टीवी में देसी मिट्टी की सोंधी गंध और भारतीय अंतरात्मा

उदय प्रकाश

उदय प्रकाश। मशहूर कवि, कथाकार, पत्रकार और फिल्मकार। कई कृतियों के अंग्रेजी, जर्मन, जापानी एवं अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध। लगभग समस्त भारतीय भाषाओं में रचनाएं अनूदित। ‘उपरांत’ और ‘मोहन दास’ के नाम से इनकी कहानियों पर फीचर फिल्में भी बन चुकी हैं। उनसे udayprakash05@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

वह उद्भट समाजशास्त्री, मीडिया-विशेषज्ञ, ग्रामीण-अर्थव्यवस्था पर पैनी निगाह रखने वाला अर्थशास्त्री और साहित्य तथा संस्कृति के परिवर्तनों के एक-एक मोड़ की गहरी परख रखने वाला  बैद्धिक, राजधानी दिल्ली के  नगर पश्चिमविहार के अपने फ़्लैट में, पिछले २ मार्च को चुपचाप दुनिया छोड गया और हिंदी के अखबारों और टीवी चैनलों में सिर्फ सनसनीखेज़ चुनावी खबरें गूंजती रहीं। इन खबरों में उसका जाना कहीं नहीं था ।  

१९८४ में जब इसी दिल्ली में श्रीमती इंदिरा गांधी की ह्त्या के बाद दंगे भड़के थे, तब स्व राजीव गांधी का वक्तव्य अब एक सर्वकालिक मुहावरा बन चुका है, जो बार-बार दोहराया जाता है , –जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है , तो धरती हिलती है। 

लेकिन लग यही रहा है कि ऐसे ‘बड़े पेड़’ अब सिर्फ राजनीति के मैदान में ही उगा और गिरा करते हैं।  राजनीति के बाहर के किसी भी ज्ञान-विज्ञान , कला-संस्कृति , अर्थ या समाजविज्ञान के अनुशासनों में बड़े से बड़ा योगदान देने वाला कोई  भी व्यक्तित्व अब उतना बड़ा पेड़ नहीँ बन सकता , जिससे धरती तो क्या, एलेक्ट्रोनिक मीडिया और फिसड्डी अखबार तक हिलें।  ऐसे लोग अब मौज़ूदा दौर के हाशियों में उगे खर-पतवार या जंगली पौधे हैं, जो उगते और जीते हैं कुदरत के भरोसे। न उनका होना कोई ‘खबर’ है, न उनका जाना । क्योंकि इससे न तो कोई टीआरपी बढ़ती है, न सेंसेक्स छलांग लगाता है, न कोई सरकार बनती-गिरती है ।

मैं विख्यात समाजशास्त्री और मीडिया विशेषज्ञ  पी सी जोशी  (पूरनचन्द्र जोशी) की बात कर रहा हूँ। आज भी अधिकतर लोग भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भूतपूर्व महासचिव पी सी जोशी जी के नाम से तो परिचित हैं, लेकिन इन पी सी जोशी के महत्व को जानने वाले बहुत कम लोग होंगे।  हांलाकि अविभाजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता पी सी जोशी का योगदान भी बहुत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक था, लेकिन उनसे लगभग दो दशक कम उम्र के समाज-वैग्यानिक पूरनचन्द्र जोशी का योगदान भी महत्वपूर्ण था. इसके पहले कि मैं उनके बारे में और कुछ बताऊं, उन्होंने कई साल पहले, मुझसे हुई बातचीत में जो कुछ कहा था, जो उनकी ही एक पुस्तक मेरे साक्षात्कार में प्रकाशित है, के कुछ अंश आपके लिए प्रस्तुत करता हूं. आप स्वयं पायेंगे कि उनका कहा आज भी कितना प्रासंगिक है :

हर धर्म की लिप सर्विस‘ (चापलूसी) करना धर्मनिरपेक्षतानहीं है।  धर्मनिरपेक्षताका मतलब न तो हर धर्म की अंधभक्ति है और न ही नास्तिकता। अब ऐसा समय आ गया है जब हर धार्मिक संप्रदाय को यह बताना ज़रूरी हो गया है कि ज़माना तेज़ी से बदल रहा है। तुम्हें भी बदलना चाहिए। आगे की ओर चलना चाहिए। अगर पुरानी इबारतों, पुरानी किताबों, पुरानी रूढ़ियों से चिपके रहोगे तो पीछे छूट जाओगे। हमारे सारे संचार माध्यमों का इस्तेमाल यही बताने के लिए होना चाहिए। मेरा तो कहना है कि टेलीविज़न में यह कभी नहीं दिखाना चाहिए कि राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री फलां मंदिर या फलां मस्ज़िद, फलां गुरुद्वारा या चर्च में गये और वहां शीश नवाया, प्रार्थना-पूजा की । अगर ऐसा दिखाया जाता है तो आडिटर (सालीसीटर) जनरल को इस पर कड़ा एतराज़ करना चाहिए ।अगर कोई अपनी निजी आस्था के कारण  ऐसा करता है, तो करे  लेकिन सरकारी वाहन, सरकारी सुरक्षा, राजकीय विशेषाधिकारों का इस्तेमाल न करे और न मीडिया को अपना प्रचार तंत्र बनाए । आज जिस तरह राजनीति का सांप्रदायिकीकरण हो गया है, उसमें ऐसी हरकतें विभिन्न समुदायों के बीच एकता की जगह उन्हें अलग-अलग बांट कर फूट डालती हैं। 

