सच को छुपाने वाले इतिहास से परहेज हो

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

इतिहास एक दुःस्वप्न है जिससे मैं जागने की कोशिश कर रहा हूँ.

-जेम्स जॉयस के उपन्यास युलीसिज का एक चरित्र

हमारे देश में इतिहास के कई तरह हैं- साम्यवादी, संघी, सेक्युलर, सोशल जस्टिस, परीक्षा के समय काम आने वाला आदि-आदि. अभी मोदी जी इतिहास की टाँग ठीक से तोड़ भी न पाये थे कि राजदीप सरदेसाई एक सेक्युलर संस्करण लेकर उतर आए. पता नहीं महाज्ञानी हेगल किस तबियत में कह गए कि हिन्दुस्तानियों के पास इतिहास नहीं है. तबसे अबतक हम यह साबित करने में जूझे हुए हैं कि हमारे पास इतिहास बहुवचनता में है, बहुवाचालता में है. एक वो भी दौर था जब हमारे पूर्वज कहते थे कि यह भी गुजर जायेगा. अब हाल यह है कि एक-एक मसले पर ट्रक भर रेफरेंस से भी गुजारा नहीं होता. बहरहाल, मोदी जी के इतिहास को तो नीतीश जी बजा चुके हैं, थोड़ा आकलन राजदीप जी के चैम्पियन गाईड का किया जाए. मोदी जी वाले से इसका पोस्टमार्टम आसान है क्योंकि इसमें समकालीन मसले ही हैं जबकि मोदी जी वाले में तीनों भाग- प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारतीय इतिहास- थे और ऊपर से उन्होंने पौराणिकता का छौंक भी लगा दिया था.  

सरदेसाई का मानना है कि बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने के बाद मुम्बई (तब बंबई) में हुए साम्प्रदायिक दंगों ने दाऊद इब्राहिम को भारतीय क्रिकेट टीम के खांटी प्रशंसक और हिन्दू-मुसलमान गुर्गों वाले गिरोह के मुखिया को न सिर्फ पाकिस्तानी खुफिया तंत्र ISI की शरण में जाने को मजबूर कर दिया, बल्कि गिरोह को पूरी तरह मुस्लिम गुर्गों का गिरोह बनाने के लिए भी विवश कर दिया जिसकी एक भयावह परिणति मुम्बई में लगातार AK-47 और RDX से लैस आतंक की घटनाओं में हुई. यह मुम्बई के इतिहास का खतरनाक सरलीकरण है. और तो और, सरदेसाई यहाँ तक कह जाते हैं कि पत्रकार हुसैन जैदी की किताब पर आधारित अनुराग कश्यप की फिल्म ब्लैक फ्राइडे के अलावा किसी ने भी इस ‘असुविधाजनक सच’ की पड़ताल करने की कोशिश नहीं की. इस घटनाक्रम को थोड़ा नजदीक से समझने वाला कोई भी यह बता सकता है कि इस किताब/फिल्म का आधार बंबई पुलिस का विवरण है. इसमें किसी तरह का कोई सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण नहीं है. बंबई दंगों और पुलिस के सांप्रदायिक रुझान की बात एक-दो जगह आई भी है तो वह टाईगर मेमन द्वारा कुछ लड़कों के ब्रेन-वाशिंग के लिए कही गई है. पूरी फिल्म में दाऊद बस कुछ क्षणों के लिए दिखता-भर है.

यह बात राजदीप सरदेसाई से बेहतर कौन समझ सकता है कि बंबई की राजनीति, अर्थशास्त्र और अंडरवर्ल्ड का मकड़जाल कितना गुंथा हुआ है और यह कई दशक पुराना है. वामपंथी मजदूर संगठनों की पकड़ तोड़ने के लिए कॉंग्रेस और उद्योगपतियों द्वारा

A file image of Gujarat Carnage 2002

A file image of Gujarat Carnage 2002

बाल ठाकरे को लाया जाना, बिल्डरों का वर्चस्व, दत्ता सामंत का परिदृश्य पर आना और फिर उनकी हत्या- अंडरवर्ड का इतिहास इन सबसे जुड़ा हुआ है. साठ के दशक में कॉमरेड कृष्णा देसाई की हत्या और नब्बे के उत्तरार्द्ध में दत्ता सामंत की हत्या- इन तीन दशकों की कहानी में घुसे बिना बंबई/मुम्बई का आज का इतिहास नहीं समझा जा सकता. 1992-93 के दंगों से पहले हुए शहर के दंगों पर नजर दौड़ाईये, उनकी जगहें देखिये, उनका वर्गीय, जातीय और क्षेत्रीय आकलन कीजिये. इसके बाद नजर डालिये देश और पड़ोस के देशों पर. अफगानिस्तान में जेहाद के लिए आया बहुत हथियार और बारूद पड़ा था. उसकी एक बड़ी खेप पंजाब में पहले ही आ चुकी थी. इस पर बाद में आयेंगे. लेख में पंजाब पर भी चर्चा है. इस जखीरे से बड़ी मात्रा में असलहा हिंदुस्तान में आया था और विभिन्न हिस्सों में हिंसक आन्दोलनों, तस्करों, अपराधियों, बाहुबलियों आदि तक पहुंचा था. बंबई दंगों से पहले बंबई में अंडरवर्ल्ड के पास ऐसे हथियार आ चुके थे. साम्प्रदायिकता में दोनों तरफ के खिलाड़ी खेल खेलते हैं, तभी दोनों का स्वार्थ सधता है. 1990 तक दाऊद पाकिस्तानी एजेंसियों के पूरे कब्जे में आ चुका था. ISI के साथ तबाही के लिए उसका गठबंधन उसके अस्तित्व और धंधा को बचाने के लिए था, न कि माहौल ने उसे सांप्रदायिक बना दिया था. यह तो इस देश का दुर्भाग्य है कि किसी भी बड़ी घटना या गतिविधि की पूरी जांच नहीं की जाती. इसीलिए सच या तो वह होता है जो सरकार या उसकी संस्थाएँ कहती हैं या फिर संतुलन साधती मीडिया. मुम्बई का अंडरवर्ल्ड हमेशा से- अयूब लाला से दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन तक- वहाँ के राजनेताओं और उद्योगपतियों के ईशारे पर नाचता रहा है. दरअसल बंबई का दंगा कारण नहीं, इस गठजोड़ का नतीजा है. और यही बात बम-धमाकों के साथ भी लागू होती है. क्या मुम्बई पर 2008 में हुए हमले से जुड़े सभी सवालों के जवाब कसाब की फांसी के साथ मिल गए?

