मातृभाषा ख़तम तो आप ख़तम

नितिन चंद्रा फ़िल्मकार हैं. उनसे nitinchandra25[at]gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

नितिन चंद्रा

नितिन चंद्रा

भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत 1962 में हुई, राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने नज़ीर हुसैन साहब को कहा कि भोजपुरी बनाइये इत्यादि बातें अनगिनत बार हो चुकी हैं और जो लोग भोजपुरी सिनेमा को पास या दूर से जानते हैं ये पढ़ चुके हैं, 52 साल हो गए और हालत ये है कि आज का भोजपुरी सिनेमा अपने तीसरे दौर के अंतिम समय पर आ गया है । चारो तरफ वितरक त्राहिमाम कर रहे हैं । ना कोई स्टार चल पा रहा है ना कोई कहानी । और आश्चर्य की बात यह है कि हिंदी के बाद सबसे ज्यादा क्षेत्रों में भोजपुरी रीलीज़ होती है ।

कारण ?

कारण कई हैं, कुछ सामने हैं, कुछ छिपे हुए हैं, कुछ नए हैं और कुछ कारण जड़ में हैं । आप अमूमन सुनेंगे, “अरे बड़ा गंदा बनाते हैं भोजपुरी वाले ।” हाँ गंदा है पर क्यूँ ? लोग कहेंगे, अच्छी फिल्में बननी चाहिए भोजपुरी में । नहीं बनेंगी अच्छी फिल्में पर क्यूँ ?

मैं कई ऐसे घरों को जानता हूँ मोतिहारी, बेतिया, छपरा, आरा, और मेरे गाँव डुमरांव में जहां अभिभावक अपने बच्चों से भोजपुरी में बात नहीं करते । ये वही लोग हैं जो इस गलतफ़हमी में रह गए कि भोजपुरी सीखेगा तो बच्चे की हिंदी और अंग्रेज़ी ख़राब हो जायेगी । इसके जड़ में जाना होगा और समझना होगा कि आख़िर ये सोच दक्षिण, महाराष्ट्र, बंगाल, पंजाब, गुजरात और शायद देश के किसी हिस्से में नहीं आई लेकिन बिहार और उत्तर प्रदेश में ही क्यूँ । मैंने एक बार अपने चाचा से पूछा कि आपने गौरव (मेरा चचेरा भाई) से कभी भोजपुरी में बात क्यूँ नहीं की तो उन्होंने कहा, “बै.. अब इतना कौन सोचता” । सही कहा, आम बिहारियों ने कभी अपनी भाषा के बारे में सोचा ही नहीं । उन्हें भाषा के बारे में क्या और क्यूँ और कैसे सोचना है, पता तक नहीं है । कुछ और अभिभावकों से मैंने बात कि तो वह कहने लगे की अरे क्या ज़रूरत है भोजपुरी सीखने का, मगही सीखने का । हिंदी राष्ट्र भाषा है ।

यह भोजपुरी सिनेमा के भद्दे और निचले स्तर का होने के कारण के जड़ का सबसे मजबूत हिस्सा है । “हिंदी राष्ट्र भाषा है ।” इसी झूठ में बिहारी, उत्तर प्रदेश वाले और करोड़ों लोग बर्बाद हो रहे हैं या हो चुके हैं । हिंदी राष्ट्रीय भाषा नहीं है भाई । कहीं लिख लीजिये । हाँ भारत की राष्ट्र भाषा हिंदी नहीं है । नहीं है । नहीं है । भारत के संविधान ने किसी भी भाषा को राष्ट्र भाषा का दर्जा नहीं दिया है । लेकिन इस झूठ का तमाचा इतनी ज़ोर से मारा गया है कि इसकी छाप हमारे हड्डियों का मज्जा बन गई । अब किसी दधीचि की दरकार है । हम बिहारी, पूर्वांचली हमेशा से राष्ट्रीय स्तर पर सोचते हैं । शायद यही कारण है कि उत्तर प्रदेश ने भर-भर के प्रधान मंत्री दिए और बिहार ने कैबिनेट मंत्री, और सैकड़ों ब्यूरोक्रैट्स । इसी दिल्ली प्रेम ने शायद बिहार को आज ख़त्म कर दिया, उसकी भाषा और सांस्कृतिक उत्पादों का क़त्ल कर दिया । आज एक 18-20 साल का भोजपुरी भाषी युवा अपनी भाषा पर गर्व नहीं कर सकता क्यूंकि उसके पास अपनी भाषा पर गर्व करने के लिए कुछ नहीं है । उधर बिहार की राजधानी दिल्ली बन गयी और उत्तर प्रदेश की राजधानी मुम्बई ।

