सरोजिनी साहू से एक अन्तरंग बातचीत

सरोजिनी साहू अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण साहित्यिक नाम है. डॉ साहू के ओडिया भाषा में अब तक दस कहानी-संग्रह तथा दस उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. नारीत्व से संबंधित विभिन्न  समस्याओं को उजागर करने में स्पष्टवादिता व पारदर्शिता के कारण उन्होंने साहित्य जगत में विशिष्ट छाप छोड़ी है. आपकी रचनाएँ बंगाली, मलयालम, अंग्रेजी व फ़्रेंच आदि कई भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं. संप्रति ओडिशा के एक महाविद्यालय में अध्यापन कार्य में रत होने के अलावा वे अंग्रेजी-पत्रिका इंडियन ऐज की सह-संपादिका तथा न्यूमेन कॉलेज, केरल द्वारा प्रकाशित इंडियन जर्नल ऑव पोस्ट कोलोनियल लिटरेचर के सलाहाकार मंडल की विशिष्ट सदस्या हैं. प्रस्तुत है डॉ साहू से डॉ मीना सोनी की बातचीतडॉ. सोनी हिंदी की नवोदित रचनाकार तथा अध्यापिका हैं

मीना: आपके भीतर लेखन का रुझान कैसे पैदा हुआ? अपनी अबतक  की रचना यात्रा के बारे में बतायें. पहली कहानी और उसका अनुभव.

सरोजिनी: मेरे पिताजी कभी कहानी कवितायें लिखा करते थे. उनकी रचनाओं की पाण्डुलिपि मैंने अबतक सहेज रखा है. वे पेशे से व्यापारी थे, पर उनका रुझान साहित्य की ओर था. घर में ढेर सारी साहित्यिक पत्रिकाएं आती थीं. मेरी बड़ी बहन भी कवितायें लिखती थी. आप कह सकते हैं कि हमारे घर- परिवार के माहौल से मैं लिखने के लिए उत्साहित हुई. मेरी पहली कहानी ‘अबशेष ओ अबशोश’ एक अख़बार के रविवार-संस्करण में प्रकाशित हुई थी. तब मैं हाई स्कूल की छात्रा थी. उस समय ओड़िया में झंकार पत्रिका को बड़े ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था. किसी रचनाकार या कवि का उस पत्रिका में छाप जाना प्रतिष्ठित होने का सबूत माना जाता था. पहली बार जब मेरी कहानी झंकार में छपी तब मैं अंडर-ग्रेजुएट में थी. कहानी प्रकाशित होने के बाद हमारे शिक्षकों ने मुझसे ख़ुशी से पूछा, “क्या सचमुच में तुम ही वही सरोजिनी साहू हो जिसकी कहानी झंकार में छपी है?” तब से लगातार यानि 35 साल से अधिक समय से मेरी कथा-यात्रा जारी है.

मीना: आप ओड़िया और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिखती हैं. क्या दोनों भाषाओं में लिखते समय आप कभी अपने को असहज या असमंजस अवस्था में पाती हैं ? क्या एक ही  अनुभूति को दोनों भाषाओं में लिखते समय यह नहीं लगता कि यह सृजन मूलतः अनुवाद भर रह जाता है?

सरोजिनी: मैं सृजनात्मक लेखन यानि कहानी, उपन्यास या कवितायें अपनी मातृभाषा ओड़िया में ही लिखती हूँ. अंग्रेज़ी में सिर्फ़ विचारशील लेख ही लिखती हूँ. मैं मानती हूँ कि अपनी अनुभूतियों को, अपनी सांस्कृतिक विरासत को, अपनी पहचान को कोई लेखक अपनी मातृभाषा में ही व्यक्त कर पाता है. शेक्सपियर अगर अंग्रेज़ी छोड़ फ़्रेंच भाषा में लिखते तो वह शेक्सपियर न बन पाते. इसलिए कहानी, कविता या उपन्यास ओड़िया में ही लिखती हूँ. पर लेख लिखने के लिए जितना शब्दों का भंडार चाहिए, वह भारतीय भाषायों में पर्याप्त रूप से नहीं है. अंग्रेज़ी में वोकेबुलरी (शब्द भंडार) अमाप है. भारतीय भाषाओं में शब्दों की कमी मुझे अंग्रेज़ी में निबंध लेखन की ओर आकर्षित करता है.

