हिन्दी सराय अस्त्राखान वाया येरेवान: जल्दबाज़ी में लिखी ज़रुरी किताब

सुशील झा बी बी सी में कार्यरत हैं. उनकी शिक्षा जादूगोड़ा (झारखण्ड), जे एन यू और IIMC, दिल्ली में हुई. उनसे sushilkumar.jha@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

सुशील झा

हिन्दी सराय मूल रुप से मध्य एशिया से भारतीय व्यापारियों के पुराने संबंधों को खोजती हुई एक पुस्तक है. आम तौर पर हम जब कहीं घूमने जाते हैं विदेश तो भारत का कोई न कोई अंश खोज लेते हैं और सोचते हैं कि इस पर लिखा जाना चाहिए. इस पुस्तक के लेखक ने वो अंश कहीं पहले खोजा होगा और इस बार यात्रा के बाद उन्होंने लिख ही डाला. शायद ये कारण है कि ये किताब जल्दी जल्दी में लिखी गई लगती है कि शायद न लिखी जाए तो कहीं स्मृतियां गुम न हो जाएं.

आम तौर पर हिंदी में यात्रा वृत्तांत कम ही लिखे जाते हैं और जो लिखे जाते हैं उसमें पर्सपेक्टिव की कमी देखी जा सकती है. हालांकि ये पुस्तक कहने को तो यात्रा वृत्तांत कही जा सकती है लेकिन असल में ये एक यात्रा को पर्सेपेक्टिव में रखे जाने की शानदार कोशिश है. इसमें यायावरी कम और विचार अधिक हैं लेकिन कमाल ये है कि कहीं भी बोरियत नहीं होती है. पुस्तक में इतिहास है संस्कृति है निजता है विचार हैं और जिसमें इतना कुछ हो उसे एकबारगी अकादमिक कहा जा सकता है लेकिन अगर ये अकादमिक हो भी तो ऐसी भाषा में अकादमिक पुस्तक पढ़ने का अपना आनंद है.

agrइस पुस्तक को पढ़ के लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल के बारे में ये कहा जा सकता है कि वो वैसा ही लिखते हैं जैसा वो बोलते हैं. इस पुस्तक को पढ़ना उनको सुनने जैसा है. हालांकि मेरी मुलाक़ात उनसे बस दो बार हुई है और वो भी लंबी नहीं लेकिन पढ़ते वक्त लगा कि वो सामने खड़े होकर बोल रहे हैं. नीरद चौधरी भाषा के बारे में कहीं लिखते हैं कि जब आप लिखें और उसे बोल कर पढ़ें और उसमें लय हो तो समझें अच्छा लिखा है. पुरुषोत्तम अग्रवाल के लिखे में लय है. इस लय के साथ एक बेचैनी भी दिखती है जो स्पष्ट नहीं है. सबकुछ बता देने की. चीज़ों को बदल देने की. इतिहास की गलत जानकारियों को सही कर देने की. एक उदाहरण दूंगा कि पुराने ज़माने में लोग सात समंदर पार नहीं करते थे. लेखक ने इस गलत जानकारी को सही करने की बारंबार कोशिश की है. ऐसी कई जानकारियों को सही करने का प्रयास मिलेगा पुस्तक में.

इसमें वामपंथ की चर्चा है (स्टालिन और ट्राटस्की से लेकर फ्रिदा तक की चर्चा) तो साथ ही धर्म की भी (जरथुस्त्र से लेकर बहुदेववाद, इस्लाम और एकेश्वरवाद का द्वंद) और कभी ये नहीं लगता कि लेखक कहीं भ्रमित हो रहा है. सब कुछ पानी की तरह साफ साफ. पुस्तकों के संदर्भ भी उतनी ही आसानी से आए हैं. ये किताब उन लोगों के लिए ज़रुरी है जो जानना चाहते हैं भारत के बारे में और ऐसे लोग हर गांव कस्बे में बैठे हैं जिनके पास 131 पन्नों में इतनी सहज भाषा में ढेर सारा ज्ञान उपलब्ध नहीं है. जानकारियों का, कहानियों का अंबार है..कम से कम दस उपन्यासों का दम समेटे है ये पुस्तक अगर कोई लिखना चाहे तो. वैसे आखिर अध्याय में लेखक खुद कहता है कि वो मारवाड़ी व्यापारी बारायेव की कहानी में उपन्यास देखता है.

आलोचना के तौर पर यही कहा जा सकता है कि इस पुस्तक में यायावरी कम है लेकिन लेखक कभी यायावर होने का दावा भी नहीं करता. वो तो बेचैन है अपनी दो टकिया की नौकरी से जिसमें शायद वो सहज नहीं महसूस करता. रचनाकार के नौकरी में बंधे होने की घुटन और खीझ भी झलकती है कहीं कहीं. इस पुस्तक को एक विद्वान की (जिसके विचार स्पष्ट हैं और जिसके पास ढेर सारे विचार हैं) डायरी के रुप में पढ़ा जा सकता है. जिन्हें विचारों से मतलब नहीं वो जानकारी का आनंद ले सकते हैं. और जिन्हें पर्सपेक्टिव चाहिए उनके लिए तो कुंजी है ये पुस्तक.

एक छोटी सी आलोचना और …पुस्तक में दो चार बार फेसबुक पर लिखी गई टिप्पणियों का ज़िक्र बेमानी लगता है. बिना फेसबुक लिखे भी वो टिप्पणियां लिखी जा सकती थीं. फेसबुक पर अति सक्रिय होने के बावजूद पता नहीं क्यों मुझे इसका ज़िक्र अटपटा और कहीं न कहीं अन्यथा सतही लगता है. बाद बाकी और कुछ नहीं..साल की शुरुआत में पहली किताब अगर ऐसी है तो शायद ये साल किताबों के लिए अच्छा होगा.

साभार

BBC-Hindi

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