‘इस अहमक, मित्रविहीन शहर में कौन रह सकता है…’

यह एक दिलचस्‍प बातचीत है। अपनी तरह के अकेले और बेमिसाल गायक-अभिनेता किशोर कुमार से यह बातचीत पत्रकार प्रीतीश नंदी ने की थी। प्रीतीश के औपचारिक-पेशेवर सवालों का जवाब जितनी खिलंदड़ सहजता के साथ किशोर कुमार दे रहे हैं, उससे पता चलता है कि अपनी चरम लोकप्रियता का कोई बोझ वह अपने साथ लेकर नहीं चलते। इस बातचीत से यह भी पता चलता है कि एक महान रचनात्‍मक आदमी दुनियावी अर्थों में सफल होने के बाद भी अपना असल व्‍यक्तित्‍व नहीं खोता। यह इंटरव्यू पहली बार इलेस्‍ट्रेटेड वीकली के अप्रैल 1985 अंक में छपा था। इसका अनुवाद करके हिंदी में उपलब्‍ध कराने का श्रेय रंगनाथ सिंह को जाता है.madhukishore

मैंने सुना है कि आप बंबई छोड़ कर खंडवा जा रहे हैं…

इस अहमक, मित्रविहीन शहर में कौन रह सकता है, जहां हर आदमी हर वक्त आपका शोषण करना चाहता है? क्या तुम यहां किसी का भरोसा कर सकते हो? क्या कोई भरोसेमंद है यहां? क्या ऐसा कोई दोस्त है यहां जिस पर तुम भरोसा कर सकते हो? मैंने तय कर लिया है कि मैं इस तुच्छ चूहादौड़ से बाहर निकलूंगा और वैसे ही जीऊंगा जैसे मैं जीना चाहता था। अपने पैतृक निवास खंडवा में। अपने पुरखों की जमीन पर। इस बदसूरत शहर में कौन मरना चाहता है!!

आप यहां आये ही क्यों?

मैं अपने भाई अशोक कुमार से मिलने आया था। उन दिनों वो बहुत बड़े स्टार थे। मुझे लगा कि वो मुझे केएल सहगल से मिलवा सकते हैं, जो मेरे सबसे बड़े आदर्श थे। लोग कहते हैं कि वो नाक से गाते थे… लेकिन क्या हुआ? वो एक महान गायक थे। सबसे महान।

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