मीना: आप का चर्चित उपन्यास गंभीरी घर विभिन्न भाषाओं में अनुदित हुआ है. हिंदी में बन्द कमरा शीर्षक से प्रकाशित हुआ है. इसके अलावा अंग्रेज़ी, मलयालम, तथा बांग्लादेश से बांग्ला में प्रकाशित हो कर देश -विदेश में लोकप्रिय हुआ है. पर जब ओड़िया में उसका प्रकाशन हुआ था तब उसे ‘अश्लील’ करार दिया गया. क्या आप मानती हैं कि ओड़िया पाठकों में कुछ कमी है जो उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुँचने देता?

सरोजिनी साहू
सरोजिनी साहू

सरोजिनी: ऐसा नहीं है कि ओड़िया पाठक ने उसे नकारा है. आज भी गंभीरी घर एक बेस्ट सेलर माना जाता है. ओड़िया साहित्य से परिचित ऐसा कोई भी न होगा जिसने मेरा वह उपन्यास न पढ़ा हो. असल में उपन्यास में सेक्स को गौरवान्वित कभी नहीं किया गया है. यह वस्तुतः एक सेक्स- विरोधी उपन्यास है, जिसमें सेक्स से ऊपर उठकर प्रेम को पहचानने की बात कही गयी है. उपन्यास का दुसरा केंद्र-बिन्दु है आतंकवाद. माइक्रो से मैक्रो लेवल में कैसे आतंकवाद मानव को एक असहाय खिलौना बना देता है, उसका वर्णन है. इन सारी बातों को अनदेखा कर जो मेरे उपन्यास में अश्लीलता ढूँढते हैं, उन्हें क्या कह सकती हूँ?

मीना: गंभीरी घर उपन्यास दरअसल एक पाकिस्तानी मुस्लिम चित्रकार और भारतीय गृहिणी महिला के बीच इन्टरनेट के जरिये पनपे प्यार की कहानी है जिसपर हिन्दूवादी संगठनों ने एतराज भी जताया है. इस प्रसंग पर आपका क्या कहना है?

सरोजिनी: फंडामेंटलिज़्म हमारी सोच को इतना घटिया बना देता है कि हम किसी भी सुन्दर चीज को अपने सांप्रदायिक-स्वार्थ से ऊपर उठकर नहीं देख पाते. जब गंभीरी घर का बांग्ला अनुवाद बांग्लादेश में लोकप्रिय होने लगा तब ओडिशा के अध्यात्मिक गुरु बनने का ढोंग रचने वाले एक  प्रमुख साहित्यकार ने  मुझसे प्रश्न किया था कि क्या अगर नायक हिन्दू और नायिका मुसलमान होती तो क्या यह उपन्यास बांग्लादेश में इतना लोकप्रिय होता? अब इन्हें कौन बताये कि उपन्यास लिखते समय यह प्रश्न कदापि मेरे मन में नहीं आया था कि नायक और नायिका का धर्म क्या होना चाहिए. दो देशों के बीच कटुता के माहौल में भी प्रेम का बीज उग सकता है- यही था प्रमुख थीम जो आगे चलकर राष्ट्र बनाम व्यक्ति के प्रश्न पर उलझ गया.

मीना: आपके एक उपन्यास पक्षी-वास में दलित जीवन का वर्णन है. गंभीरी घर का स्वर पक्षी-वास पहुँचते-पहुँचते बदल कैसे गया?