फ़िल्म को अगर एक प्रॉडक्ट कहें तो इसको बनाने में बहुत सारा कच्चा माल लगता है । भाषा उनमें से एक है, एक रॉ मटेरियल । फ़िल्म बनाते समय कई बार लोग भाषा विशेषज्ञ (language expert) को रखते हैं ताकि भाषा की गुणवत्ता बनी रहे । देसवा बनाते वक़्त भी मैंने यह किया था, बक्सर जिला के मझवारी में मेरे मित्र रोहित जी को मैंने स्क्रिप्ट लिखने से लेकर बंबई में पूरी डबिंग के दौरान अपने साथ ही रखा, ताकि सही भोजपुरी का इस्तेमाल हो सके ।

आश्चर्य ना करें लेकिन भोजपुरी सिनेमा की सबसे बड़ी दिक्कत है आम भोजपुरिया जनता । लेकिन वो इसके जिम्मेदार नहीं हैं । वैसे भोजपुरियों का भोजपुरी प्रेम तब जागता है जब वो अपने भोजपुरी मिट्टी को छोड़कर बाहर निकल जाते हैं । अब मेरे साथ ये हुआ कि बचपन से माता पिता ने भोजपुरी में बात नहीं की । क्या कारण था, उनको ख़ुद को ही नहीं पता, कई बार पूछा । पटना की बात करें, हर इंसान बिहार की किसी प्रमुख भाषा से आता है लेकिन पटना आने के बाद, अधिकतर लोग एक अज़ीब-सी भाषा में बात करते हैं, जिसको भोंदी (भोजपुरी + हिंदी), मंदी (मगही + हिंदी) इत्यादि कह सकते हैं, जिसमें स्त्रीलिंग मर जाती है क्यूंकि मातृ भाषा मर जाती है, और माँ एक स्त्री होती है । “देखो तो रे मंटुआ, ट्रेनवा कौ बजे आयेगा ।” ऐ बिकाश, ऐ सीतल, चलो ना जी जल्दी – जल्दी, नहीं तो बसवा छूट जाएगा । ” ये है हिंदी या मंदी, भोंदी, जो आप कहना चाहे । ये जो हिंदी का तमाचा लगा है इसके कारण भोजपुरी भाषा को आठवीं सूची में भी शामिल नहीं किया जा रहा । क्यूंकि जैसे ही भोजपुरी को भाषा घोषित करेंगे, हिंदी बोलने वालों की संख्या करोड़ों में घट जायेगी, आखिर हिंदी को हम भोजपुरिया लोगों ने दिल खोल कर पनाह दी है अपने घरों में । लेकिन हिंदी घातक हो गयी हमारी अपनी भोजपुरिया, मगही, अवधी संस्कृति और भाषा के लिए । जब भाषा से प्रेम नहीं तो भाषा के उत्पादों से कहाँ होगा । सोहर, बिरहा, कजरी से कहाँ होगा, भिखारी ठाकुर पता भी नहीं है युवाओं को । पटना में डांडिया होता है, झूमर का तो नाम भी आम लोगों को पता नहीं । जब एक समाज को अपनी संस्कृति का ज्ञान ही ना हो तो क्या सिनेमा, क्या साहित्य और क्या पहचान ?? कुछ नहीं, सब ख़त्म ।

