बस यादें, यादें रह जाती हैं…

नवीन रमण शिक्षण का काम छोड़कर हरियाणा के क़स्बों की ज़िंदगी के विभिन्न पहलूओं के दस्तावेज़ बनाने में लगे हैं. उनसे naveen21.com[at]gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. 

नवीन रमण

नवीन रमण

मैं एक अदृश्य दुनिया में,न जाने क्या कुछ कर रहा हूँ  / मेरे पास कुछ भी नहीं है

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मैं एक अदृश्य दुनिया में जी रहा हूँ / और अपने को टटोल कह सकता हूँ

दावे के साथ / मैं एक साथ ही मुर्दा भी हूँ और ऊदबिलाव भी.

मैं एक बासी दुनिया की मिट्टी में

दबा हुआ अपने को खोद रहा हूँ (एक मुर्दे का बयान-श्रीकांत वर्मा)

मुझ पर न कोई कुछ बोलता,न लिखता है और न ही सोचता है. इसलिए मैं अपना जीवन-मरण खुद ही बयान कर रहा हूँ. क्या मेरा जीवन-मरण केवल मेरा ही है? ऐसा कैसे हो सकता है! बिना दर्शकों के, फिल्मों के मेरा अस्तित्व ही क्या है? या था? मेरा सरोकार समाज के हर लिंग, वर्ग, जाति, समुदाय, धर्म आदि सभी से रहा है. यही पर चाहे-अनचाहे इन्होंने अपनी इन सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक आदि पहचानों को मायावी संसार में खोया-पाया है. इस जादुई संसार की कितनी ही यादें, मैं अपने अंदर संजोये हुए हूँ. यादों का सफर भले ही कम समय का रहा पर वह भी कम यादगार नहीं रहा.

दिसंबर की वह ठंड याद है, जब सन 1998 में पहली बार ठिठुरते हुए दर्शकों की गर्मी को मैंने महसूस किया था.कुछ कुछ होता है फिल्म देखने के लिए उमड़ी भीड़ को देखकर मुझे भी बहुत कुछ हुआ था. उस कुछ होने और खोने के अहसास की गर्मी और ठंडक को आज भी मेरे जेहन में सुना-पढ़ा जा सकता है.मुझे क्या पता था कि 2009 की वो दे दना दन फिल्म आखिरी होगी. कितनी सीटियाँ और आवाजें गूंज गई थी, जब क्यूं पैसा-पैसा करती है / क्यूं पैसे पर तू मरती है, क्या होता है पैसा. पैसे की लगा दूं ढेरी,मैं बारिश कर दूं पैसे की, जो तू हो जाए मेरी गाना आया था. अजब-गजब नजारे हो गए इस पैसे के आते ही. इस पैसे ने भी मुझसे मेरा हँसता-खेलता संसार मुझ से छीन लिया.

P1060936संजय गुप्ता जी ने कितने जतन से मुझे संवारा था. यूं तो पानीपत में पहले से ही पाँच सिनेमा हॉल (नवल,कमल,किशोर,संगीत,सीमा) खुले ही हुए थे. पर इन्होंने(संजय जी) परिवार और महिला-दर्शकों को ध्यान में रखकर ही मुझमें विशेष व्यवस्था की थी ताकि परिवार के साथ मिल-जुलकर लोग फिल्म देखने का आनंद उठा सके जो कि  दूसरे सिनेमाघरों में संभव नहीं हो पा रहा था. इन्होंने तो अलग से लेडिज विंडो तक खोल दी थी. अगर मैं ये कहूं कि मैं तो केवल फैमिली-ओडियंस के भरोसे ही खुला था,तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. लड़कियों के लिए तो अलग से बॉक्स था,जिस पर एक अलग से गेटकीपर भी तैनात किया गया था. ताकि लड़कियाँ अपने को सुरक्षित महसूस करते हुए फिल्म का लुफ्त उठा सके. टिकट-वितरण में भी हमने अलग से एक लड़की को काम दे रखा था. पता नहीं आजकल वह क्या कर रही होगी? उसे मेरी याद तो जरूर आती होगी,हैं ना.   

जहां उन दूसरे सिनेमाघरों में अश्लील फिल्में लगा करती थी, वही मैं इन सबसे हमेशा बचा ही रहा. इन फिल्मों से बच गया पर खुद नहीं बच पाया. विजय आनंद ने भारतीय फिल्म सेंसर बोर्ड के चीफ रहते, उन सिनेमाघरों को भी बचाने के लिए पोर्नोग्राफिक फिल्म इंडस्ट्री को कानूनी मान्यता दिलवाने का भरसक प्रयास किया था, ताकि पोर्न फिल्मों का प्रदर्शन सिनेमाघरों में किया जा सके. पर भारत में संवैधानिक सेंसर बोर्ड के अलावा भी तो अनेक से सेंसर बोर्ड काम करते रहे है, दरअसल असल सेंसर बोर्ड तो वही है.

पैसों की ढेरी पर उगते हुए पानीपत को सबने मिलकर सलाम किया था. जमीन के भाव आसमान को छू रहे थे, कपड़ा-उद्योग पेट से भी ज्यादा तेज गति से फल-फूल रहा था और बाकी व्यवसायों  में भी गति कुछ कम नहीं थी.इन लगातार बढ़ते मुनाफों ने मल्टीप्लैक्स में फिल्म देखने के अवसरों को तो बढ़ाया ही, साथ ही साथ उसने जो शॉपिंग की सुविधा उपलब्ध कराई.इसी कारण ने मुझे लील दिया. मैं ठहरा केवल मनोरंजनधारी. मेरा बंटाधार हो गया और उनकी पौ-बारह हो गई. मेरे तो सारे के सारे भाग्यविधाता उधर ही जा पहुँचे. मैं निरा खालिस रह गया. उन भाग्यविधाताओं की रवानगी, अपनी रह गई केवल बानगी. क्योंकि मैं अपने होने का जालिब(वजह) नहीं था जो उगते हुए पानीपत को सलाम करने में पिछड़ गए या सक्षम नहीं थे, वो मेरे किसी काम के नहीं थे. उनके लिए तो बाकी बचे हुए सिनेमाघर पहले से ही मौजूद थे.

