भाजपा के ‘फ़्लॉप’ सितारे

फ़िल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने ‘बिहार चुनाव में फिल्मी सितारे‘ शीर्षक से एक आलेख प्रभात खबर अख़बार में लिखा है जिसमें उन्होंने फ़िल्मी सितारों के बेअसर होने का विश्लेषण किया है. लेख संक्षिप्त है और करीब 500-550 शब्दों का है. लेखक यह बात कह सकते हैं कि छोटा आलेख होने के कारण वे अपनी बात ठीक से नहीं समझा पाये हैं. लेकिन यह टिप्पणी अपने मुद्दे को लेकर कोई समझ प्रस्तुत करने की जगह भ्रमित अधिक करती है जिसे रेखांकित करना बहुत ज़रूरी है.

अनुपम जी ने अजय देवगन के प्रभावहीन प्रचार पर लिखा है कि ‘पता नहीं किनके बुलावे पर उनका चुनाव प्रचार में बिहार आगमन हुआ था, क्योंकि भाजपा के शीर्ष नेताओं में भी कोई उन्हें तवज्जो देते नहीं दिखा.’ उन्होंने यह भी कहा है कि देवगन को अख़बारों ने भी अधिक महत्व नहीं दिया. लेखक ने सारा ठीकरा इस अभिनेता के माथे फोड़ दिया, पर यह समझने या समझाने की कोशिश नहीं की कि भाजपा अपने प्रचार-तंत्र को लेकर कितनी गंभीर होती है. सच तो यह है कि भाजपा की एक-एक रणनीति बहुत सोच-समझ कर बनायी गयी है. पटना में बैठे अनुपम जी के लिए यह जानना कोई पहाड़ तोड़ने जैसी बात नहीं होनी चाहिए कि देवगन को हेलीकॉप्टर से घुमाने का फ़ैसला बिना शीर्ष नेतृत्व की मर्जी के उन उम्मीदवारों ने ले लिया होगा जिनके पक्ष में वोट माँगने के लिए देवगन गये थे. देवगन प्रकाश झा की उन कुछ फिल्मों में काम कर चुके हैं जो कथित रूप से बिहार की पृष्ठभूमि पर बनी हैं. भाजपा उसी छवि को भुनाने के फ़ेर में थी. लेकिन जब भाजपा का ही भाव नीचे गिरा हुआ है, तो अजय देवगन बेचारा क्या कर लेता! उन्हें अदना-सा मुँह लेकर वापस चले जाना पड़ा. उनकी सभाओं में भगदड़ और मारपीट को भाजपा के चुनावी प्रबंधन की असफलता के रूप में भी देखा जाना चाहिए. देवगन अगर फुस्स हो गये, तो यह बात भी कही जानी चाहिए कि प्रकाश झा द्वारा बनायी गयी उन फ़िल्मों ने चालाक ढंग से बिहार की बनायी गयी ख़राब छवि को बड़े स्टार कास्ट के साथ भुनाने की कोशिश ही की थी. उन सतही और पूर्वाग्रह से ग्रस्त फ़िल्मों के पीछे की मानसिकता को भी बिहार की बड़ी आबादी समझती है.

funny-BJPख़ुद अनुपम जी ने ही प्रकाश झा की राजनीतिक विफलता का उल्लेख किया है. झा जी पहले निर्दलीय (2002), फिर रामविलास पासवान के दल (2009) और उसके बाद नीतीश कुमार की पार्टी (2014) से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं, पर तीनों बार औंधे मुँह गिरे. इससे एक तो झा जी की राजनीति स्पष्ट होती है और जाननेवाले यह भी जानते हैं कि राजनीतिक महत्वकाँक्षा के साथ उनके सियासी पैंतरों में कारोबारी एजेंडे का क्या लेना-देना था. यही कारण है कि मीडिया और जुगाड़ और धन के भरोसे कूदनेवाले झा जी बिहार के बदले हुए राजनीतिक माहौल में हाशिये पर भी नहीं हैं.

अनुपम जी ने देवगन की तरह हेमामालिनी के बेअसर होने की चर्चा भी की है. इसका भी वही कारण है जो देवगन के फ़्लॉप होने का है. बिहार में भाजपा की हालत बेहद ख़राब है. पार्टी के सबसे बड़े स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों में भी बहुत मशक्कत कर भीड़ जुटायी जा रही है. इतना ही नहीं, माहौल को भाँपते हुए उनकी सभाओं को रद्द भी किया जा रहा है और कार्यक्रम में बदलाव भी किया जा रहा है. भले ही केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को स्टारों की सूची से अनुपम जी ने निकाल दिया है, जो कि ठीक भी है, पर उनकी सभाओं की असफलता का कारण भी भाजपा की ख़राब चुनावी स्थिति ही है.