दिनकर भी बिहार से आते हैं, मुझे नहीं पता उन्होंने अपनी मातृभाषा में क्या लिखा, नहीं लिखा तो क्यूँ नहीं लिखा, लेकिन एक बात जरुर लिखी कि “सांस्कृतिक गुलामी का सबसे भयानक रूप वह होता है जब कोइ जाति अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा में तुतलाने को अपना परम गौरव मानने लगता है । यह गुलामी की पराकाष्ठा है । ”

Deswa-bihar-days2देसवा बनाने के बाद जब अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर के फ़िल्म समारोहों से निमन्त्रण आने लगा और देसवा चुनी जाने लगी तो बड़ा गर्व हुआ और आज भी है, हमेशा रहेगा लेकिन साथ में यह भी उम्मीद बनी कि बिहार में वितरक दिल खोल कर साथ देंगे, नितीश कुमार कुछ करेंगे । अब मुद्दा राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए भेजने का था तो हमने भी बिहार के 5 सिनेमाघरों में फ़िल्म को लगाया, जिसको कहते हैं टोकन रीलीज और कई लोग आज भी गलतफ़हमी में कहते हैं कि रीलीज़ तो हुई थी आपकी फ़िल्म । अब मैंने जवाब देना बंद कर दिया है । देसवा को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, केंद्र सरकार ने 43वें भारतीय अंतर राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह, गोवा के भारतीय पैनोरामा परिदृशय सिनेमा में चुना गया । सीना चौड़ा हो गया, 50 साल मे पहली भोजपुरी फ़िल्म थी चुने जाने वाली । मुझसे कुछ मीडिया के भाइयों ने पूछा कि आप देसवा से भोजपुरिया दर्शकों को क्या दे रहे हैं । आज वो मेरे से पूछें तो मैं कहूंगा, “गर्व” । मैं नहीं कहता की देसवा कोइ रे, बर्गमैन या फेलिनी के टक्कर की है, बिलकुल नहीं, उनके पैर का धुल भी नहीं लेकिन हाँ, देसवा एक ईमानदार फ़िल्म है और देश विदेश में इसके बारे में लिखा गया । जिस सिनेमा से भोजपुरी क्षेत्रों के लोगों लोग भी अब मुंह मोड़ चुके हैं, वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखी जाए, मेरे लिए यही बहुत है । अब जब बिहार में और अन्य जगहों पर रीलीज़ करने की बात आई तो निवेशक नहीं मिले, वितरक नहीं मिले । बात घूम फिरकर वहीं आती है कि वितरक और निवेशक भी कौन हैं, वही लोग जो आम लोगों की तरह भाषा से नहीं जुड़ें हैं, संवेदना से नहीं जुड़े हैं । भोजपुरी का तीसरा दौर भी इसलिए समाप्ति पर है क्यूंकि बिहार के सुदूर इलाके भी धीरे धीरे ‘आधुनिकता’ की तरफ बढ़ रहे हैं और वहाँ पर रहने वाले युवाओं की आधुनिक होने की परितुष्टि भोजपुरी सिनेमा से जुड़े लोगों से नहीं होगी, क्यूंकि उनके सामने वो हृतिक रोशन, सलमान और शाहरुख़ जैसे लोगों जैसा बनना और दिखना चाहेंगे और वो वर्ग पवन सिंह या खेसारी लाल को अपना रोल मॉडल बनाएगा, उनकी संख्या घटती जायेगी और घट चुकी है क्यूंकि विषय वस्तु में भी विस्तार नहीं है । भोजपुरी सिनेमा नए लोगों को जोड़ नहीं पाया है और न ही वर्त्तमान दशा में जोड़ सकता है ।

