मझधार में तुर्की की राजनीति

डॉ. राजन कुमार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में प्राध्यापक हैं. उनसे rajan75jnu@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.

डॉ. राजन कुमार

डॉ. राजन कुमार

अगर सत्ता मे परिवर्तन नहीं हो तो चुनाव दिलचस्प नहीं होता. तुर्की के चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ. प्रधानमंत्री,  रेसेप तायईप अरर्दोआं, जो कि जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी के नेता हैं,  देश के पहले प्रत्यक्ष राष्ट्रपति के चुनाव में जीत गये हैं. 60 वर्षीय अरर्दोआं, 2003 से तीन बार तुर्की के प्रधानमंत्री रह चुके हैं और पार्टी के नियमों के अनुसार वो चौथी बार प्रधानमंत्री नहीं बन सकते थे. इसलिए सत्ता में रहने के लिए उन्होने दूसरा तरीका अपनाया. इससे पहले, राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से संसद के मध्यम से होता था. यह पद प्रधानमंत्री की तुलना मे केवल अलंकारिक ही होता था. लेकिन 2010 के जनमत संग्रह के बाद प्रत्यक्ष चुनाव का प्रावधान लाया गया और अब तुर्की एक प्रेसीडेंशियल (अध्यक्षीय) व्यवस्था की ओर अग्रसर है, जहाँ राष्ट्रपति का पद ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया है. अरर्दोआं संवैधानिक संशोधन की तैयारी में हैं. अगले साल के संसदीय चुनाव मे अगर उनकी पार्टी को अच्छा बहुमत मिलता है तो वे संशोधन कर पाएँगे. अरर्दोआं को इस चुनाव में लगभग 52 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि विरोधी प्रत्याशी एक्मेलेदिन इहसनोग्लू को लगभग 39 प्रतिशत वोट मिले हैं. अरर्दोआं को रूढ़िवादी मतदाताओं का समर्थन है और वे नव-उदारवादी नीतियों के लिए जाने जाते हैं. उनकी धार्मिक नीतियों से तुर्की के धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठ रहा है. साथ ही उनके तीन बार प्रधानमंत्री के बाद अब राष्ट्रपति बनने से लोकतंत्र पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं. उनका तुलना रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से की जा रही है, जो लगभग 15 वर्षों से राजनीतिक व्यवस्था पर नियंत्रण बनाए हुए हैं.  

भारत की ही तरह तुर्की एक नये राजनीति मोड़ पर खड़ा दिख रहा है. सेकूलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता का संरक्षण, भ्रष्टाचार और इस्लामिक कट्टरवाद वहाँ के प्रमुख राजनीतिक मुद्दे हैं. विदेशी नीतियों में भी कोई स्पष्टता और दिशा नहीं दिख रही है. पड़ोसी देश सीरिया और इराक़ में सुन्नी कट्टरवाद का बढ़ता नियंत्रण तुर्की के लिए ख़तरे की स्थिति पैदा कर रहा है. नाटो और अमेरिका के साथ रहना उसकी मजबूरी है, लेकिन उसके फाय़दे उसे नहीं मिल रहे हैं. युरोपियन यूनियन में उनकी सदस्यता एक दूर का सपना बन कर रह गया है. सीरिया में अमेरिकी हस्तक्षेप की उनकी इच्छा पूरी न हो सकी. इसके उलट इराक़ में जिहादी सुन्नी समूह इस्लामिक स्टेट का प्रभाव बढ़ रहा है. माना जाता है कि सीरिया में तुर्की ने इस गुट को समर्थन दिया था. आज यह तुर्की के लिए ही परेशानी का कारण बन रहा है. 2r

कभी बहुत लोकप्रिय रही अरर्दोआं सरकार जल्द ही विवादों में घिर गयी. प्रधानमंत्री अरर्दोआं भ्रष्टाचार और कुशासन में फँसे हुए नज़र आ रहे थे. 17 दिसंबर को एक फोन वार्तालाप में पाया गया था कि वे अपने बेटे को 1 बिलियन डॉलर छुपाने का आदेश दे रहे थे. यह वार्तालाप यूट्यूब और ट्विटर पर जंगल की आग की तरह फैला और तुर्की सरकार को यूट्यूब पर प्रतिबंध लगाना पड़ा. यह मुद्दा ख़त्म नहीं हुआ था कि सोमा में, कोयले की खान में आग लग गई, जिसमें 300 से ज़्यादा लोगो की जान चली गयी. कई लोगों का मानना है कि यह कोई दुर्घटना नहीं थी, बल्कि सरकारी लापरवाही और उदासीनता का नतीजा थी.

