा जान पड़ता है, सो उन्होंने कार नहीं खरीदी और देर रात में भी घर लौटते समय उन्हें आम लंदनवासी की तरह बस की सवारी अपने लिए माफिक जान पड़ती है. लेबर पार्टी के नेता-पद के चुनाव के वक्त उनके समर्थकों ने फेसबुक पर एक फोटो शेयर किया. इस फोटो में लंदन के नाइट-बस में खड़े जेरेमी कोर्बिन का चेहरा उतना ही पस्त और उदास नजर आता है जितना कि दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद रात को घर लौटते किसी मजदूर का हो सकता है. पाँच साल पहले ब्रिटिश अखबारों ने उन्हें सबसे कम खर्च करने वाले सांसद के रुप में भी याद किया . साल 2010 में कोर्बिन ने मई से अगस्त के बीच एक सांसद के रुप में अपने प्रिन्टर के लिए सिर्फ स्याही का खर्चा मांगा था और यह किफायतशारी का ही मूल्य था जो उन्होंने एक दफे अपनी पार्टी के नेता और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर को अर्जी लिखी कि ‘मान्यवर, ब्रिटेन की महारानी राजमहल में क्यों रहती हैं, उन्हें महल से बाहर कीजिए और उनके रहने के लिए कोई साधारण घर दे दीजिए’.

फोटोः स्टुअर्ट लोव
फोटोः स्टुअर्ट लोव

हो सकता है, कोर्बिन की किफायतशारी की इन कथाओं से किसी को गांधी के कुछ जीवन-प्रसंगों की याद न आये या फिर आये भी तो लगे कि गांधी और कोर्बिन के बीच मेल बैठाने की कोशिश दूर की कौड़ी लाना है. बहरहाल, कोर्बिन को गांधी से जोड़कर देखने का एक औपचारिक सूत्र स्वयं उनकी की कथा में मौजूद है. दो साल पहले (नवंबर, 2013) गांधी फाउंडेशन ने उन्हें अपने अंतर्राष्ट्रीय शांति सम्मान से नवाजा और कहा कि यह सम्मान कोर्बिन को सांसद के रुप में तीस साल तक ‘सामाजिक न्याय और अहिंसा जैसे गांधीवादी मूल्यों के लिए लगातार कोशिश’ करते रहने के लिए दिया जा रहा है. सम्मान-समारोह में कोर्बिन ने गांधी को कई कोणों से याद किया, इन यादों में ‘वायसराय के महल की सीढ़ियों पर चढ़ता नंगा फकीर’ वाली याद भी शामिल थी और यह भी कि गोलमेज सम्मेलन में भाग लेते वक्त गांधी ने अपने रहने के लिए महंगे होटल नहीं, बल्कि पूर्वीं लंदन का एक गरीब इलाका चुना था.

भाषण में कोर्बिन ने गांधी के बारे में एक मार्के की बात कही कि ‘गांधी उन लोगों में एक हैं जिनको लेकर हमें लगता है कि हम तो उन्हें जानते हैं लेकिन गांधी को जितना पढ़ो उतना ही मन में यह बोध गहरा होता जाता है गांधी के बारे हम कम जानते और कम समझते हैं’. कोर्बिन जब अपने देश, काल और राजनीति की जरुरत के लिहाज से गांधी को खोजने निकलते हैं तो उन्हें लगता है कि गांधी का विचार तो यही था कि ‘अर्थव्यवस्था का काम लोगों को जीवित रखना और सक्षम बनाना है न कि बहुतेरे लोगों की कीमत पर चंद लोगों को धनी बनाना. सीधी-सादी जीवन-शैली जिसमें ज्यादा से ज्यादा सामान और क्षुद्र अनुभव बटोरने की हवस न हो- ऐसा ही जीवन धरती के संसाधन और पारिस्थितिकी को बनाये रखने के लिए अनिवार्य है.” कोर्बिन को यह भी लगता है कि अर्थव्यवस्था का यह गाँधी-विचार आज के वक्त में महत्वपूर्ण और चुनौती भरा है क्योंकि हमलोग आज जिस वक्त में जी रहे हैं उसकी मुख्य चिन्ता लोगों को ‘जीवन-सक्षम बनाने की नहीं बल्कि ज्यादा से ज्यादा सामान बटोरने की है इसलिए हमें अर्थव्यव्यवस्था के इस गांधी-विचार पर गंभीरता के साथ सोचना होगा.”

