Shuttlecock Boys – पाठ्यक्रम में पढ़ाये जाने योग्य फिल्म

सतीश पंचम मुंबई में रहते हैं और फ़िल्मों के लिये लिखते हैं.

सतीश पंचम

ऐसी फिल्में गिनती की संख्या में बनी हैं जो किसी न किसी तरह से मैनेजेरियल टेक्नीक से जुड़ी हों या अपने एंटरटेन्मेंट वैल्यू को दर्शाते हुए कुछ हटकर सोचने को मजबूर करें। कुछ समय पहले रॉकेट सिंह आई थी जिसमें ऐसे ही ‘Entrepreneurship’  को लेकर कुछ हटकर सोचा गया था और अब यह शटलकॉक ब्वॉयज जिसमें ‘Entrepreneurship’ को सरल अंदाज में चार युवकों की कहानी के जरिये अपने पूरे एन्टरटेन्मेंट वैल्यू के साथ दर्शाया गया है।

इस फिल्म के पात्रों को देखकर मन में आता है अरे, ये तो अपने मोहल्ले के गोलू जैसा लगता है, और वो…वो तो छह नंबर की बिल्डिंग वाला पंकज लगता है, और वो…उसे भी कहीं देखा है आते-जाते…. उसी की तरह चलता, उसी की तरह बोलता है। Shuttlecock Boys ऐसी ही फिल्म है जिसके पात्रों को देखते हुए ऐसा ही कुछ महसूस होता है। वहां यह नहीं लगता कि इसके कैरेक्टर कहीं आसमान से उतरे हैं, गोरे-चिट्टे हैं, या एक साथ आठ-दस को मार गिरा देने वाले हैं। वे सरल, सीधे और अपने आस-पास से लगने वाले युवकों की तरह ही हैं। उनके बोलने का ढंग, कपड़े पहनने का ढंग, उनके आपसी हंसी-ठट्ठा का ढंग सब कुछ अपने आस-पास का नॉर्मल लगता है और यही नॉर्मल्सी इस फिल्म का जबर्दस्त प्लस प्वाइंट है।

फिल्म चार युवकों की है जिनमें से हर एक कहीं न कहीं जमाने की रेस में पिछड़ सा गया है। कोई कॉल सेन्टर में है, कोई होटल में रसोइया है, कोई सीए की तैयारी कर रहा है लेकिन दिल नहीं लग रहा, पढ़ाई के नाम पर बस पढ़ाई कर रहा है तो कोई क्रेडिट कार्ड या सेल्स का काम कर रहा है। उसके साथ वाले कहीं उपर पहुंच गये हैं, सेटल हो गये हैं, लेकिन ये है कि अब भी कहीं ऑफिस के बाहर खड़े-खड़े – मैम कैन यू गिव मी वन मिनट प्लीज, इट्ज ए स्पेशल स्कीम, इट्ज बेनिफिशियल कहकर बस जैसे तैसे नौकरी कर रहा है।

ये चारों युवक रात में अपनी गली में कहीं दो बिल्डिंगों के बीच नेट बांधकर बैडमिन्टन खेलते हैं, कुछ आपसी बातें शेयर करते हैं, हंसी-मजाक होता है, धौल-धप्पा होती है. और जैसा कि माना गया है क्रियेटिवीटी या नई संभावनायें उथल-पुथल वाले माहौल में ही ज्यादा निकल कर बाहर आती हैं, यहां भी ऐसा ही कुछ होता है। एक रात जब एक बंदे की नौकरी छूट जाती है और दूसरा अपनी हताश कर देने वाली सेल्स नौकरी से तंग आ जाता है तो उनमें से एक को आईडिया सूझता है कि क्यों न खुद का कुछ शुरू किया जाय। ऐसे में वह दोस्त तो तैयार हो जाता है जिसकी हाल ही में नौकरी छूटी है लेकिन लेकिन बाकी के दो तैयार नहीं होते। उनकी लाइफ में अभी तक कोई सीरियस झटका आया नहीं है। हां, परेशान और हताश तो वे भी हैं अपने मौजूदा हालात से लेकिन उतने नहीं जितने कि बाकी के दो हैं।