इसी क्रम में एक और बात बता दूँ कि एक भाई साहब ने देसवा बनाते वक़्त कुछ पैसे दिए थे क्यूंकि उनको भी “बिहार के लिए कुछ करना था” । ख़ैर उनका 80 प्रतिशत पैसा लौटा दिया लेकिन उन्होंने बिहार से मारने-पीटने की धमकी के साथ साथ कुछ अज़ीब-सा काम किया । वो बिहार में रहते हैं और वहाँ बैठकर बिहारी-विरोधी  कुख्यात राजनीतिक दल से संपर्क किया और अपने एक मराठी दोस्त के माध्यम से कहवाया कि एक बिहार आदमी (नितिन चंद्रा) भोजपुरी फ़िल्म के लिए पैसा लिया और नहीं दे रहा । मुझे इस बात का दु:ख भी हुआ और शर्म भी आई कि एक बिहारी दूसरे बिहारी से पैसा निकलवाने के लिए एक ऐसे आदमी के शरण में गया जो बिहारियों को मार पीटकर अपना घर चला रहा है । ख़ैर वह दिक्कत आज भी जारी है लेकिन अब मैंने भी माथे पर कफ़न बाँध लिया है । पैसा आयेगा तो देंगे नहीं तो आ जाओ फरिआ लो । लेकिन सोचिये, संवेदनहीनता की पराकाष्ठा का यह एक नमूना आपको बिहार में मिल जाएगा । यही नहीं और भी हैं लोग यहाँ पर ऐसे । ये बात मैंने आजतक नहीं कही थी, आज कह डाली । लेकिन सच तो यही है कि हम ऐसे ही हैं । मानसिक गरीबी से ग्रसित । पूर्णतः ।

अभी पटना में साहित्य समारोह हुआ था । बिहार की भाषायों के साहित्य को तीन दिनों के समारोह में 105 मिनट में निपटा दिया गया । हिंदी सिनेमा पर बात हुई लेकिन भोजपुरी और मैथिली सिनेमा पर कोइ चर्चा नहीं । संयोजक दिल्ली और पटना इत्यादि के हैं और इस बात का ज्ञान नहीं है कि हिंदी सिनेमा, बिहार का सिनेमा नहीं है । बिहार में हिंदी सिनेमा का वही हाल है, जो हिंदी भाषा का है । हिंदी का कोई भी सिनेमा, बिहार में 2% से ऊपर का व्यवसाय नहीं करता है, 2% भी सलमान खान, अजय देवगन जैसे लोगों की फ़िल्में करती हैं । भोजपुरी सिनेमा और धीरे धीरे उभरता हुआ मैथिली सिनेमा ही बिहार का सिनेमा है, चाहे दिल्ली, बंबई, पटना वाले बिहारी कितना भी चेहरा चिकना करके घूमे और हाय हिंदी सिनेमा और फाएं फाएं हिंदी सिनेमा करें, हिन्दी सिनेमा कभी भी बिहार का नहीं हो सकता है । कम-से-कम आने वाले 25 सालों तक तो नहीं । ये जो खोखली चर्चा पटना में रखी गई थी और भोजपुरी, मैथिली सिनेमा को कचरे में फेंक दिया गया, वो बताएँ कि आख़िरी बार कौन-सी हिंदी फ़िल्म में पटना दिखाई गई थी । आप स्पीलबर्ग को लाइए पटना लेकिन आपको आनंद डी गहतराज को भी बुलाना होगा, जो एक मात्र भोजपुरी फ़िल्म के निर्देशक हैं जिनको 2007 में राष्ट्रीय सम्मान मिला था । उनके अलावा अनिल अजिताभ, निलय उपाध्याय, और आलोक रंजन जैसे लोगों को भी बुलाना होगा । मैं तो बिना बुलाये ही आ जाऊँगा, अगर भोजपुरी पर कोई सार्थक बहस होगी ।