किसी धर्म को सत्ता की कोई बैसाखी नहीं मिलनी चाहिए। संतों-पीरों ने कहा है कि धर्म और सत्ता का हमेशा से बैर रहा है । अब हमारे यहां ये कैसे धर्म पैदा हो गये हैं, जिनकी आंखें लगातार सत्ता की ओर लगी रहती हैं।?

जो धर्म सत्ताओं का सहारा ले या सत्ता-लोलुप हो, वह अनैतिक है। उसको सत्ता में रहने का कोई हक़ नहीं है।

pcjयह उस व्यक्ति का कहना था, जिसे सन १९८२  में उस समय इस देश के लिए एक अलग और सामाजिक ज़िम्मेदारी से संपन्न  ‘मीडिया पालिसी ‘ का सुझाव देने के लिए चुना गया था , जब पहली बार ‘आकाशवाणी’ के रेडियो केंद्र से अलग और स्वायत्त हो कर टेलीविज़न दिल्ली के सिर्फ आसपास के इलाके से बाहर, देश के सुदूर इलाकों में जाने के लिए तैयार और रंगीन  हो रहा था।  वही समय जब राजीव गांधी की अगुआई में दिल्ली में एशियन गेम्स आयोजित हो रहे थे, पहली बार  मारुती-800 दिल्ली की सड़कों पर दौड़ती हुई पुराने एम्बेसेडर और फिएट कारों को फैशन से बाहर निकाल रही थी । जब ‘वाकी टाकी ‘ हाथ में रखना स्टेटस सिम्बल बन चुका था , तब पी सी जोशी की निगाह टेक्नोलॉजी के बदलाव को जांचती-परखती हुईं समूचे भारतीय समाज पर इसके पडने वाले असर को लेकर फिक्रमंद थी। 

”…यह मत भूलिये कि कोई भी तकनीक मनुष्य की आंतरिक, नैसर्गिक उपज नहीं है. वह हमेशा एक बाहरी शक्ति है. और उस टेक्नोलाजी का एक अलग समानांतर तर्क होता है. हो यह भी सकता है कि समाज कहीं टेक्नोलाजी का गुलाम न हो जाय. …

तेक्नोलाजी किसके हाथ में है, यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है.  भगत सिंह की पिस्तौल और जनरल डायर की पिस्तौल का इस्तेमाल एक ही उद्देश्य के लिए नहीं होता. वैसे मार्शल म्मैक्लूहन ने तो इलेक्ट्रोनिक मीडिया के बारे में साफ़-साफ़ कहा था कि कि मीडिया तो अपने मूल स्वभाव में मानवीय है, लोकतांत्रिक है. अपने स्वभाव में यह सक्रिय, प्रगतिशील, प्रभावशाली और सार्वजनीन है. यह ‘एलीटिस्ट’ नहीं है. लेकिन आज आप देखिये, क्या हो रहा है ? हमारे देश में ही नहीं, दुनिया भर में टेलीविज़न, रेडियो या सिनेमा का इस्तेमाल एक निकम्मे दर्शक समाज को गढ़ने के लिए हो रहा है ..!”

यह बात पी.सी. जोशी ने नब्बे के दशक में कही थी. आज तो उनकी द्रूष्टि और भी प्रखर होती, जब इसका इस्तेमाल कार्पोरेट कंपनियों के मुनाफ़े, अंधविश्वासों के प्रचार, राजनीतिक नीयत  और भयावह पतनशील अपसंस्कृति की खिदमत में समाज की अभिरुचियों को विकृत और विरूप करने के लिए हो रहा है . 

