हिंसक अमेरिकी संस्कृति

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं. 

राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिका मीडिया से आतंकवाद से मरे लोगों की संख्या और अमेरिका में बंदूक संस्कृति से मारे गये लोगों की संख्या की तुलना करने को कहा था. इस पर सोशल मीडिया पर एवरीटाउन फॉर गन सेफ़्टी अभियान ने आंकड़ा दिया है कि 2002-2013 के बीच दुनियाभर में आतंकवादी घटनाओं में 263 अमेरिकी नागरिकों की मौत हुई. इसी अवधि में बंदूक से अमेरिका में 1,41,796 लोग मारे गये. यानि, आतंक से 1400 गुना अधिक मौतें अमेरिका की बंदूक संस्कृति की वज़ह से हुई. स्थिति की भयावहता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि बंदूक से मारे जानेवालों की संख्या आतंक, युद्ध, एड्स, ड्रग्स आदि से मरनेवालों की कुल संख्या से बहुत अधिक है. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, हाल में हुईं गोलीबारी की 14 घटनाओं में से नौ मामलों में अभियुक्त आपराधिक पृष्ठभूमि और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त होने के बावज़ूद बंदूकें ख़रीदने में कामयाब रहे. और, फ़ेडरल एजेंसियों ने कथित जाँच के बाद इन अभियुक्तों द्वारा की गई हथियार ख़रीद को मंजूरी भी दी. जब भी अमेरिका में नरसंहार की घटना होती है, ऑस्ट्रेलिया का उल्लेख भी आता है. ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया द्वीप पर 1996 में एक बंदूकधारी ने 35 लोगों की हत्या कर दी थी. इस घटना के तुरंत बाद वहाँ की सरकार ने बंदूक ख़रीदने और रखने से संबंधित क़ानूनों को बहुत सख़्त बना दिया था. करीब दो दशकों की इस अवधि में समूचे ऑस्ट्रेलिया में जनसंहार की ऐसी कोई वारदात नहीं हुई है जिसमें पाँच या पाँच से अधिक लोगों की हत्या हुई हो.incidents-to-date

सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड में प्रकाशित एक लेख में माइकल पास्को ने लिखा है- ‘अमेरिका इस हद तक अपरिपक्व समाज है जिसे बंदूकों से खेलने की अनुमति नहीं होनी चाहिए. उसने अपनी पाशविक पश्चिम की पौराणिकता को कभी नहीं छोड़ा है. अमेरिकी अभी भी अपनी अदालतों का इस्तेमाल लोगों को मारने के लिए करते हैं, जिसका एक संदेश समाज में जाता है… वह एक ऐसा देश है जो जीवन से अधिक संपत्ति को मूल्यवान समझता है.’ दो साल पहले बंदूकों पर कुछ नियंत्रण करने के ओबामा के प्रस्ताव को रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों के विधायी सदस्यों ने नकार दिया था. तब भी, और उससे पहले ऐसी घटनाओं के समय ओबामा के भाषणों, और उससे पहले राष्ट्रपति चुनाव में उनके भाषणों, और अब, ओरेगॉन की घटना के बाद दिए गए भाषण को अमेरिका के स्तर से ‘क्रांतिकारी’ भले माना जाए, पर, जैसा कि विनय लाल कहते हैं, यह सब एक अगंभीर प्रयास हैं जिन्हें बंदूक संस्कृति पर कथित बहस के रूप में पेश किया जाता है.

अमेरिका को समझने के लिए पास्को की बात महत्वपूर्ण है. लंबे अरसे से अनगिनत लेखों और किताबों में कहा गया है कि अमेरिका की नींव में हिंसा की मानसिकता है. हिंसा के बिना अमेरिका की कल्पना संभव नहीं है. विनय लाल ने ओरेगॉन की घटना पर लिखे लेख में 1991 में इराक़ पर हुए अमेरिकी हमले के समय अपने मित्रों के साथ हुई चर्चा का उल्लेख किया है- ‘हम सभी इस बात से सहमत थे कि अमेरिकी मानसिकता में युद्ध समाहित हैः तब देश ऐसा प्रतीत होता था, जैसा कि आज भी हो रहा है, कि युद्ध की ज़ोर-शोर से तैयारियाँ चल रही हों. बमबारी तय थी और हज़ारों लोगों की मौत भी होनी थी जिन्हें महज ‘कोलैटरल डैमेज’ के रूप में चिन्हित किया जाना था. तब किसी ने टिप्पणी की थी कि जब अमेरिका दूसरे देशों को नत-मस्तक करने के लिए उन पर बम बरसाता है, उन्हें (जैसा कि एक अमेरिकी अधिकारी ने बहुत गर्व से घोषित किया था) पाषाण युग में धकेलने के लिए उद्यत होता है, तभी अमेरिका की सड़कों पर बहुत से लोग बंदूकों से जुड़ी हिंसा में मारे जाते हैं.’