पंजाब के खालिस्तानी आतंक की वजह इंदिरा गांधी की हत्या के बाद के सिख-विरोधी दंगों को बता कर राजदीप और बेतुकी बात कर रहे हैं. क्या अब यह भी बताना पड़ेगा कि बंबई में शिव सेना के रूप में अर्द्ध-फासीवाद लाने वाली कॉंग्रेस ने ही भिंडरावाले को उकसाया था जो बहुत जल्दी हाथ से निकल गया? क्या यह भी बताना पड़ेगा कि देश के गृहमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने निरंकारी संत की हत्या के मामले में संसद में क्लीन चिट दिया था? श्रीमती गांधी की हत्या से चार महीने पहले स्वर्ण मंदिर में सैनिक कारवाई में खालिस्तानियों के पास आत्याधुनिक हथियार थे जो जियाउल हक ने सीमा पार से भेजवाए थे जो बाद में भी आते रहे. अभी भी उस दौर का एक बड़ा नेता दाऊद की तरह पाकिस्तान सरकार की मेजबानी का आनंद उठा रहा है. निश्चित रूप से सिख-विरोधी दंगों ने आतंक को बढ़ाने में माहौल दिया है लेकिन ऑपरेशन ब्लू स्टार और पंजाब में गिल-रिबेरो-केंद्र सरकार की तिकड़ी के क्रूर कारनामों ने भी सिख समुदाय को बहुत घाव दिए हैं. इस तबाही में बड़ी संख्या में शांतिके लिए सक्रिय वामपंथियों और प्रवासी बिहारी मजदूरों ने भी अपनी जान दी. इसीतरह राजदीप गुजरात नरसंहार को इन्डियन मुजाहिद्दीन की पैदाईश का कारण बताते हैं. वैसे तो इस संगठन के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान है लेकिन अगर ऐसा कोई संगठन है भी तो राजदीप तथाकथित आतंक-विरोधी कानूनों, मुस्लिम युवाओं को फर्जी मुकदमों में फँसाने और फर्जी मुठभेड़ों का जिक्र करना क्यों भूल गए?

राजदीप सरदेसाई

राजदीप सरकारों को पीड़ितों को मरहम लगाने का सुझाव देते हैं. वे कहते हैं कि मोदी को अहमदाबाद के पीड़ितों के पास जाना चाहिए, उमर अब्दुल्ला को कश्मीरी पंडितों के पास जाना चाहिए, राहुल गांधी को सिख समुदाय के पास जाना चाहिए और अखिलेश सिंह को मुजफ्फरनगर के पीड़ितों से मिलना चाहिए. अगर कोई ललित निबंध होता तो मैं इन सुझावों पर ध्यान नहीं देता. लेकिन जब एक ऐसा वरिष्ठ पत्रकार अगर करता है तो उसे गम्भीरता से परखना चाहिए. साम्प्रदायिकता एक विचारधारा है और उसके घोषित लक्ष्य होते हैं. कई बार राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए इसे एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. पंजाब से कश्मीर तक यही हुआ है. कश्मीर का जो हाल बनाया गया है, उसमें वहाँ के हर तबके को मोहरा बनाया गया है. इस हाल के लिए दोनों मुल्कों की सरकारें सबसे बड़ी दोषी हैं. अभी कुछ दिन पहले ही पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने खुलासा किया है कि भारत के पक्ष में माहौल बनाने के लिए वहाँ के कई नेताओं को सेना रिश्वत देती है. किसी सरकार ने पंडितों या घाटी के मुसलमानों की परेशानियों पर ईमानदारी से नहीं सोचा है. पंडितों के पुनर्वास की कोई योजना नहीं है. कश्मीर घाटी में बिना पहचान की कब्रें मिल रही हैं. दोनों देशों की सरकारें, सेनाएँ, अलगाववादी नेता मलाई चाभ रहे हैं. नरेंद्र मोदी जिस विचारधारा से आते हैं, क्या उसके शब्दकोष में ‘हीलिंग टच’ है? एक भ्रष्ट सरकार जिसकी नीतियों से देश त्राहिमाम कर रहा है और हजारों किसान आत्महत्या कर चुके हों, मानवाधिकारों की अवहेलना जिसका सिद्धांत हो, उसके अभिभावक राहुल गांधी सिखों का दर्द बाटेंगे? या 1984 के हत्यारों को टिकट बाटेंगे? अखिलेश यादव का भी मामला ऐसा ही है.

राजदीप अगर नेताओं को सलाह ही देना चाहते हैं तो उनसे कहें कि संविधान की मर्यादा का पालन करें. नागरिकों के अधिकार का सम्मान करें. अपराधियों-लूटेरों को दल और सरकार से दूर रखें. नेता अपने कर्त्तव्य का पालन ईमानदारी से करें. यह सिर्फ मरहम नहीं, देश के लोकतंत्र की संजीवनी है.

Advertisements