पितृ-पुरुष का विदाई-सन्देश

भारतीय सिनेमा के पितृ-पुरुष दादासाहेब फाल्के (30 अप्रैल 1870 -16 फरवरी 1944) का मद्रास में 23 जुलाई, 1940 को दिया गया यह संबोधन उनका अंतिम सार्वजनिक संभाषण माना जाता है. जीवन के अंतिम वर्षों में उनकी शारीरिक और आर्थिक स्थिति अत्यंत शोचनीय दशा में थी. इसके बावजूद वे सिनेमा के विकास के लिए सदैव चिंतनशील रहते थे. अंग्रेज़ी से इसका अनुवाद प्रकाश के रे ने किया है. 

dadasaheb-phalkeमुझे खुशी है कि हिन्दुस्तानी सिनेमा उद्योग अब सुस्थापित हो गया है जैसी कि उम्मीद थी. शुरू में, मैंने कला-मातृ के इस पवित्र मंदिर में एक उत्साही उपासक के रूप में इसके विकास की दिशा में अपने हिस्से की विनम्र सेवा अर्पित की थी. लेकिन अब मुझे कई कारणों से लगता है कि उद्योग को जिस सही दिशा में यात्रा करनी थी, वैसा नहीं हो रहा है.

मैंने बार-बार कहा है. वर्तमान परिस्थिति में, मेरा सुझाव है कि निर्माता लम्बी फिल्मों का मोह छोड़ कर छोटी फिल्मों, जो 7-8 हजार फीट की हों, पर ध्यान केन्द्रित करें, और उसके साथ एक शिक्षाप्रद फिल्म, एक रील का स्वस्थ हास्य, एक रील की कोई फिल्म जिसमें रेखाचित्र और जादुई दृश्य हों, एक रील का यात्रा-वृतांत आदि जोड़ दें. ऐसे कार्यक्रम मनोरंजक और शिक्षाप्रद होंगे. अगर हमारे निर्माता सही दिशा में कदम बढ़ाएंगे तभी इस उद्योग के स्वस्थ विकास और विस्तार की आशा की जा सकती है.

महंगे ‘सितारों’ को लेने और ढेर सारे गाने और लम्बे-लम्बे संवाद रखने की प्रवृति पर भी लगाम लगना चाहिए. नाटकीय दृष्टि से भी इन फिल्मों का स्तर अत्यंत निम्न है.

सिनेमा एक शैक्षणिक उपदेशक है और इस लिहाज से उचित विषय-वस्तु रखे जाने चाहिए. असभ्य और चिढ़ पैदा करने वाले हास्य-प्रसंगों, जिनका कहानी से कोई सम्बन्ध नहीं होता और हमारी हिन्दुस्तानी फिल्मों में जिनकी बहुतायत है, से हमारे निर्माताओं और निर्देशकों को बिलकुल परहेज करना चाहिए.

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