इन घटनाओं से अरर्दोआं सरकार की लोकप्रियता काफ़ी कम हो गयी थी. लेकिन मजबूत विरोधी दल के अभाव में अरर्दोआं का कोई विकल्प नहीं था. लेकिन जो चुनावी बहस तुर्की में चल रही थी, वह काफ़ी दिलचस्प है. ख़ासकर इसलिए कि कुछ महीने पूर्व भारत में भी कुछ ऐसी ही बहस थी. तुर्की का मध्य वर्ग भारत की तरह ‘सेक्युलरिस्ट’ यानी धर्मनिरपेक्ष और ‘कल्चरल नेशनलिस्ट’ यानी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी खेमे में विभाजित है. धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ और उसके समर्थक इस बात की गुहार लगा रहे हैं कि अरर्दोआं की सरकार ने धर्मनिरपेक्षता को कमजोर कर दिया है. कुछ महीने पहले सरकार ने एक सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया शुरू की जिसके तहत धर्मनिरपेक्षता को पुनर्परिभाषित करने की बात कही गयी थी. यह एक तरह से संविधान में धर्मनिरपेक्षता को बदलने का प्रयास था जो कि 1980 सैन्य शासन के बाद से लागू है. तुर्की की सेना धर्मनिरपेक्ष दल को समर्थन देती है और कई बार इसने धर्म के राजनीतिक प्रभाव को बढ़ने से रोका है. धर्मनिरपेक्ष अभिजात वर्ग इस्लाम के बढ़ते प्रभाव से सहमे हुए हैं. प्रधानमंत्री अरर्दोआं की पार्टी, जो इस्लामी परम्परा का प्रतिनिधित्व करती है, उसने धर्मनिरपेक्षता को अपने तरीके से परिभाषित करने की कोशिश की है. उनका मानना है कि राज्य धर्मनिरपेक्ष हो सकता है, कोई व्यक्ति नही. सार्वजनिक क्षेत्र में जो धर्म पर प्रतिबंध 1923 से चल रहा था, उसको बदलने का प्रयास चल रहा है. अरर्दोआं एक ‘पवित्र पीढ़ी’ बनाने की बात करते हैं और उन्होंने मदरसों की तरह धार्मिक स्कूलों को अनुमति दी है. तुर्की संसद ने तो हिजाब (हेड्सकार्फ़) के प्रतिबंध को भी हटा दिया था, लेकिन अदालत ने इसको संविधान विरोधी कह कर रद्द कर दिया था.

तुर्की के मध्य वर्ग के लिए धर्मनिरपेक्षता एक गंभीर मुद्दा है. उनको डर है कि अगर इन मूल्यों का त्याग हुआ तो तुर्की इस्लामी राजनीति में फँस जाएगा और जो इतिहास अतातुर्क कमाल पाशा के साथ शुरू हुआ था, वह नष्ट हो जाएगा. कुछ लोग ओवर-सेक्युलराइज़ेशन (अति-धर्मनिरपेक्षता) पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं. वे मानते हैं कि इस्लाम का बढ़ता प्रभाव, ओवर-सेकूलरिज्म का  परिणाम है. कितना करीब लगता है यह विषय, भारत के धर्मनिरपेक्षता पर बहस के! ये बातें यह संकेत हैं कि सेकूलरिज्म सच मे संकट के दौर से गुजर रहा है.1r