अनुपम जी यह बात नहीं बताना चाहते हैं. उन्हें यह बताना चाहिए कि बिहारी सिनेमा-टीवी के घोर उपभोक्ता हैं और भाजपा के दर्जन भर से अधिक केंद्रीय मंत्री और आस-पड़ोस के राज्यों के दिग्गज बिहार में कई सप्ताह से जमे हुए हैं. और, यह कि इसके बावज़ूद पार्टी का प्रचार ढीला है. इसे राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए, न कि कुछ रुपयों के लिए प्रचार करने आये सिने-कलाकारों की असफलता के रूप में.

लेकिन, अनुपम जी शायद अपनी वैचारिक और राजनीतिक रूझानों के कारण भाजपा या मोदी के गिरते ग्राफ़ का उल्लेख नहीं करना चाहते हैं. तभी तो वे भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा के पार्टी के प्रचार में शामिल नहीं होने के बारे में असली कारणों को नहीं लिख रहे हैं. उन्होंने कहा है, ‘आश्चर्य नहीं कि चुनाव के पहले सुर्खियां बटोरनेवाले स्टार प्रचारक शत्रुघ्न सिन्हा को आज कोई ढूंढ नहीं रहा. अपने संसदीय क्षेत्र तक में उन्हें भीड़ जुटाने लायक भी नहीं समझा जा रहा.’ जाननेवाले जानते हैं कि शत्रुघन सिन्हा की बिहार में क्या हैसियत है और जनता में उनकी लोकप्रियता किस कदर है. बिहार यह नहीं भूला है कि जब बिहार 1970 और 1980 के दशक में हत्या, लूट और ग़रीबी का पर्याय बना हुआ था तथा बिहारी होना एक बेचारगी थी, तब शत्रुघ्न सिन्हा ने उस मायानगरी में अपने को गर्व के साथ बिहारी बाबू कहलवाना पसंद किया था. जिस फ़िल्म उद्योग में लोग अपना नाम बदल देते हैं, पहचान छुपाते हैं, कैरियर का पूरा दारोमदार छवि के ऊपर निर्भर करता है, वहाँ शत्रुघन सिन्हा ने ग्लैमर, प्रसिद्धि, स्टारडम और धन की परवाह नहीं करते हुए ख़ुद को बिहारी कहा, और गर्व से कहा. यही कारण है कि आज उनका एक ट्वीट भी पहली ख़बरों में रखा जाता है. भाजपा को उन्हें मज़बूरी में प्रचार से बाहर रखना पड़ा है क्योंकि उन्होंने पार्टी द्वारा पैसे लेकर टिकट बाँटने का आरोप लगाया है. वे महँगाई, सांप्रदायिकता और नीतियों के स्तरहीन होने के बारे में अपनी नाराज़गी सार्वजनिक रूप से जता चुके हैं. यह भाजपा के लिए अच्छी स्थिति नहीं है. अनुपम जी जानते हैं, पर विशुद्ध राजनीतिक मसले को स्टारों की प्रभावहीनता की चादर से ढँकने की कोशिश कर रहे हैं.

आख़िरी बात, अनुपम जी ने बड़े हल्के ढंग से दक्षिण भारत की राजनीति और फ़िल्मी सितारों पर आधी पंक्ति की टिप्पणी की है- ‘दक्षिण भारत की बात थोड़ी देर के लिए छोड़ भी दें, जहां राजनीति में फिल्मी सितारों की सशक्त दखल होती है.’ इस पर लंबी बतकही हो सकती है और होनी भी चाहिए. दक्षिण के इस मसले को ऐसे नहीं समझा जा सकता है. वहाँ के कलाकार उन प्रदेशों की राजनीति से गहरे से जुड़े रहे हैं, उनके वैचारिक संबंध हैं, वे किसी बच्चन, देवगन, सलमान आदि की तरह भाड़े पर भीड़ जुटानेवाले लोग नहीं हैं. इस पर फिर कभी. अभी इतना ही कि अनुपम जी जैसे वरिष्ठों को भ्रम फैलाकर छद्म राजनीति नहीं करनी चाहिए.

प्रकाश के रे

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