लेकिन फिर वही है कि भोजपुरी या बिहार के प्रति सांस्कृतिक संवेदना और पहचान को लेकर कोई हो, तब तो पहले अपनी गन्दगी साफ़ करने के बात होगी ना, हम तो वो लोग हैं जो बिहार के कचरे के ऊपर बैठकर दिल्ली के सैनिटेशन प्रोग्राम बनाते हैं । पटना में बॉलीवुड के विकेंद्रीकरण की बात तो जैसे वही हुआ कि पूँछ सेक्टर में गाज़ा पट्टी की समस्या पर चर्चा हो रही हो । आप करना चाहें तो करें लकिन आपको पूँछ के आतंकवाद की भी बात करनी होगी, आम कश्मीरियों के परेशानियों की बात भी तो करनी होगी, क्यूंकि चर्चा आतंकवाद पर है । यहाँ चर्चा सिनेमा है तो आखिर कहाँ गया सयोजकों का अपना सिनेमा । भोजपुरी और मैथिली और भविष्य में अगर मगही हुआ तो हुआ , लेकिन इन्ही तीन भाषाओं का सिनेमा आप बिहारियों का अपना सिनेमा है, चाहे आप कितना भी बींग ह्यूमन का टी-शर्ट पहनकर बोरिंग रोड से लेकर मुजफ्फरपुर के मोती झील में घूमिये । आपका सिनेमा हिंदी नहीं है ।

क्या करें ?

सबसे पहले बिहार के पाँचों भाषाओं की पढ़ाई पहली से लेकर कक्षा 12 तक हो । पांच नहीं तो कम-से-कम भोजपुरी, मैथिली और मगही को अनिवार्य किया जाए । निवारण यहीं से होगा । शिक्षा और संस्कृति । और जब इसको पढ़कर बच्चे बड़े होंगे तो हमारी भाषाओं में संवेदनशील समाज और युवा वर्ग खड़ा होगा जो इस तरह के फेस्ट में अपना साहित्य प्रस्तुत कर सकेगा और सिनेमा पर सार्थक चर्चाएँ होंगी । दूसरी तरफ बिहार राज्य फ़िल्म प्राधिकरण के नसों में ग्लूकोज़ चढ़ाके ज़िंदा किया जाये ताकि उसमें कुछ काम हो सके । तीसरा भोजपुरी को आठवीं सूची में शामिल किया जाए ।

लेकिन अब समय ऐसा है, ख़ास तौर पर भोजपुरी के लिए, कि लड़ाई अब वक़्त के ख़िलाफ़ है । भोजपुरी के पास बहुत वक़्त नहीं है । मेरी अंतरात्मा रोज़ कहती है कि मैं दूसरी भोजपुरी फ़िल्म बनाऊं लेकिन बंगाल से दिल्ली और दिल्ली से मुम्बई तक एक ऐसा इंसान नहीं है, जो भोजपुरी सिनेमा के नाम पर रिस्क उठा ले । नहीं । सिनेमा के साथ ये भी एक बड़ी दिक्कत है कि हिंदुस्तान में लोगों ने इसको मनोरंजन और सिर्फ मनोरंजन समझ लिया है । सच ये है कि मानव जातियों के इतिहास और संस्कृति को ध्वनि – चित्र (audio – visual) के रूप में document किया जा रहा है । आने वाले समय में कागज़ पर लिखी साहित्य को छोड़कर लोग audio – visual के माध्यम से ज्ञान बढ़ाएँगे । पिछले दस सालों से मल्टी मीडिया शिक्षा पद्धति का हिस्सा बन चुका है । सिनेमा आज का साहित्य बन रहा है, अच्छा या बुरा । इसलिए आने वाले सिनेमा के लिए समाजों को सजग, ईमानदार और जिम्मेदार रहना होगा । सिनेमा जरुरी है । अच्छा सिनेमा बहुत जरुरी है ।

बहरहाल देसवा पर काम ख़तम नहीं होता है मेरा, शुरू होता है । ये एक तपस्या है, लड़ाई है और सारे बिहारियों को साथ मिलकर लड़ना होगा । मातृभाषा ख़तम तो आप ख़तम । आपन भासा आपन होला ।

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