एक वाक्य में कहें तो कोर्बिन की राजनीति शाहखर्ची के खिलाफ है, उनके राजनीतिक विचार और प्रेरणाओं का बीज-शब्द किफायतशारी या कह लें ‘संयम’ और ‘आत्म-नियंत्रण’ है जो कि गांधी-विचार का भी है और कोर्बिन की राजनीति की चुनौती और उनका निजी दुःख भी इसी से बंधा है. कोर्बिन को पता है कि ब्रिटने की संसद में वह जगह नहीं बची जहां खड़े होकर आप आत्म-नियंत्रण की राजनीति को व्यवहारिक बताते हुए अपनी बातें कह और सुन सकें. ब्रिटेन की संसद को लेकर उन्हें अफसोस है कि ‘वहां दर्शन, उच्च आदर्शों और गहरे विचारों के बारे में अब नहीं सोचा जाता’ और ब्रिटेन की नौजवानों के बारे में उन्हें लगता है कि “यह पीढ़ी सोचती ही नहीं कि बढ़ता हुआ जीवन स्तर किन कीमतों पर हासिल होता है, कुछ तो धरती के संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण और कुछ इस विचार के कारण कि मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था आर्थिक रुप से वैसी टिकाऊ दुनिया की रचना कर देगी जैसा कि हम चाहते हैं.”

जेरेमी कोर्बिन की असल दिक्कत उनकी विचारों की इसी बनावट से पैदा होती है. यह बनावट उन्हें अपनी पार्टी के विरुद्ध खड़ा करती है. सबसे पहले कोर्बिन को उसी लेबर पार्टी से निबटना पड़ेगा जिसके वे खुद नेता चुने गये हैं क्योंकि कमखर्ची या कह लें ‘आत्म-नियंत्रण’ का विचार लेबर पार्टी के भीतर कभी था ही नहीं, उसके पास था व्यक्ति की स्वेच्छाचारिता को समाज-अनुमोदित राज्यसत्ता से नियंत्रित करने का समाजवादी विचार और लेबर पार्टी इस विचार से भी कब की तौबा कर चुकी है. लेबर पार्टी की राजनीति को प्रभावित करने वाले मार्क्सवादी चिन्तकों में समाजविज्ञानी राल्फ मिलिबैंड और इतिहासकार एरिक हाब्सबॉम का नाम लिया जाता है. मिलिबैंड तो अपने जीवन के आखिर के दशक (1993) तक मानते रहे कि लेबर पार्टी से किसी क्रांतिकारी बदलाव की उम्मीद करना व्यर्थ होगा. उनकी नजर में लेबरपार्टी का अपना ‘वाद’ हद से हद “ पूंजीवादी खांचे के भीतर सामाजिक सुधार की एक विचारधारा ” भर था, ऐसी विचारधारा जिसके पास “पूंजीवादी खांचे से पार जाने की कोई गंभीर महत्वकांक्षा नहीं है चाहे उसके नेता सुविधाजनक अवसरों पर कर्मकांडी ढंग से ‘समाजवाद’ की जितनी दोहाई दें.” मिलिबैंड के इस विचार के विपरीत एरिक हाब्सबॉम को जरुर लगता रहा कि ‘ ब्रिटेन में मजदूर-वर्ग और उसके आंदोलन पर आधारित वामपक्ष की एक ही असली जनधर्मी पार्टी है- लेबर- पार्टी!’ लेकिन एरिक हॉब्सबॉम भी 1980 के दशक की शुरुआत से पहले(1978) यह बात कह चुके थे कि ब्रिटेन में लेबर पार्टी का आधार खिसक रहा है. ‘फारवर्ड मार्च ऑफ लेबर हाल्टेड?’ शीर्षक अपने प्रसिद्ध व्याख्यान में उन्होने स्वीकार किया था कि ‘ मजदूर तबके के बीच फूटमत बढ़ रहा है और वे अलग-अलग समूहों में बंटकर शेष से निरपेक्ष रहकर अपने आर्थिक हितों को साधने में लग गये हैं ’ और यह भी कहा था कि लेबर पार्टी का घटता मत-प्रतिशत इस बात की गवाही दे रहा है कि ‘मजदूर-वर्ग की समाजवादी चेतना में ह्रास हो रहा है.’

