हंगरः बॉबी सैंड्स एवं साथियों का आमरण अनशन

रंगनाथ सिंह ब्लॉग बना रहे बनारस के मॉडरेटर हैं.

स्टीव मैक्वीन (तृतीय) की फ़िल्म हंगर (2008) अस्थाई आयरिश रिपब्लिकन आर्मी (आईआरए) द्वारा जेल में किए गए भुख हड़ताल पर आधारित है. उत्तरी आयरलैंड आज भी ब्रिटेन का हिस्सा है. अस्थाई आयरिश रिपब्लिकन आर्मी का लक्ष्य उत्तरी आयरलैंड को ब्रिटेन से आज़ाद कराना और उसके बाद इसे वर्तमान रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड में मिलाकर संयुक्त समाजवादी आयरलैंड का निर्माण करना था.

h3फ़िल्म को मैंने एक साधारण फ़िल्म की तरह ही देखा लेकिन फ़िल्म देखने के बाद यह जानना ज़रूरी हो गया कि आख़िर यह सब कब और कैसे हुआ. नतीजन मैं गूगल रिसर्च किया. उत्तरी आयरलैंड के उद्देश्य का ज़िक्र ऊपर किया जा चुका है. अपने उद्देश्य को लेकर आईआरए को कड़ा संघर्ष करना पड़ा था. कहना न होगा आईआरए का मूल उद्देश्य अभी भी अधूरा है.

यह फ़िल्म आईआरए के आंदोलन के इतिहास की एक निर्णायक घटना पर आधारित है. आईआरए के कई कार्यकर्ता जेल में थे. तात्कालिक ब्रितानी सरकार ने उन्हें राजनीतिक बंदी मानने से इनकार कर दिया और उनके साथ आम कैदियों जैसा बरताव करने का प्रावधान कर दिया. आईआरए ने इसका विरोध किया. वे खुद के लिए राजनीतिक कैदी का दर्जा चाहते थे.

फ़िल्म में इस प्रसंग के आते ही जेहन में हिन्दूस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी, भगत सिंह और उनके साथियों का ख़्याल आता है. भगत सिंह ने आयरलैंड की आज़ादी के सिपाही डैन ब्रीन की जीवनी का हिन्दी में अनुवाद किया था. यह अनुवाद चमन लाल द्वारा संपादित भगत सिहं के ‘सम्पूर्ण दस्तावेज’ किताब में मौजूद है. यूँ तो भगत सिंह निजी तौर पर उनके जीवन से बेहद प्रभावित थे लेकिन हिन्दूस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के नाम और काम पर भी आईआरए के प्रभाव को साफ देखा जा सकता है.

आयरलैंड को ब्रिटेन से आज़ादी मिलने के बावजूद उत्तरी आयरलैंड ब्रिटेन का ही हिस्सा रहा और उत्तरी आयरलैंड की आईआरए उसकी आज़ादी के लिए संघर्ष करती रही.  आईआरए के सदस्यों द्वारा 1981 में राजनीतिक बंदी का दर्जा पाने के लिए की गई भूख हड़ताल उनकी आज़ादी की लड़ाई का ही हिस्सा थी.

आईआरए के सदस्यों की मांग बहुत ही साधारण थी. वो जेल का कपड़ा नहीं पहनना चाहते थे, जेल में कराए जाने वाला काम नहीं करना चाहते थे, सृजनात्मक कार्यों की छूट चाहते थे, साप्ताहिक रूप से पत्र लिखने, परिवार वालों से मिलना इत्यादि चाहते थे.Hunger, filmed October 2007

जेल में मौजूद आईआरए के सदस्यों का नेतृत्व बॉबी सैंड्स नामक नौजवान कर रहा था. एक साथ भूख हड़ताल के एक प्रयास के विफल हो जाने के बाद सैंड्स और उसके साथियों ने तय किया कि वे लोग अब एक-एक कर भूख हड़ताल पर बैठेंगे ताकि ब्रितानी सरकार पर देर तक दबाव बनाए रखा जा सके.

उन्होंने ऐसा किया भी. भूख हड़ताल का नेतृत्व करते हुए सबसे पहले सैंड्स ने इसे शुरू किया. 66 दिनों तक भूखे रहने के बाद सैंड्स का देहांत हो गया. सैंड़्स के बाद आईआरए के नौ अन्य सदस्यों की भी भूख हड़ताल के कारण मृत्यु हुई.

परिणामस्वरूप ब्रितानी सरकार ने आईआरए के सदस्यों को राजनीतिक बंदी का दर्जा न देते हुए भी उनकी ज़्यादातर मांगे मान लीं. भूख हड़ताल के दौरान ही बॉबी सैंड्स ने ब्रितानी संसद का चुनाव जीता. लेकिन वो कभी भी संसद नहीं जा सका.

आज़ादी से पहले की बात है. जेल में बेहतर रहन-सहन के लिए एक भारतीय क्रांतिकारी ने भी आमरण अनशन किया था. वो महान क्रांतिकारी थे जतीन्द्रनाथ दास. जतिन दा लाहौर जेल में रहन-सहन की अमानवीय व्यवस्था के विरोध में 63 दिनों तक भूखे रहे थे. उनके प्राणोत्सर्ग ने समूचे भारत को हिला दिया था.

जतिन दास ने जब प्राण त्यागा था उस वक़्त उनकी उम्र मात्र 24 साल थी. मृत्यु के समय बॉबी सैंड्स की उम्र भी महज 27 साल ही थी. सैंड़्स का देहांत जतिन दास के की मृत्यु के करीब पाँच दशक बाद हुआ लेकिन दोनों के जीवन, मृत्यु और लक्ष्यों के बीच अदभुत समानता है.

h1फ़िल्म में बॉबी सैंड़्स की भूमिका को माइकल फैसबेंडर ने पूरी संवेदनशीलता के साथ निभाया है. निर्देशक स्टीव मैक्वीन ने कहीं भी नायक पूजा की ओट नहीं ली है. न ही कोई मूल्य निर्णय दिया है. फ़िल्म फ़ैसला सुनाने से बचते हुए इतिहास के एक पन्ने को खोलकर दर्शकों को सामने पूरी कुशलता का साथ बस रख देती है ताकि वो ख़ुद उस पर विचार कर सकें.

स्वतंत्रतापूर्व के भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन में रुचि रखने वालों लोगों को यह फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए. भारतीय फ़िल्म जगत अभी तक  भगत सिंह के महानायकत्व से आगे नहीं बढ़ सका है और उसमें भी वो फ़िल्मी चालबाजियाँ करने से बाज नहीं आता.

जिस प्रकार के क्रांतिकारियों के बारे यह फ़िल्म है या जिस तरह के क्रांतिकारियों की हम चर्चा कर रहे हैं उनके जेल जीवन के अनुभव को पर्दे पर उतार पाना शायद नामुमकिन है लेकिन आईआरए, बॉबी सैंड्स, जतिन दास, भगत सिंह और उनके साथियों जैसे क्रांतिकारियों द्वारा की गई भूख हड़तालों या जेल में सहे गए कष्ट की हल्की झलक पाने के लिए यह फ़िल्म देखी जा सकती है.

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