उनकी अध्यक्षता में बनी ‘पी सी जोशी कमेटी’ की रिपोर्ट , जो १९८४ में पूरी हो कर सरकार को सौंपी गयी थी, अगर उसके पन्ने  सूचना-प्रसारण मंत्रालय के किसी मंत्री या आला अफसर ने उलटा-पुलटा कर देखे होते, तो आज टीवी की जैसी धंधेबाजी चल रही है और जिस तरह उसकी सूचनाएं ही नहीं, पूरे के पूरे चैनल बिक रहे हैं , व्यापारिक घरानों और राजनीतिक दलों से लाखों-करोड़ों की  ‘डीलबाजी’ करने वाले पत्रकारों के कारनामे सामने आ रहे हैं , इस सब पर एक अंकुश लगाया जा सकता था।  मीडिया भले ही बहुत ताकतवर हो , उसे लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ कहा जाता हो , लेकिन उसे उस महान और अदृश्य रहने वाले ‘विराट -स्तंभ ‘ से बड़ा और ताकतवर नहीं होने देना चाहिए, जिसे ‘जनता’ कहा जाता है।    पीसी जोशी कमेटी में विख्यात फ़िल्म \निर्देशक  मृणाल सेन, सई  परांजपे और दादा साहेब फालके सम्मान प्राप्त करने वाले संगीतकार भूपेन हज़ारिका जैसे व्यक्तित्व भी थे, जो कला, सूचना, सन्देश, सम्प्रेषण और समाज के सम्बन्धों की गम्भीरता और उसके परिणामों के बारे में जानते थे।  इसीलिए यह कमेटी यूरोप या अमेरिका के आधुनिक, औद्योगिक, समृद्ध और विक्सित हो चुके देशों के टेलीविज़न और हमारे अपने पिछड़े , गरीब, असाक्षर  और तमाम  तरह की रूढ़ियों-जटिलताओं से भरे समाज के लिए एक अलग तरह का टेलीविज़न चाहती थी।  ऐसा टीवी जिसका चेहरा और जिसकी आत्मा में हिन्दुस्तानी मिट्टी की गंध हो।  जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी गयी थी, उसका शीर्षक भी यही था : ‘एन इंडियन पर्सनालिटी फार टीवी ‘ .| उस रिपोर्ट को उठा कर आलमारी में रख दिया गया और अब आप देख ही रहे हैं २०० चैनलों की  ‘इन्डियन पर्सनालिटी ‘ ‘भारतीय मिट्टी की सोंधी गंध ‘ ?

इसीलिए जब मुझे दिल्ली के मिरांडा कालेज के एक कार्यक्रम में जब पीसी जोशी के निधन की सूचना छह दिन बाद मिली तो बहुत आश्चर्य नहीं हुआ. गहरा दुःख ज़रूर पैदा हुआ।  उनके निधन की सूचना कहीं नहीं थी।  जब कि मुझे ही नहीं, इस देश के लाखों करोड़ों दर्शकों या टीवी उपभोक्ताओं को लगता होगा कि हमारे देश के वैज्ञानिक, समाजविद , कला-संस्कृतिकर्मी , इतिहास और पुरातात्विक अन्वेषणों  आदि में अपनी ज़िंदगी होम कर देने वाले व्यक्तित्व किसी भी चालू अपराधी, भ्रष्ट नेता या बालीवुड मनोरंजन कारखाने में एक ठुमके पर करोड़ों की कमाई और हिंसा तथा नंगई के बॉक्स आफिस सुपरहिट  माल का उत्पादन करने वाले एक्टर्स से अधिक कीमती और अनमोल हैं।  दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘इंस्टीच्यूट आफ इकोनामिक ग्रोथ’ के निर्देशक रह चुके और कल्चरल डाइनेमिक्स आफ इकोनॉमिक ग्रोथजैसी विख्यात पुस्तक के लेखक पी सी जोशी ने कुछ समय पहले  चेतावनी दी थी :

सच्चाई  यह है कि हमारे संचार माध्यमों का की अकूत क्षमता का भयावह दुरुपयोग हो रहा है।  उनके पास कोई थिंकटैंकही नहीं है , जो सूचनाओं और समाचारों को गंभीरता  से ले।  मैंने उसी समय सत्यजित रे, भूपेन  हज़ारिका  और मृणाल सेन से बात की थी कि आप लोग इस माध्यम का दुरुपयोग होते देख कर इससे मुंह मत मोड़िये।  इसमें शामिल होकर इसे बदलिए।  नहीं तो यह इलेक्ट्रानिक मीडिया लोगों की रुचि को इतना विकृत और प्रदूषित कर देगा वे लोग आप जैसों की फिल्मों का आनंद उठाने लायक नहीं रह जाएंगे।”  दुर्भाग्य से ऐसा ही हुआ।

पी सी जोशी भारतीय साहित्य से भी गहरा लगाव रखते थे।  हिंदी के कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास पर लिखा गया उनका आलेख भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था और ‘गोदान’ तथा अन्य उपन्यासों के साथ उसके अंतरसंबंधों को बहुत बुनियादी तरीके से समझने की दृष्टि  देता है। 

पी सी जोशी का इस तरह चले जाना , मेरे जैसों के लिए एक दुखद खबर है, भले ही इस खबर को किसी व्यावसायिक टीवी चैनल और अखबार में कोई जगह न दी गयी हो।

उनकी स्मृति को विनम्र श्रद्धांजलि !

(वे मेरे जे एन यू के दिनों में शोध के दौरान डा. नामवर सिंह के अतिरिक्त दूसरे शोध निदेशक थे. उन पर एक अलग संस्मरण लिखने का मन है. ६ मार्च को मिरांडा हाउस में ‘लेखक से मुलाकात’ कार्यक्रम में संज्ञा उपाध्याय जी ने उनके निधन की दुखद सूचना दी थी. पश्चिम विहार, नयी दिल्ली में स्व. जोशी जी ‘कथन’ के संपादक, वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय के पड़ोसी थे.) यह तात्कालिक टिप्पणी मराठी के लोकप्रिय पत्र -‘सकाल टाइम्स’ के लिए लिखा था.)

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