तुर्की की राजनीति कैसे दक्षिणपंथी होता जा रहा है, यह इससे पता चलता है कि जो विरोधी शक्तियां वहाँ शक्तिशाली होती जा रही हैं, वे भी एक इस्लामिक आंदोलन से जुड़ी हैं. फ़ेथुल्लाह गुलेन अमेरिका मे रहते हैं, इस्लामी परंपरा से जुड़े हुए हैं और इस्लामी स्कूल चलाते हैं. उनका तुर्की मीडिया पर भी काफ़ी नियंत्रण है. वे अमेरिका की नीतियों का भी समर्थन करते हैं. जब तुर्की जहाज़ ग़ाज़ा राहत कार्य के लिए जा रहा था तो इजरायल ने उस पर आक्रमण करके 9 तुर्की लोगों को मार दिया था. इसकी दुनिया भर में निंदा हुई थी, लेकिन गुलेन ने इजरायल का पक्ष ये कह कर लिया था कि तुर्की को दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप नही करना चाहिए. वे पहले जस्टिस एंड डेवेलपमेंट पार्टी के ही साथ थे. लेकिन 2013 में अरर्दोआं ने गुलेन-समर्थित निजी स्कूलों को बंद करने का आदेश दिया था. अभी गुलेन आंदोलन काफ़ी प्रभावी होता दिख रहा है. दिलचस्प है कि प्रशासन पर उनकी काफ़ी पकड़ है.

आज पूरे पश्चिम एशिया में समस्या यह है कि सरकारें तानाशाही हैं. लेकिन जहाँ भी उनके विरोध मे आंदोलन हो रहा है, वहाँ इस्लामी कट्टरपंथियों का प्रभाव काफ़ी ज़्यादा होता जा रहा है. इन इस्लामी दलों में अल-क़ायदा की भी घुसपैठ है. रूढ़िवादी लोगो का बोलबाला काफ़ी बढ़ता जा रहा है. पूरे पश्चिम एशिया में आज अस्थिरता की स्थिति है. इराक़ एक बिखरता हुआ देश नज़र आ रहा है. वहाँ के सुन्नी अतिवादी शिया सरकार के खिलाफ हैं. वहाँ के कुर्द लोग भी सुन्नी अतिवादियों का निशाना बने हुए हैं. अगर इराक़ का विघटन सांप्रदायिक आधार पर हुआ तो वहाँ के कुर्द और तुर्की के कुर्दों के संबंध बनेंगे और यह तुर्की के लिए काफ़ी ख़तरनाक साबित हो सकता है. तुर्की में कुर्दों का संगठन पी.के.के काफ़ी शक्तिशाली है और उनका सरकार पर संघीय व्यवस्था और स्वायतता के लिए काफ़ी दबाब है. सीरिया मे पहले ही स्थिति काफ़ी ख़तरनाक है. सीरिया का असंतुलन तुर्की को काफ़ी प्रभावित करेगा. अभी भी तुर्की में काफ़ी सीरियाई शरणार्थी हैं.

तुर्की की राजनीति में सेना का भी काफ़ी दबदबा रहा है. कई बार तख्ता पलट भी हो चुका है. जब जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी 2002 में सत्ता में आई तो इसने सेना के वर्चस्व को काफ़ी कम कर दिया. यह तुर्की के लिए नयी बात थी. लोगों को एक नयी उम्मीद जगी थी कि शायद जनतंत्र की जड़ें मजबूत हो रही है और अरर्दोआं भले ही धार्मिक हों, लेकिन बदलाव लाएँगे. आर्थिक स्थिति भी काफ़ी अच्छी हो रही थी. लेकिन अब ये सपना टूटता नज़र आ रहा है!

वहाँ के बुद्धिजीवियों से बात करके लगता है कि उनके मन मे एक डर है, संशय है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह आलम है कि लोग सच सोच-समझकर और उपयुक्त जगहों पर ही बोलना पसंद करते हैं. यह स्थिति तुर्की जनतंत्र के लिए ख़तरनाक है. आंतरिक और बाह्य संकटों से जूझती तुर्की की राजनीति शैतान और गहरे काले समुद्र के बीच मे फँसी दिखती है.

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