सरोजिनी: गंभीरी घर मेरा पहला उपन्यास नहीं है. यह मेरा पाँचवां उपन्यास है. मेरे हर उपन्यास के स्वर भिन्न-भिन्न है. उपनिवेश तथा प्रतिवंदी में जहाँ नारी के अस्मिता-बोध की बात है, वहीं महायात्रा में आध्यात्मिक धरातल पर जीवन की ख़ोज की बात कही गयी है. स्वप्न खोजाली माने में भूख को कैमरा में बंद कर फ़िल्म बनाने वालों के मन-मस्तिष्क में मौज़ूद ग़रीबी का वर्णन है. मेरा हर उपन्यास दूसरे उपन्यास के साथ कथ्य के स्तर पर भिन्न है. यहाँ तक कि उपन्यासों की शैली तथा भाषा भी अलग हो जाती है. शायद एक ही बात को हर उपन्यास्र  में दोहराने का मतलब लेखक की कथा-यात्रा में आगे की ओर बढ़ने में दिशा-हीनता को ही दर्शाता है. पक्षी-वास एक दलित परिवार की मर्म-कथा है. श्रीमद् भागवत की एक कहानी इस उपन्यास का आधार है. सतनामी संप्रदाय के लोग पश्चिम ओडिशा तथा छत्तीसगढ़ इलाके में हैं. इस जाति के लोगों का पुश्तैनी धंधा घूम-घूमकर जानवरों की अस्थि, मांस-मज्जा एकत्रित कर मुर्शिदाबादी पठानों को बेचकर अपनी आजीविका कमाना है. उपन्यास एक मानवीय चीत्कार है उस परिवार की, जिसमें केवल दुःख के काले बादल मँडराते रहते है. कोई भी परिवार का पुश्तैनी धंधा अपनाना नहीं चाहता है. पहला बेटा धर्मांतरण पर्व में क्रिस्टोफर बन जाता है. बड़ा होकर जापान चला जाता है, कभी नहीं लौटने के लिए . दूसरा बेटा बंधुआ मज़दूर बनकर गाँव से ग़ायब हो जाता है जबकि तीसरा बेटा नक्सल हो जाता है और एक पुलिस-मुठभेड़ में मारा जाता है. इकलौती बेटी मज़बूरी के कारण रायपुर के कोठे में पहुंच जाती है. उपन्यास में वृहत भौगोलिक विस्तार है. अतः यह कहना ठीक नहीं है कि इस उपन्यास तक आते-आते मेरा स्वर बदल गया. मेरे लेखन का उद्देश्य जीवन के भिन्न-भिन्न रंगों को पहचानना, उखेरना और विश्लेषण करना है.

मीना: आप एक जानी- मानी नारीवादी साहित्यकार हैं. साहित्य में नारीवाद को आप किस नज़रिये से देखती हैं?

सरोजिनी: साहित्य में नारीवाद को लेकर शंका, कुंठा और संदेह है. हमारे ओड़िया साहित्य में सत्तर-अस्सी के दशक तक किसी भी लेखिका के लिए ‘नारी वादी’ शब्द किसी गाली से कम नहीं था. एक बार जगदीश जी ने अपनी पत्रिका में एक लेखिका को ‘नारी वादी’ के रूप से परिचित क्या करवाया, उस लेखिका ने गुस्से से तमतमाकर एक लम्बा पत्र संपादक के नाम लिख डाला, अभी ओडिशा की एक प्रमुख लेखिका के विकीपीडिया प्रोफ़ाइल पर लिखा है कि वह नारीवादी कतई नहीं है, बल्कि उन्हें मानव-वादी कहना ठीक होगा. मानो नारी मानव श्रेणी में नहीं आती है या नारी की बातें करना मानव की बातों से अलग है!

लेखिका के स्तर पर मैं अपने को नारीवादी और नारीवादी के स्तर पर मैं अपने आपको लेखिका मानती हूँ. मैं अपनी कहानियों में नारी के दर्द को ही मायने देना चाहती हूँ. मेरा मानना है कि नारी की अनुभूति, संवेदना, सोच, जीवन चर्या, यहाँ तक कि नारी की संस्कृति भी पुरुषों से अलग है. इस अलग दुनिया की बात एक नारी ही कर सकती है. पुरुषों की पहुँच से बाहर है वह दुनिया. क्या कभी कोई पुरुष गर्भ-वेदना का अनुभव कर सकता है? मेरी कहानियों में पहले मासिक धर्म की अनुभूति भोगने वाली किशोरी से लेकर मासिक-बंद की मानसिक यातना से गुज़र रहे प्रौढ़ा तक की अनुभूतियों का वर्णन है.