अब सबसे जरूरी सवाल उठता है काम कौन सा किया जाय ? कौन सा ऐसा काम हो जिसमें इन्वेस्टमेंट कम हो, फिर मार्केट कैसे एक्सप्लोर किया जाय, किसे बेचा जाय। ऐसे तमाम जरूरी सवाल उठते हैं जो फिल्म देखते वक्त एमबीए में बार-बार पढ़ाये जाने वाले टर्म ‘Entrepreneurship’ की याद दिलाते रहते हैं। इसी दौरान एक बंदा सुझाता है कि क्यों न कैटरिंग का बिजनेस किया जाय, इसमें शुरूवाती लागत भी कम है और फिर आसपास कई सारी नई सॉफ्टवेयर कंपनीयां भी खुल गई हैं, उनमें स्नैक्स, खाना आदि की जरूरत तो पड़ेगी ही। इस तरह ये बंदे अपने लेवल पर उपलब्ध रिसोर्सेस से प्रॉडक्ट सेलेक्ट करते हैं, कुछ एलर्टनेस से अपने प्रॉडक्ट के लिये मार्केट की पहचान करते हैं, एक्सप्लोर करते हैं। सवाल उठता है कि उनके एडमिन से मिला कैसे जाय, क्या कहकर बताया जाय कि हम आपको अच्छी सर्विस दे सकते हैं जबकि पहले से उनके पास वेंडर उपलब्ध हो। उन्हीं में से एक बंदा जो सेल्स में रह चुका है वह यह जिम्मा संभालता है लेकिन उसके लिये भी यह टेढ़ी खीर साबित होता है। लोग उनकी कंपनी का ट्रैक रिकॉर्ड मांगते हैं, पहले का एक्सपिरियंस पूछते हैं, किचन आदि की व्यवस्था पूछते हैं। लेकिन इस लेवल पर क्या बताया जाय जबकि अभी शुरूवाती स्टेज पर ही कारोबार अंकुआया हो। इन्हीं सब बातों से दो-चार होती यह फिल्म अंत तक जोड़े रहती है और मन ही मन दर्शक कब इन फिल्मी पात्रों से जुड़़ जाते हैं पता नहीं चलता। लोग बस मुग्ध हो देखते रहते हैं इन युवकों के हौसले को, उनके जज्बे को, तमाम परेशानियों से निकलने की उनकी जद्दोजहद को।

बता दूं कि एंटरटेन्मेंट वैल्यू के लिहाज से यह फिल्म भले ही गीत-संगीत के तड़कों से ज्यादा कुछ न सजी हो लेकिन Entrepreneurship को जिस सरल अंदाज में दर्शाती है वह इसे Hollywood की फिल्म Twelve Angry Men के समकक्ष ला खड़ा करती है जो कि “Managerial Technique of Decision Making” के रूप में कई संस्थानों में पढ़ाई जाती है। चाहें तो देश के विभिन्न तकनीकी या मैनेजमेंट शिक्षा संस्थान इस फिल्म को अपने पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बना सकते हैं जिसमें बेहद सरल अंदाज में किसी व्यवसाय को शुरू करने में होने वाले what, where, who, when जैसे प्रश्नों को टैकल किया गया है।

जहां तक फिल्म के तकनीकी का सवाल है मात्र 35 लाख में बनी यह फिल्म स्क्रीन पर थोड़ी सी डल सी दिखती है, चटख रंग नहीं है इसके बावजूद फिल्म अपने आपको कम्यूनिकेट करने में सफल रही है, धूसरपन कहीं से भी बाधा नहीं बनता। कैमरा कहीं कहीं शेकी लगा है, लाइटिंग भी कहीं-कहीं चटख सी गई है लेकिन 35 लाख में यह सब कर ले जाना बड़ी बात है। सब्जी मंडी और उसके कीचड़ को बेहद सधे अंदाज से दिखाने पर अलग ही निखार आ गया है। कुछ ह्यूमर भी दिखाया गया है तब जबकि सीए की तैयारी करते युवक का पिता वहीं सब्जी खरीदने पहुंचता है जहां उसका बेटा भी अपने कैटरिंग के बिजनेस के लिये सब्जी खरीद रहा होता है।

हेमंत गाबा और उनकी टीम को इतनी शानदार फिल्म बनाने के लिये बधाई.

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