आज केवल कुछ बचा रह गया है,तो वो है यादें. या मेरे परिसर में बिखरा मलबा.इस मलबे के नीचे ही दबी है, कहीं मेरी आत्मा.इस मलबे को बीनने वाली औरतों की दिन भर की कमाई उन मल्टीप्लैक्स में फिल्म देखने वालों की टिकट से भी कम है. मेरे यहां तो टिकट की कीमत 10-15-20-25 रु से बढ़कर टिकट 20-30-40 रु ही हुई थी. इतने में तो ये काम करने वाली औरतें भी फिल्म देख सकती थी. पर नहीं उन भाग्यविधाताओं को तो मल्टीप्लैक्स में मजा आने लगा था या स्टेटस सिबंल बनने लगा था.

मुझे याद है उन बच्चों की किलकारियां,रोना-धोना जो अपने परिवार के साथ आते थे. ये बच्चे आज युवा हो कर मेरी शोभा बढ़ाते. खैर. उन दिनों युवा लड़कियों का अकेले फिल्म देखने में आजादी महसूस करना, प्रेमी-प्रेमिका का आपस में हाथों में हाथ डालकर अपने प्रेम की हींगे भरना, उन लड़कों का सीटियां बजाना,चिल्लाना.बहुत-सी छोटी-छोटी बातों का अथाह समुद्र मैं अपने अंदर समेटे हुए हूं. कितना भावुक हो जाता हूं, जब भी अपने बीते हुए समय को याद करता हूं. अब तो बस यादें ही रह गईं है,बस यादें.

  विजेता है  P1060926

   कौन

   और 

   किसकी पराजय है—-

  सारा संसार अपने कामों में

  फँसाये अपनी उँगलियाँ

  उधेड़बुन करता है…

  मैं अपनी करतूतों का दरोगा हूँ

  नहीं,एक रोजनामचा हूँ. ( श्रीकांत वर्मा)

मेरा यह हलफनामा उन यादों पर जमी धूल को झाड़ने जैसा है, जो इन सीटों पर जमी हुई है या उस प्रकाश की तरह जो झरोखे से आता हुआ मुझमें उर्जा का संचार कर रहा है, ताकि मैं अपना इतिहास दर्ज करा सकूं, उन आने वाली पीढ़ियों के लिए.जो हमारे बारे में बात करके ही रोमांचित हो जाया करेंगी. या उन्हें ये सब किस्से-कहानियों की तरह गुदगुदाया करेंगी. क्या वो कल्पना कर सकेंगे, इस मायावयी दुनिया की जिसे लोग-बाग दर्पण सिनेमाघर कहते थे. क्या झांक पाऐंगे इस दर्पण के अंदर-बाहर की दुनिया में या फंसे रह जाऐंगे अपनी ही दुनियादारी में.

जब कभी पानीपत का इतिहास दोबारा लिखा जाऐगा,तब कभी उस इतिहास में हमारा(सिनेमाघरों) का जिक्र भी होगा. या हमारे बिना ही बस यहाँ हुई लड़ाइयों और उद्योग के लिए ही पानीपत को जाना-समझा जाएगा. हम भी एक जीती-जागती दुनिया का हिस्सा है. क्या आने वाली पीढ़ियाँ याद रख पाऐंगी, उस बरसत रोड़ को जहाँ पर दर्पण सिनेमा हॉल था. मेरे देखते-देखते शहर की सुरत और सीरत ही कितनी बदल गई है. इस बरसत रोड़ पर कोई मकान, कोई दुकान नहीं थी. कइयों ने आशंका जाहिर की थी कि इस विरान रोड़ पर यह सिनेमाघर चलेगा नहीं.

मैं (दर्पण) चला भी और दौड़ा भी,थका भी,रूका भी.नहीं रूका तो केवल समय.समय की मार में हम झर गए और मल्टीप्लैक्स आज भी हरे के हरे है.पता नहीं मेरे साथ काम करने वाले वो सभी लोग अपने आपको कितने दिनों में संभाल पाएं होंगे.वो कैंटीन वाला,साइकिल-स्टैंडवाला,पान-बीड़ी बेचने वाला,कैंटीन में सर्व करने वाले वो छोटे-छोटे लड़के,वो सड़क किनारे फिल्मी और अश्लील किताबें बेचने वाला,कितना हरा-भरा संसार था हमारा. सब उजड़ गया. रह गई है बस यादें. यादें ही रह जाती है. हे मेरे भाग्यविधाताओं, अपना ध्यान रखना. समय-समय पर हम(दर्पण और अन्य) अपनी यादों के सहारे आपकी भी यादों को तरो-ताजा करते रहेंगे. चलते रहिए, गाहे-बेगाहे मिलते रहिए. शब्बा-खैर.

शबे फुरकत का जागा हूँ फरिश्तों अब तो सोने दो

कभी फुरसत में कर लेना हिसाब, आहिस्ता आहिस्ता (अमीर मीनाई)

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