नये मूल्य गढ़ने का अवसर

मनीष शांडिल्य पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं. उनसे manish.saandilya[at]gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.

मनीष शांडिल्य

यूं तो यह महज एक इत्तफाक रहा होगा लेकिन दोनों घटनाएं एक दिन के अंतराल पर घटीं. पहले भारत ने 20 नवंबर को मौत की सजा पर प्रतिबंध के संबंध में संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश किए गए प्रस्ताव का विरोध किया. और अगले ही दिन 21 नवंबर को अहले सुबह अजमल कसाब को फांसी दे दी गई. गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र में विश्व के 110 देशों ने फांसी की सजा पर प्रतिबंध के प्रस्ताव का समर्थन किया है जिसमें युद्धपीपासु देश इजरायल भी शामिल है. भारत ने यह कहते हुए इस प्रस्ताव पर अपना विरोध दर्ज किया कि हरेक देश को अपनी न्याय व्यवस्था तय करने का अधिकार है. लेकिन बतौर राष्ट्र भारत के इस अधिकार को स्वीकार करते हुए भारत के नीति-निर्माताओं को यह भी यह दिलाने की जरूरत है कि एक जीवंत राष्ट्र को हमेशा नए मूल्य गढ़ने के लिए की दिशा में भी चैकस व प्रयासरत रहना चाहिए. भारत अपने यहां फांसी की सजा पर प्रतिबंध लगाकर ऐसी पहल कर सकता है. (हालांकि भारत ने फिलहाल संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव का विरोध जरूर किया है कि मगर गौरतलब है कि कसाब को दी गई फांसी पिछले पिछले सत्रह साल में दी गई पहली फांसी है. ऐसा लगता है कि भारतीय व्यवस्था फांसी को खत्म करने की दिशा में बढ़ रही है.)

मानवता के विकास की सतत् प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए भी फांसी की सजा के मसले पर बहस करना लाजिमी हो जाता है. मानव सभ्यता बहुत सारे प्रक्रियाओं से गुजरजी हुई, एक हद तक पाश्विक बुराइयों को पीछे छोड़ती हुई आज वर्तमान स्वरूप में हमारे सामने है. आंख के बदले आंख वाले समाज व्यवस्था से आगे बढ़ते हुए हम आज कानून द्वारा संचालित समाज में जी रहे हैं. हमें थोड़ा और आगे बढ़ते हुए फांसी की सजा को खत्म कर एक समाज और राष्ट्र के रूप में नये मूल्य गढ़ने की पहल करनी चाहिए. समाज और देश के नैतिक पक्ष को एक नयी ऊंचाई प्रदान करनी चाहिए. और ऐसा भी नहीं है कि भारत फांसी की सजा समाप्त करने वाल कोई पहला देश होगा. 100 से भी ज्यादा देश पहले ही ऐसा कर चुके हैं और ऐसा भी नहीं है कि उन देशों में मौत की सजा का भय खत्म होने पर कानून का शासन चरमरा गया है. जिन देशों में फांसी की सजा नहीं है, वहां हमारे देश के मुकाबले कम अपराध होते हैं. अमन-चैन और मानव विकास के दूसरे कई मापदंडों पर फांसी की सजा को समाप्त करने वाले देश हमसे कहीं आगे हैं. साथ ही ऐसा समझना भी गलतफहमी ही है कि यह सजा दूसरे अपराधियों को अपराध करने से रोकती है.

पिछले साल ईद के एक दिन पहले तमिलनाडु में दो महत्त्वपूर्ण घटनाएं एक साथ घटी थीं. और दोनों का ही संबंध फांसी की ही एक सजा के मामले से था. एक ओर तमिलनाडु विधानसभा ने 30 अगस्त, 2011 को सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्या के दोषी तीन लोगों की मौत की सजा को उम्र कैद में बदलने की मांग राष्ट्रपति से की थी. तो दूसरी ओर मद्रास उच्च न्यायालय ने उनकी मौत की सजा पर अंतरिम रोक लगाते हुए केंद्र से यह पूछा था कि सजा देने में देर क्यों हुई? मद्रास हाइकोर्ट का फैसला और तमिलनाडु विधानसभा का प्रस्ताव भले ही दो अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग वजहों से सामने आया था लेकिन इसने फांसी की सजा के औचित्य को एक बार फिर बहस में ला दिया था.

जहां तक फांसी की सजा से ही जुड़े अन्य मामलों का सवाल है तो कसाब के साथ ही संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरू का मामला हाल के दिनों में सबसे चर्चित रहा है. अब-तक अफजल की फांसी में हो रहे विलंब या उनकी फांसी की सजा का विरोध करने वालों पर तुरंत मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप चस्पा कर दिया जाता है. मगर न तो राजीव गांधी के हत्या के आरोपी मुस्लिम हैं और न ही देविंदर पाल सिंह भुल्लर, जिनको फांसी पर चढ़ाये जाने का विरोध क्रमशः तमिलनाडु और पंजाब में हो रहा है. फांसी से जुड़े उपरोक्त दोनों मामलों से जुड़े घटनाक्रमों के रह-रह के सामने आने के बाद अफजल गुरू की फांसी के विरोध को भी सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए.