मजदूर-वर्ग के बीच बढ़ते फूटमत और अपने खिसकते जनाधार की समस्या से लेबर पार्टी निबट पाती इसके पहले ही ब्रिटेन में मार्गेरेट थैचर और उसके बाद जॉन मेजर के नेतृत्व में कंजरवेटिव पार्टी ने ब्रिटेन में अपने आधिपत्य का सिक्का जमाया. कंजरवेटिव पार्टी के इस शासन ने ब्रिटेन की राजनीति को सिरे से बदल दिया. लेबर पार्टी के सामने पहली समस्या प्रगतिशील सामाजिक बदलाव की नहीं, बल्कि चुनावों में अपना अस्तित्व बचाने की खड़ी हो गई. मिलिबैंड के शब्दों का सहारा लेकर कहें, तो कंजरवेटिव पार्टी के आधिपत्य के 18 सालों (1979-1997) ने ‘पूंजीवादी ढांचे के भीतर रहते हुए सामाजिक बदलाव’ लाने की लेबर पार्टी की विचारधारा को सिर के बल खड़ा कर दिया. 1990 के दशक में लेबर पार्टी के नेता टोनी ब्लेयर को लगने लगा था कि लेबर पार्टी के लिए एक नये एजेंडे की जरुरत है. लोक-कल्याणकारी राज्य की समीक्षा करते हुए वे इस फैसले पर पहुंचे कि यह “राज्यसत्ता पहले तो सफल हुई. इसने लोगों को बुनियादी जरुरत की चीजें और सेवाएं जैसे मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा मुहैया करायी लेकिन इसी क्रम में राज्यसत्ता की ताकत बड़ी होती गई और अन्ततः लोक-कल्याणकारी राज्यसत्ता ‘स्वयं ही एक निहित स्वार्थ के रुप में सामने आई जो व्यक्ति और पूंजी दोनों के दमन में सक्षम थी. दूसरे, अर्थव्यवस्था की बढ़वार के साथ लोगों के पास रकम बढ़ी और उसका विस्तार हुआ. लोग अपने को उत्पादक के साथ-साथ उपभोक्ता भी समझने लगे. अब उन्हें अपने पसंद की परवाह होने लगी. उन्हें बाजार की जरुरत थी जहां वे अपनी पसंद के मुताबिक चुन-छांट सकें. इसी कारण समूह-शक्ति को व्यक्त करने वाली ताकतें चाहे वह सरकार हो, सरकारी उद्योग-धंधे हों या फिर श्रम-संगठन सब लोकप्रियता खोते गये.”

vo-1691-jeremy_corbyn_arrest_imageटोनी ब्लेयर को अपने लेख ‘फोर्जिंग अ न्यू एजेंडा’ में लगा कि मार्ग्रेट थैचर की नीतियां लोगों में लोकप्रिय हैं तो इसलिए कि लोग उन्हें ‘समूह-शक्ति की बढ़ती ताकत पर एक चोट’ की तरह देखते हैं. थैचरवाद की काट और लेबर पार्टी पुनरुत्थान के लिए ब्लेयर का नया समाधान लोक-कल्याणकारी राज्य की इस व्याख्या के अनुरूप ही था. उन्हें लग रहा था कि लेबर पार्टी को – “समाज का एक नया विचार गढ़ने की जरुरत है जो बाजार और राज्य दोनों के निहित स्वार्थों को पहचानता हो और (पार्टी को) जनहित की एक ऐसी धारणा खड़ा करनी होगी जो व्यक्ति के पक्ष में इन निहित स्वार्थों के खिलाफ खड़ी हो..”. इस धारणा को खड़ा करने में उन्हें नागरिकता का विचार पुराना और खोखला जान पड़ा, ब्लेयर ने लिखा कि “जब तक नागरिकता के विचार के साथ आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के साथ ही साथ उपभोक्ता के रुप में सरकारी और निजी सेवाओं के उपभोग का अधिकार नत्थी नहीं हो जाता तब तक वह संतोषजनक नहीं कहा जा सकता.” ब्लेयर का अपनी पार्टी के लिए समाधान यह था कि न तो पुरानी काट का समूहवाद (राज्यसत्ता, श्रम-संगठन, सरकार, राजकीय उद्योग) चलेगा, न ही नई तर्ज का व्यक्तिवाद क्योंकि “इक्कीसवीं सदी की विहान-वेला में बहस राज्यसत्ता बनाम बाजारसत्ता की रही ही नहीं बल्कि अब बहस इस बात की है कि कैसे राज्यसत्ता और बाजार-सत्ता को ‘लोकहित’ के अंकुश में रखा जाय.” लेबर पार्टी के इतिहास में पहली बार हुआ जब किसी नेता ने ‘नागरिक’ और ‘उपभोक्ता’ को एक करार दिया.