मीना: आप की कहानी है रेप को भी अश्लील माना गया था ओडिया साहित्य में, जबकि उसमें एक भी ओडिया अश्लील शब्द नहीं है एक अंग्रेजी शब्द ‘फ़क’ को छोड़कर.

सरोजिनी: यह कहानी अपने आप में एक प्रश्न ही है. क्या एक नारी का इतना भी अधिकार नहीं है कि वह अपने ईच्छानुसार सपना देख सके? इस कहानी की नायिका सुपर्णा एक बहुत ही मामूली परिचित डॉक्टर के साथ सम्भोग का सपना देखती है और अपने पति को बोल देती है. पति इस बात को सहज रूप से पचा नहीं पता है और बच्ची को दिखाने के बहाने सुपर्णा को उस डॉक्टर के पास लेकर जाता है. रात में अपनी पत्नी से पूछता है: क्या अपने स्वप्न-पुरुष से तुम्हारी भेंट हो गयी? सुपर्णा को लगता है जैसे किसी ने उसका बलात्कार कर डाला है. वह महसूस करती है कि रेप केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी किया जा सकता है. असल में यह कहानी पुरुष-वर्चस्ववादी समाज पर एक प्रश्न खड़ा करती है, जिसे सहन कर पाना उस समाज के लिए आसान नहीं होता. 1980 में लिखी गयी वह कहानी अभी भी चर्चा में है. अभी हाल ही एक कनिष्ठ  कहानीकार ने रात के 1 बजे मुझे फ़ोन कर गाली दी थी.

मीना: माना जाता है कि सेंस एंड सेंसिबिलिटी में आप ने पाश्चात्य नारीवाद पर प्रहार किया है.

सरोजिनी: असल में पाश्चात्य नारीवाद क्रमश; पुरुष विरोधी होते होते द्वि-लिंग तत्त्व को अस्वीकार करने लगा. नारी-पुरुष के स्वाभाविक सहवास का विरोध किया गया. 1960 के बाद नारी-पुरुष के विवाह, मातृत्व, शिशु-पालन आदि को नारी प्रगति में प्रमुख बाधा माना गया.  क्रमश: समकामिता को बढ़ावा मिला और नारी-पुरुष के संपर्क को नारी के लिए घातक बताया गया. मेरा विरोध उन तथाकथित रैडिकल नारीवादिओं से है जिन्होंने नारीवाद को अपने लक्ष्य से दूर किया है. मेरा मानना है कि नारीवाद नारी के नारीत्व के साथ अपने अस्मिता-बोध को समुचित रूप से विकसित करने का ही एक नाम है. यह मानना ठीक नहीं है कि नारीवाद एक पुरुष-विरोधी आन्दोलन है, बल्कि नारीवाद नारी-पुरुष के समान अधिकार की लड़ाई है. सिमोन से अलग मैं मानती हूँ कि नारी अपने शारीरिक, मानसिक और चेतना के स्तर पर अलग है और इस नारीत्व को कभी भी अस्वीकार नहीं करना है. विवाह, मातृत्व के प्रति पाश्चात्य नारीवादिओं के  विचारों से मैं कतई सहमत नहीं हूँ.

मीना: कल और आज की स्त्री में क्या अंतर देखती हैं आप?

सरोजिनी: ओडिया की पहली कहानी की नारी रेवती ने प्यार किया था, पर बोल नहीं पाई थी. पिछली सदी के दूसरे-तीसरे दशक में लिखी गयी नील-मास्टरानी कहानी की नायिका ने न केवल अपने प्यार का इज़हार किया, बल्कि विजातीय विवाह भी किया. मेरे उपन्यास गंभीरी घर की कुकी घरेलू हिंसा से तंग आकर अपने पति के अलावा दूसरे पुरुष के प्रति आकर्षित हुई. इसी से पता चलता है कि कल की और आज की नारी में क्या अंतर है. अभी भी नारी पुरुषवादी समाज के द्वारा बनाई  देवी, माता, प्रेमिका जैसी धारणाओं से निकल नहीं पाई है. नारी में अभी भी अपने अस्मिता-बोध की पहचान की कमी देखी जा सकती है.