अफजल गुरू की फांसी का मुखर विरोध कश्मीर के लोग और देश भर में सामाजिक कार्यकर्ता इस कारण कर रहे हैं क्योंकि सुनवाई के दौरान न तो उन्हें समुचित कानूनी सुविधा उपलब्ध करायी गयी और न ही उनके खिलाफ ठोस सबूत ही मिले. इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने अफजल गुरू को फांसी सिर्फ इस कारण से दी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ऐसा नहीं करने पर राष्ट्रीय भावना संतुष्ट नहीं होती. सुप्रीम कोर्ट जब खुद भावनाओं को ध्यान में रखकर फैसले करने लगे तो देश में लोकतंत्र ओर नागरिक अधिकारों को बचाने के लिए इसका हरसंभव विरोध करना हरेक चेतनशील भारतीय के लिए जरूरी हो जाता है.

फांसी की सजा के औचित्य पर वापस लौटें तो कसाब की फांसी और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव ने एक बार फिर से इस बहस को जिंदा कर दिया है कि फांसी की सजा हो कि नहीं हो. इस बहस को आगे बढ़ाने से पहले जरा इस बात को समझ लेना जरूरी हो जाता है कि किसी गुनहगार को सजा दी ही क्यों जाती है.

न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद किसी को उसके अपराध के मुताबिक सजा दी जाती है. सजा देने का उद्देश्य होता है कि अपराधी को उसकी गलतियों का एहसास हो और सजा काटते हुए वो अपनी गलतियों को सुधार सके. मगर जब किसी को फांसी की सजा दी जाती है तो फिर सजा देने का यह मूल उद्देश्य ही पराजित हो जाता है. वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने कभी कसाब के मामले पर कहा था कि फांसी देने से उसे क्या सजा मिलेगी? उसे जीवित रखने से ही वह अपनी गलती को समझेगा.

इतना ही नहीं भारत जैसे सामाजिक-आर्थिक विषमता भरे देश में फांसी पाने वालों की भी अलग ही वर्गीय व जातीय पृष्ठभूमि होती है. आजाद भारत में गोडसे के बाद जिन्हें फांसी दी गयी वो दो भूमिहीन दलित किसान थे जिन्हें जमींदार को मारने के इल्जाम में फांसी दी गई. इक्के-दुक्के उदाहरण को छोड़कर ज्यादातर मामलों में फांसी के फंदे पर झुलाए गए अपराधी कमजोर और वंचित वर्ग के ही रहे हैं. हमारे यहां फांसी की सजा जिन्हें होती है उनमें से ज्यादातर साधनहीन, गरीब लोग होते हैं, जो न्याय हासिल करने के लिए वकीलों को मंहगी फीस नहीं दे सकते.

दूसरी ओर मौत की सजा का दार्शनिक पक्ष यह है कि जब कानून किसी को जिंदगी वापस नहीं कर सकता, तो फिर कानून के आधार पर ही क्या किसी की जान लेना गलत और अमानवीय नहीं है?

फांसी की सजा के विरोध का मकसद कहीं से भी अपराध को उचित ठहराना या उसे महिमामंडित करना नहीं है. अगर किसी का गुनाह कानून की नजर में इतना ही बड़ा हो कि उसका समाज में वापस लौटना खुद समाज के लिए ही खतरनाक हो सकता है तो फांसी की जगह बिना पेरोल वाली आजीवन कारावास की सजा का विकल्प खुला हुआ है.

फांसी की सजा से अपराध का कुछ नहीं बिगड़ता. बल्कि वह और अधिक मजबूत होता है. आज के आधुनिक समाज में जघन्य अपराधों से निपटने और अपराधियों को सजा देने के वैकल्पिक मानवीय तरीके मौजूद हैं. उसकी आजादी छीन कर उसे यह एहसास कराया जा सकता है कि उससे कितनी बड़ी भूल हुई है. मगर एक सभ्य होते समाज में फांसी की सजा से बचा जाना चाहिए. क्या सभ्यता और आधुनिकता का मनदंड यही होगा कि किसी क्रूर अपराध के लिए फांसी जैसी क्रूरतम सजा दी जाए? याद रखने की जरूरत है कि अमानवीय कार्रवाई की सजा अमानवीय तरीके दी जाएगी तो अमानवीयता तो जिंदा रह ही जाएगी. मकसद अमानवीयता मिटाना है, न कि किसी की सासों को रोक देना.

साथ ही हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी अदालत फैसला करती है, न्याय नहीं. दोनों पक्षों के तक-वितर्क को सुनने के बाद, उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर, कानून की सीमा में. ऐसे में हर बार न्याय हो ही यह जरूरी नहीं है. कहते भी हैं कि कानून अंधा होता है. ऐसे में आज किसी को फासी दे दें और कल इस फैसले पर हमें अफसोस हो. खुद अपना ही फैसला बेवकूफी भरा लगे. कल हमें लगे कि हम एक या कुछ को माफ कर करोड़ों को अपना बना सकते थे. इन सब वजहों से भविष्य में पछताने से बेहतर होगा कि हम आज ही इस दिशा में कोई पहलकदमी करते हुए फांसी की सजा को समाप्त करने के लिए आवाज बुलंद करें. हमें और आधुनिक और मानवीय बनाने में यह पहल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. हम अगर फांसी की सजा के खिलाफ हैं, तो उस पर विचार करने का माकूल वक्त है यह.

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