टोनी ब्लेयर ने लेबर पार्टी को उसके नये अवतार में फिर से चुनाव लड़ने के काबिल बनाया और चुनाव जीता भी. टोनी ब्लेयर और गार्डन ब्राऊन के नेतृत्व में यह पार्टी लगातार तेरह सालों (1997-2010) तक अपने बहुमत के बूते शासन में रही लेकिन ब्रिटेन की जनता के लिए इन्हीं सालों में लेबर पार्टी को कंजरवेटिव पार्टी के राजनीतिक विकल्प के रूप में पहचानना मुश्किल हो गया. आतंकवाद के विरुद्ध जार्ज बुश और ब्लेयर की जोड़ी कुछ ऐसी मशहूर हुई कि राज्यसत्ता को जनहित के अंकुश में रखने की हामी लेबर पार्टी की सरकार ने ‘नाइन एलेवन’ और ‘सेवन सेवन’ के नाम से कुख्यात आतंकी घटनाओं के बाद ब्रिटेन में नागरिक-अधिकारों की कटौती की. ब्रिटेन इराक पर अमेरिकी हमले का साझीदार बना और लीबिया पर बमबारी करने के लिए मतदान करनेवाले देशों का अगुआ कहलाया. बाजार-सत्ता को जनहित के अंकुश में रखने की हामी लेबर पार्टी ने ब्रिटेन की राजकीय स्वास्थ्य सेवा का निजीकरण किया और आर्थिक स्वेच्छाचारिता में डूबे बैंकों को संकट की घड़ी में राजकोष से ‘बेल-आऊट’ देने का काम किया. सामाजिक-कल्याण के लिए राजकोष खर्चने को लेकर लेबर पार्टी इतनी सतर्क थी कि उसके शासन के समय ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों को धन की कमी के कारण दान-दाताओं से गुहार लगानी पड़ी.

जेरेमी कोर्बिन की दिक्कत यह नहीं कि कंजरवेटिव पार्टी के नेता मानवाधिकारों के प्रति उनकी निष्ठा के कारण उन्हें आतंकवादियों का समर्थक और ब्रिटेन की एकता-अखंडता के लिए खतरा बताकर प्रचारित कर रहे हैं या फिर इस बात का जश्न मना रहे हैं कि लेबर पार्टी ने फिर से एक ऐसा नेता चुना है जो उसे चुनाव नहीं जीतवा सकता, कोर्बिन की असली दिक्कत तो खुद उनकी पार्टी है. लेबर पार्टी के भीतर कोर्बिन अपनी जीवनशैली और विचार के मामले में संभवतया अकेले हैं, ठीक गांधी की तरह. उनके नेता चुने जाने के बाद एलवर्ड मिलिबैंड के समय की शैडो-कैबिनेट के सदस्यों ने यों ही थोक भाव से इस्तीफा नहीं दिया और यह भी अकारण नहीं था कि नेता-पद के अपने नामांकन के लिए जरूरी न्यूनतम समर्थन भी उन्हें पार्टी के साथियों से एकदम से आखिरी घड़ी में हासिल हुआ. विजयी लेबर पार्टी की तेरह साल तक अगुवाई करने वाले टोनी ब्लेयर ने तो यहाँ तक कह दिया था कि यदि ‘जेरेमी कोर्बिन पार्टी के नेता-पद का चुनाव जीतते हैं तो हमारी हार 1983 या 2015 की भांति नहीं होगी, बल्कि एक तरह से ‘पार्टी ही का खात्मा हो जाएगा’.

जेरेमी कोर्बिन की असली दिक्कत यही है. आत्म-नियंत्रण यानी किफायतशारी के उनके राजनीतिक मूल्य से खुद ब्रिटेन की लेबर पार्टी को डर लगता है और ठीक इसी कारण कोर्बिन अपने विचारों के लिहाज से ‘एक गलत पार्टी में सही व्यक्ति’ कहलाये जाने को अभिशप्त हैं.

Advertisements

One thought on “जेरेमी कोर्बिन

  1. बेहद दिलचस्प और प्रेरणास्पद व्यक्तित्व से मुलाकात करवाने के लिए बेहद शुक्रिया । शेयर कर रहा हूँ । आभार 💐💐😊

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s