ओरेगॉन की घटना के दो दिन बाद एक बार फिर राष्ट्रपति ओबामा व्हाइट हाऊस के पोडियम से शोक-संदेश दे रहे थे. अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी जहाज़ों ने एक अस्पताल पर हमला कर 19 लोगों की हत्या कर दी है जिनमें कई डॉक्टर थे. दो दिन पहले बंदूकों से होनेवाली घटनाओं पर दिए जानेवाले शोक-संदेशों को अपर्याप्त बतानेवाला राष्ट्रपति अफ़ग़ानिस्तान के हत्याकांड को ‘त्रासद घटना’ कह कर अपना औपचारिक दायित्व पूरा कर रहा था. इन दो घटनाओं के बीच के 72 घंटों में अमेरिका और अमेरिका के बाहर अमेरिकी हिंसक संस्कृति ने अनेक जगहों पर त्रासदी को अंजाम दिया होगा. यह और बात है कि कौन-सी ख़बर हम तक पहुँच पाती है या कौन-सी ख़बर हम पढ़ना चाहते हैं.

इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिकी हमले तथा सीरिया और लीबिया में सैन्य हस्तक्षेप के समाचार तो आते रहते हैं, पर अमेरिका के वैश्विक सैन्य अभियान का दायरा बहुत बड़ा है. पिछले साल अफ़्रीका में अमेरिका ने 674 सैनिका कार्रवाई की थी, यानि दो मिशन हर रोज़. वर्ष 2008 में यूएस-अफ़्रीका कमांड (एफ़्रीकॉम) के गठन के बाद अमेरिकी गतिविधियों में यह 300 फ़ीसदी की बढ़ोतरी है. दुनियाभर में 800 से अधिक अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं. अमेरिकी सेना की उपस्थिति 135 से अधिक देशों में है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति के साधारण जानकार को भी यह बात पता है कि अमेरिकी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और उसके सैन्य वर्चस्व में परस्पर संबंध इतना गहरा है कि एक के बिना दूसरे का कोई आस्तित्व नहीं हो सकता है. ओरेगॉन की घटना से कुछ ही दिन पहले राष्ट्रपति ओबामा संयुक्त राष्ट्र में कह रहे थे कि अमेरिका अकेले दुनिया की समस्याओं को हल नहीं कर सकता है. यह उनकी सीमा के बोध की अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि एक लापरवाह अहंकार था. दशकों से दुनिया कह रही है कि समस्याओं का समाधान बहुत हद तक सिर्फ़ इस बात से हो जाएगा कि अमेरिका सबके फटे में नाक घुसाना बंद कर दे. यही उपाय उसकी आंतरिक परेशानियों का भी हल है. उसकी हिंसक और संवेदनहीन जीवन और राजनीति का भयावह परिणाम विश्व भी भुगत रहा है और उसका अपना समाज भी. ओबामा और अन्य अमेरिकी राजनेता इस तथ्य को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं. कभी बुश की लंपटई, तो कभी ओबामा का मैनरिज़्म, तो कभी क्लिंटन का चार्म, तो कभी रेगन की ओडासिटी- अमेरिकी आत्ममुग्धता के विविध स्वरूप हैं. मदारी दुनिया को इनसे मोहग्रस्त भी कर लेता है.

वर्ष 1999 में एक अमेरिकी स्कूल में दो छात्रों द्वारा की गई गोलीबारी पर आधारित माइकल मूर की फ़िल्म (बॉउलिंग फ़ॉर कोलंबाइन, 2002) में एक दृश्य है. निर्देशक युवाओं में ख़ासा मशहूर कलाकार मेरिलीन मैंसन से पूछता है कि क्या वह उन आरोपों से सहमत है कि उसके या उसके जैसे अन्य कलाकारों के गीतों और मंचीय प्रदर्शनों में हिंसा के बखान का असर छात्रों और युवाओं को हिंसक बना रहा है. मैंसन जवाब देता है कि जब राष्ट्रपति दूसरे देशों पर मिसायल दागता है, तब युवाओं-किशोरों पर उसकी हिंसा के प्रभाव की चर्चा क्यों नहीं होती. आख़िर राजनेता अधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली होते हैं. ओरेगॉन की घटना के बाद जो प्रतिक्रियाएँ अमेरिकी लोकवृत्त में आई हैं, उनसे तो कतई यह उम्मीद नहीं बनती है कि अमेरिका बंदूक संस्कृति के बारे में निकट भविष्य में कोई ठोस पहल करेगा. इसके उलट अधिक संभावना यह है कि बंदूक पहले से कहीं अधिक सहजता से उपलब्ध और प्रयुक्त होने लगें. वहाँ तो पुलिस द्वारा निहत्थे लोगों को गोली मारने की कई घटनाएँ भी हो चुकी हैं. और, इस उम्मीद की चर्चा भी क्या करना कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका अपनी भयानक गुंडागर्दी से परहेज़ करेगा! इस बारे में किसी को कोई सुबहा हो तो वह डेमोक्रेट और रिपब्लिकन उम्मीदवारों की विदेश नीति पर नज़र दौड़ा सकता है. 

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