ओम दर-ब-दर

अरविन्द दास


जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से पी एच डी अरविन्द दास पत्रकार और फोटोग्राफ़र हैं.

सोशल नेटवर्किंग साइट और न्यू मीडिया पर इन दिनों ओम दर-ब-दर की खूब चर्चा है. पिछले दिनों जब मैंने एक मित्र से इस फिल्म के बारे में कहा तो उसने हँसते हुए कहा कि यह फिल्म है भी या नहीं इस पर बहस जारी है!’ 25 वर्ष पहले नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन (एनएफडीसी) के सहयोग से बनी यह फिल्म 17 जनवरी को पहली बार रुपहले पर्दे पर आ रही है. 

o1असल में बॉलीवुड की मसाला फिल्मों से अलग यह फिल्म एक नए सौंदर्यबोध की माँग करती है. समांतर सिनेमा के दौर में बनी मणि कौल की उसकी रोटी या कुमार साहनी की मायादर्पण की तरह ही यह फिल्म फिल्म व्याकरण को धत्ता बताते हुएदर्शकों के धैर्य की परीक्षा करती है. पर अंत में हम एक ऐसे अनुभव से भर उठते हैं जो हमारे मन-मस्तिष्क पर वर्षों तक छाई रहती है.

भारतीय फिल्म के सौ सालों के इतिहास में भले ही आम दर्शकों के बीच यह फिल्म चर्चित नही हुई हो, लेकिन कमल स्वरुप निर्देशित इस फिल्म को बॉलीवुड और भारतीय फिल्म के अवांगार्द फिल्ममेकरों के बीच कल्ट फिल्म का दर्जा प्राप्त है. वर्तमान में अनुराग कश्यप से लेकर अमित दत्ता तक की फिल्मों पर इस फिल्म की छाया दिखती है. पुणे स्थित फिल्म और टेलीविजन संस्थान में तो इस फिल्म की चर्चा के बिना कोई बात ही पूरी नहीं होती. खुद कमल स्वरुप इस संस्थान के स्नातक रहे हैं और मणि कौल के साथ काम किया है.

पर इस फिल्म की कहानी क्या है? इस आसान से सवाल का जवाब बेहद मुश्किल है. अजमेर-पुष्कर इलाके में किशोर और युवा की वयसंधि पर खड़ा ओम और उसके आस पास के जीवन की यह कहानी हैफिर सवाल राना टिगरीना या उस मेढ़क का बचा रह जाता है जिसके पेट में हीरा भरा है! सवाल बाबूजी, गायत्री और जगदीश के प्रेम संबंधों का भी है!

असल में इस फिल्म में कोई एक कहानी नहीं है, कई कहानियाँ हैं. यह एक साथ कई रेखाओं में यात्रा करती है. यदि फिल्म दृश्य, विंब और ध्वनि का संयोजन कर एक कला की सृष्टि करती है तो निस्संदेह इस फिल्म के माध्यम से एक अलहदा अनुभव संसार हमारे सामने दरपेश होता है.

कमल स्वरुप
कमल स्वरुप

इस फिल्म का एक सिरा एबसर्ड से जुड़ता है तो दूसरी ओर एमबिग्यूटीके सिद्धांतों से. हिंदी सिनेमा के अवांगार्द फिल्म मेकर इसे एक उत्तर आधुनिक फिल्म मानते हैं. भूमंडलीकरण के इस दौर में जिसे हम ग्लोकलकहते हैं उसकी छाया इस फिल्म में दिखती है. एक साथ इस फिल्म में विटोरियो डी सिका की बाइसिकिल थिव्स की झलक है तो दूसरी ओर मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास में आए मारगांठ की. फिल्म के संवाद भारतीय समाजिक संरचना, राजनीतिक चेतना और अंतर्राष्ट्रीय हालात पर एक साथ टिप्पणी करते हैं. इस सार्थक-निरर्थक संवाद के बीच दर्शक व्यंग्य और हास्य बोध से भर उठता है. 

एक साथ मिथक, विज्ञान, आध्यात्म, ज्योतिष, लोक और शास्त्र के बीच जिस सहजता से यह फिल्म आवाजाही करती है वह भारतीय फिल्मों के इतिहास में मिलना दुर्लभ है. 

करीब दस साल पहले पुणे फिल्म संस्थान के कुछ स्नातकों और डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर के साथ मैंने इस फिल्म को जेएनयू में देखी थी. फिल्म के बाद सवाल-जवाब के क्रम में कमल स्वरुप अपने बेलौस अंदाज में जितनी सहजता से दर्शकों के सवाल को स्वीकार रहे थे उसी सहजता से नकार भी रहे थे. बिलकुल कुछ देर पहले देखे फिल्म की तरह!

पर उन्होंने माना था कि ओम दर-ब-दरमेरा पासपोर्ट है. और इस बात से किसी को इंकार भी नहीं.

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