नियमगिरि: प्रतिरोध की भाषा

अभिषेक श्रीवास्तव स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनसे guru.abhishek[at]gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

अभिषेक श्रीवास्तव
अभिषेक श्रीवास्तव

हम राजुलगुड़ा गांव से बमुश्किल पांच किलोमीटर ऊपर जंगलों में पहुंचे थे कि तीन डोंगरिया कोंध महिलाओं से अचानक साक्षात्‍कार हुआ। वे कुल्‍हाड़ी लिए हुए थीं। हमें देखते ही वे अपनी भाषा में कुछ-कुछ बोलने लगीं। हमारा मार्गदर्शक नौजवान साथी अंगद उडि़या में जवाब देने लगा। एक मौके पर लगा कि शायद संवाद नहीं बन पा रहा है। हमने जब आश्‍चर्य में अंगद की ओर देखा, तो उसने हमें दिलासा दिया कि कोई बात नहीं। गांव के पुरुष उसे जानते हैं, वहां कोई दिक्‍कत नहीं होगी। महिलाएं जब संतुष्‍ट होकर लौट गईं, तो उसने हमें एक चेतावनी दी- ”जब भी कोई कुछ पूछे, तो सीधा कह दीजिएगा जिंदाबाद। कुछ नहीं होगा।” मुझे यह बात एकबारगी समझ में नहीं आई, लेकिन नियमगिरि के भीषण जंगलों में अगले पांच दिन तक सिर्फ इस एक शब्‍द ”जिंदाबाद” के सहारे हम सुरक्षित आगे बढ़ते रहे और हमारी खिदमत में दूसरी ओर से एक ही शब्‍द बार-बार वापस आया, ”जिंदाबान”।

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फोटो: अभिषेक श्रीवास्तव

इस संदर्भ में एक अफ्रीकी किस्‍सा याद आता है। एक विदेशी शख्‍स अफ्रीका के कबीलाई बच्‍चों पर कुछ शोध के वास्‍ते वहां गया हुआ था। उसने एक टोकरी में दूर पेड़ के पास कुछ आम रख दिए। उसने बच्‍चों से कहा कि जो दौड़ कर पहले वहां पहुंचेगा, उसे सारे आम मिलेंगे। उसने जैसे ही दौड़ने का संकेत किया, सारे बच्‍चे एक साथ दौड़ कर एक साथ ही वहां पहुंचे और उन्‍होंने आपस में मिल-बांट कर आम खा लिए। विदेशी शोधार्थी हतप्रभ रह गया। दरअसल, वेदांता के साथ भी 19 अगस्‍त को यही हुआ है। वह हतप्रभ है। जिस चालाकी से राज्‍य सरकार ने वेदांता के हलफनामे के मुताबिक न्‍यूनतम आबादी वाले सुदूरतम 12 आदिवासी गांवों को जनसुनवाई के लिए चुना था और उम्‍मीद की थी कि इन्‍हें ”मैनिपुलेट” किया जा सकेगा, वह समझदारी आदिवासियों की सामूहिकता के सामने धरी की धरी रह गई। यह सामूहिकता एक तो गैर-मौद्रिक व्‍यवस्‍था में जीने की परंपरा से आती है जहां कोई भी पूंजीगत प्रलोभन नहीं चलता। दूसरे, यह निज भाषा से बनी एकता है जहां बाहरी भाषा और उसके साथ आने वाले प्रलोभन अप्रासंगिक हो जाते हैं। सोचिए, कि अगर वेदांता या प्रशासन में बैठे उसके समर्थक कुई भाषा जान रहे होते, तो क्‍या आज जनसुनवाइयों के परिणाम वैसे ही होते?

सवाल आदिवासियों को रिझाने के लिए उनकी भाषा जानने तक सीमित नहीं है। यहां के कुछ गांवों में आदिवासी गाना सुनने और वीडियो देखने के लिए मोबाइल का इस्‍तेमाल करने लगे हैं। वे शहर में लकड़ी और पत्‍ते बेचने जाते हैं और बदले में वहां से मोबाइल आदि शहरी चीज़ें खरीद लाते हैं। गोकि यहां नेटवर्क नहीं आता और मोबाइल का बुनियादी उपयोग मूल्‍य ही बदल चुका है, लेकिन दुकानदार की ओर से 100 रुपये के चिप में मनमर्जी डाले गए भोजपुरी, हिंदी व मैथिली गीतों का असर उनकी सामूहिकता पर ज़रूर होता है। ऊपर डोंगरों पर अभी यह असर नहीं दिख रहा, लेकिन नीचे के गांवों में युवाओं को अपनी परंपरा और भाषाई एकजुटता से उपजे आंदोलन के बारे में बहुत कुछ पता नहीं है। कुटिया कोंध में यह असर ज्‍यादा दिखता है जहां के गांवों से शहर का संपर्क आसान है।

फोटो: अभिषेक श्रीवास्तव
फोटो: अभिषेक श्रीवास्तव

इस तरह नियमगिरि का आदिवासी जीवन दो किस्‍म की भाषाओं के बीच अपने अस्तित्‍व को संभाले हुए है। एक, जिसे हम प्रतिरोध की भाषा कह सकते हैं, जो उनके ”जिंदाबान” में अभिव्‍यक्‍त होती है। दूसरी, लूट की भाषा, जो मोबाइल पर बज रहे अजनबी संगीत के रास्‍ते उनके बीच आ रही है। वे दोनों के प्रति सचेत नहीं हैं। दोनों ही उनके लिए आकर्षक हैं, गोकि अलग-अलग वजहों से। हां, वे यह ज़रूर पहचानना जानते हैं कि कौन उनका आदमी है और कौन कंपनी का। इसके लिए उन्‍हें किसी भाषा की ज़रूरत नहीं है क्‍योंकि जिंदगी और प्रकृति में आस्‍था की भाषा तो एक ही होती है, उसे जिंदाबाद कहो या जिंदाबान।

नियमगिरि श्रृंखला की गोद में बसे गांवों को देखकर अगर प्रतिरोध की भाषा में मेरी आस्‍था मज़बूत हुई है, तो तलहटी और तराई के गांवों में हिंदी, भोजपुरी व मैथिली के भड़काऊ गीत-वीडियो का नौजवानों पर असर देखकर मुझे एक दूसरी बात समझ में आई। वो यह, कि लूटने वाला आपकी भाषा जाने बगैर अपनी भाषा के औज़ारों की आदत डालकर आपको धीरे-धीरे भ्रष्‍ट बना सकता है। इसका प्रतिरोध लंबे समय तक किसी बाहरी भाषा के सहारे नहीं टिक सकता। कुछ लोगों ने वहां ”जोहार” को ज़रूर अपना लिया है, हालांकि ”जिंदाबाद” का कुई पर्याय मुझे अब तक नहीं मिला है। मुझे डर है कि किसी दिन वहां गलती से भी ”जवानी ओ दीवानी तू जिंदाबाद” वाला गाना पहुंच गया, तो डोंगरिया इससे कैसे निपटेंगे।

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