सिनेमा पर सरदार पटेल

क्या आप यह कह रहे हैं कि हमारे राष्ट्रीय नेता फिल्म निर्माताओं की मदद नहीं करते? जब पूना के एक स्टूडियो ने शराबबंदी के पक्ष में फिल्म बनाई तो मैंने अपनी एक सभा के फिल्मांकन की अनुमति दी थी और यह दृश्य फिल्म में है. हममें से कुछ नई फिल्मों के उद्घाटन के लिए जाते हैं और कभी-कभी ऐसा करने के लिए पछतावा भी होता है जब फिल्में बेकार होती हैं, चाहे सन्देश के स्तर पर या कलात्मक दृष्टि से. फिल्म निर्माताओं को बस अपने मुनाफे के बारे में ही नहीं, देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी के बारे में भी गंभीरता से सोचना चाहिए. उन्हें यह समझना चाहिए कि लोगों की सामाजिक जरूरत को संतुष्ट काना उनका कर्तव्य है और सचेत जनमत को उनके इस सामाजिक कर्तव्य और जिम्मेदारी के प्रति आगाह करते रहना होगा. अगर ऐसा हो पाता है तो बिना किसी राष्ट्रीय सरकार और स्पष्ट नीतियों के बिना ही बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है.
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फिल्मों के बारे में अभी कोई सुझाव नहीं दे सकता क्योंकि मैं बहुत सारे कामों में व्यस्त हूँ और इस बारे में कुछ सोचा नहीं है. फ़िलहाल मैं भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस के इतिहास पर आधारित एक बड़ी फिल्म बनाने की सलाह दे सकता हूँ जो पिछली सदी के आठवें दशक से लेकर अबतक की यात्रा को चित्रित कर सके. लाखों अशिक्षित देशवासियों के लिए यह बहुत अच्छी ज्ञानवर्धक फिल्म होगी. और हमारे पढ़े-लिखे स्त्री-पुरुषों में भी कितनों ने डॉ पट्टाभि, अम्बिका चरण मजुमदार और श्रीमती बेसंट द्वारा कॉंग्रेस की स्थापना और विकास पर लिखी किताबों को पढ़ा है? ऐसी फिल्म अंग्रेजीदां आलसियों के लिए भी लाभप्रद होगी. और जब हम आज़ाद हो जायेंगे तो इस फिल्म में उस कॉंग्रेस अधिवेशन का भी एक रील जोड़ दिया जायेगा जिसमें कॉंग्रेस को भंग करने की घोषणा होगी क्योंकि तब इसका काम पूरा हो चुकेगा.

सरदार वल्लभभाई पटेल (संपादक बाबूराव पटेल से बातचीत में), फिल्म इण्डिया, अक्टूबर 1942

(अंग्रेज़ी से अनुवाद: प्रकाश के रे ).   

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