मीना: यूँ तो कथा-साहित्य के दो मुख्य विधाओं (उपन्यास एवं कहानी) पर आपकी लेखनी सामान रूपसे चलती है. फिर भी आप अपने आपको मूलतः किस विधा में सहज पाती हैं?

सरोजिनी: पहले मैंने कहानी से ही यह यात्रा शुरू की. बीस साल तक मैं सिर्फ़ कहानी ही लिखती रही. उस समय उपन्यास-लेखन के प्रति डर-सा था. मेरा पहला उपन्यास नब्बे के दशक में आया. उपन्यास में विशाल कैनवास उपलब्ध है, उससे एक लेखक को अपनी बात रखने की अधिक आज़ादी मिलती है. अब कहानी कम, उपन्यास ही ज़्यादा लिखती हूँ.

मीना: अन्य भारतीय भाषायों की कहानियों के बीच ओड़िया कहानी की कैफ़ियत को आप कैसा पाती हैं?

सरोजिनी: भारतीय भाषा की कहानियों में ओड़िया कहानी का उत्कृष्ट स्थान है. मैं अपने अनुभव से कह सकती हूँ, जिस सेमिनार में भी मैं गयी हूँ, ओड़िया कहानी का ज़िक्र प्रमुखता से होता है. 19वीं सदी के कथाकार फ़कीर मोहन की रचनाएँ दूसरी भाषाओं की समकालीन कथाओं से कहीं अधिक आधुनिक और सशक्त माने जाते हैं. अभी भी ओड़िया कहानी पाश्चात्य साहित्य के समकक्ष आधुनिक चिंता एवं चेतनाओं से अछूता नहीं है. मेरे ख़्याल में ओड़िया कहानी अभी अपने शीर्ष पर है.

मीना: ओडिशा साहित्य अकादमी की साहित्यिक गतिविधियों के बारे में आपकी क्या राय है?

सरोजिनी: साहित्य अकादमी एक सरकारी संस्था है. नौकरशाही  से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं? हाँ, अकादमी ने कई अच्छी पुस्तकें प्रकाशित की हैं, पर उनका वितरण, आवंटन तथा विक्रय का बंदोबस्त ठीक नहीं है. इसे दुरुस्त करने की ज़रुरत है.

मीना: अभी आप क्या लिख रही हैं? आने वाले दिनों के लिए आपकी क्या योजनाएँ हैं?

सरोजिनी: अभी-अभी मेरा एक उपन्यास दादन प्रकाशित हुआ है. उपन्यास लिखने के समय कहानी लिख पाना संभव नहीं हो पाता. कहानी की सारी संभावनाएँ उपन्यास में समा जाती हैं. अब सोचती हूँ कि कुछ कहानियाँ लिखूँ. सेंस एंड सेंसुअलिटी नाम से मेरा एक ब्लॉग है. नियमित रूप से ब्लॉगिंग नहीं कर पा रही हूँ. सोच रही हूँ अब जम के ब्लॉगिंग करुँगी. अंग्रेजी अख़बार कॉलम लिखना पड़ता है. अंग्रेजी में अभी-अभी मैंने शरत चन्द्र का उपन्यास ‘शेष प्रश्न’ पर एक लेख लिखा है. इतने कामों में उलझ कर सृजनशील लेखन में अपने आप को जुटा पाना सचमुच कठिनाई भरा काम है. पर मूलतः मैं एक सृजनशील लेखिका हूँ. अब कहानी-लेखन की ओर लौट जाना ही मेरा एक मात्र उद्देश्य है.

मीना: एक वरिष्ठ लेखिका होने के नाते नवोदित लेखकों को आप क्या सन्देश देना चाहती हैं?

सरोजिनी: सन्देश देनेवाली मैं कौन होती हूँ? नवोदितों से इतनी ही उम्मीद रखती हूँ कि वे अपने रचनाओं के प्रति सजग और समर्पित रहें तथा छपास रोग से अपने आप को मुक्त रखें. कोई भी कहानी लिखने के तुरंत बाद उसे छपने के लिए न दें. अगर कुछ अंतराल के बाद पढ़ने पर कहानी में कोई कमी नज़र न आये तब ही उसे छपने के लिए दें.

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