धिक्कार है | धिक्कार है |

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फ़िल्मकार नितिन चंद्रा के फ़ेसबुक वाल से

ये जो नंगी पीठ देख रहे हैं, ये है बिहार की कला, और उस पर जो निशान दिख रहे हैं वो है कलाकार को बिहार में उसके कला के बदले में मिलने वाला इनाम, और आगे भी मिलता रहेगा, पुलिस के बेल्ट की मार से लाल, हड्डीयाँ टूटी और अरमान कीचड़ चाटते । अब आप ये मत कहिएगा की ऐसा तो हर जगह होता है । नहीं । ये बिहार में ही होता है । ये प्रवीण गुंजन हैं, राष्ट्रीय नाट्य अकादमी से मंच निर्देशन के पढ़ाई करके, बिहार के बेगुसराय में रहकर काम कर रहे हैं । इन्होने कभी दिल्ली और मुम्बई का मोह नहीं किया । जो करना चाहा बेगुसराय और वहाँ पर कला के लिए किया । राष्ट्रीय स्तर के नाट्य समारोह अपने दम पर करवाते हैं । लेकिन ये घटना बिहार के लिए आम घटना है । ये हंटर के निशान सिर्फ पीठ पर ही नहीं बल्कि बिहार में कला के क्षेत्र में कोइ कुछ भी करना चाहे तो उसके ह्रदय में लगती है । चाक़ू गोद दिए जाते हैं बिहार में एक कलाकार के कला में, वह अपने मन रूपी कनवास में रंग नहीं, अपने बिहार के लिए कुछ करने की सोच से चोटिल अपने दिल का बहा खून भरता है । मैं जानता हूँ इस हंटर का दर्द, शरीर पर तो नहीं मन पर झेला है । देख लीजिये बिहारी और गैर बिहारी, ये है बिहार और इसके कलाकार के शरीर पर रात भर मार से उभरे निशान । जिस राज्य के मुख्यमंत्री इस तरह थोक के भाव में जेल जाते हों । युवा हर साल भागते हों । ऊपर से नीचे तक संवेदनहीन किंकर्तव्य विमुढ़ हर कोने में बैठे हों वहाँ कला को कौन पुछता है । क्या संवेदना बची है लोगों में सरकार में और क्या संवेदना बचेगी प्रवीण गुंजन के मन में अपनी मिट्टी के लिए । सब ख़तम कर देना चाहते हैं वो लोग | धिक्कार है | धिक्कार है |

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