जात ही पूछो साधु की

अनु सिंह चौधरी मीडिया और जन-संचार के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उनकी रचनात्मकता के विविध आयामों का परिचय उनके ब्लॉगसे मिलता है. उनसे anu2711@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

अनु सिंह चौधरी

मैं ब्रह्मेश्वर मुखिया को नहीं जानती। ना रणबीर सेना के किसी सदस्य से पाला पड़ा कभी। ना किसी राजनैतिक या सामाजिक संगठन की सदस्य हूं। लेकिन सुबह-सुबह मुखिया को गोलियों से भूने जाने की खबर क्या आई, घर में जैसे वाद-विवाद के सिलसिले छिड़ गए। दिल्ली में अपने छोटे से अंधे कुंए में होती तो फर्क नहीं पड़ता। ये ख़बर मेरे लिए उतनी ही अहमियत रखती जितनी अख़बार के पहले-दूसरे-तीसरे पन्नों पर आई हिंसा की अन्य ख़बरें रखती हैं।

हमें फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि हम शहरों में जा बसे हैं। हमें फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम इतने मेट्रोपोलिटन तो हो ही गए हैं कि दोस्ती-यारी करते हुए जाति का ख्याल नहीं ऱखते। हमारे भाई-बहनों, दोस्त-यारों ने अंतर्जातीय, अंतधर्मीय विवाह तक किए हैं। मैं तो शायद अपने बच्चों को भी नहीं बताती कि उनकी जाति क्या है। नहीं बताती, लेकिन जड़ें अभी भी ज़मीन से ऐसे गहरे जुड़ी हैं कि हम लौट-लौटकर घर आया करते हैं। हमें अपनी ज़मीन और ज़मीन पर उगनेवाली फ़सलों के बारे में जानकारी होती है। हमारे मां-बाप अभी भी उसी ज़मीन पर बसते हैं जहां वे अनाज पैदा करते हैं, जहां से उनका वजूद कायम है। वैसे हम उस पीढ़ी के लोग हैं जिन्होंने तार-तार होती किसानी और ज़मींदारी व्यवस्था देखी है। ज़मीन के नाम पर होनेवाले मुकदमों का ख़ामियाज़ा भुगतते कई परिवारों को देखा है, और ये भी देखा है कि इन्हीं केस-मुकदमों से हमारे मां-बाप की ज़िन्दगी में कैसी रौनक है।

A file image of Brahmeshwar Singh/ PTI

इसलिए मुखिया का मारा जाना ख़बर के तौर पर पूर्णियां में मेरी ससुराल में खाने की मेज़ पर बहस का मुद्दा बनता है और मैं अपनी सासू मां से उलझ जाती हूं। हिंसा की भाषा बोलनेवाले के लिए मौत का यही रास्ता जायज़ था, मैं कहती हूं। मन में ये बात कचोटती भी है कि इसका मतलब है कि मैं हर तरह की हिंसा को सही ठहराती हूं। लेकिन उसने कई छोटे-बड़े-मंझोले किसानों के लिए बंदूक उठाया, जिनके लिए खड़ा होनेवाला कोई नहीं था, प्रशासन भी नहीं, सरकार भी नहीं, मां की ओर से तर्क आया है। उनका क्या जिनके पास ज़मीन नहीं, ताक़त नहीं, प्रशासन का सहयोग नहीं, मैं फिर भी बहस करती हूं। तुम किन लोगों की बात कर रही हो? बिहार के बारे में बहुत कच्ची जानकारी है फिर तो, मां कहती हैं और मैं चुप हो गई हूं। उनका ये रोष बिहार टेनेन्सी एक्ट, बटाईदारी कानून, सिलिंग एक्ट वगैरह वगैरह के खिलाफ़ है। उनका ये रोष इस बात पर है कि हम जब शहरों में खाक छान रहे होते हैं तो ज़मीन को गैरकानूनी कब्ज़े से बचाना उनका काम होता है। उनका ये रोष इस बात पर है कि इन ज़मीनों पर होनेवाली खेती उनकी आमदनी का ज़रिया है। ये और बात है कि खेती करना दिन-ओ-दिन मुश्किल होता जा रहा है। मैं डायलॉग से मसले सुलझाने की बात करती हूं तो वो हंस पड़ती हैं, शायद मेरी अव्यवहारिकता पर, या मेरी बेहद कच्ची समझ पर।

इसी खेती और ज़मीन को बचाए रखने और आबाद करने के लिए शासक और शोषितों का वर्ग सदियों से तैयार होता रहा है। तीन दशक पहले तक इस स्थिति को किसी ने चुनौती नहीं दी। बड़े किसानों और ज़मीनवालों का काम खेती करवाना होता था, मज़दूरों का काम उनमें काम करना होता था। मज़दूरी तय थी, समाज में स्थान तय था। लेकिन अत्याचार और शोषण की एक सीमा होती है। इंसान संतुलन का रास्ता तलाशते हुए नाजायज़ साधनों का इस्तेमाल भी करने लगता है। बंदूक उठाना किसी बात का जवाब नहीं होता, मैं कह तो रही हूं लेकिन कई वाकए लौट-लौट कर ज़ेहन में आ रहे हैं। रांची में हमारे घर के ठीक बगल में जहानाबाद का एक परिवार रहता था। ज़मीन थी उनके पास कुल तीन बीघा, लेकिन उसी ज़मीन के लिए उस परिवार की औरत और उनके जवान बेटे को गांव में मौत के घाट उतार दिया गया। तब से वो परिवार अपने गांव नहीं लौटा। लेकिन उसके बाद गया और जहानाबाद में हुए कई नरसंहारों की खबर सुनते हुए उस परिवार को मैंने बचपन से खुशी मनाते देखा है। हम नफ़रत की कैसी विरासत छोड़ रहे हैं?

सवाल है कि एक हत्या के बदले दूसरी हत्या, एक नरसंहार के बदले दूसरा नरसंहार कहां तक जायज़ है? आज एक मुखिया को गोलियों से भूना गया है, कल माले का कोई नेता होगा। ट्रेनें जलाई जाएंगी, तोड़-फोड़ होगी, हिंसा के और रास्ते अख्तियार किए जाएंगे, लेकिन इससे नफरत तो और बढ़ेगी ही, कम कहां होगी?

लेकिन हमारे यहां नेता वही बनता है जो दबंगई और नफरत की भाषा बोले, क्योंकि हमारे यहां वही एक भाषा समझी जाती है। हम उस गांव-धरती के वाशिंदे हैं जहां ज़मीन के लिए गोलियां चल जाया करती हैं, घर जला दिए जाते हैं, परिवार उजाड़ दिए जाते हैं। हम उस गांव-धरती से रिश्ता रखते हैं जिसके लिए ज़मीन से बढ़कर दुनिया की कोई धरोहर नहीं। इसके बदले खू़न बहता हो तो बहा करे। हम अपनी जाति और अपने वर्ग के नाम पर ऐसा गुरूर पाले बैठे रहते हैं जहां समझ का कोई स्थान नहीं होता। जातिविहीन सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने के यूटोपियन ख्यालों के बीच, अपने बच्चों को नफरत की इस दुनिया से बहुत दूर ले जाने की ख्वाहिश के बीच, खेत-ज़मीन के समान बंटवारे के बेतुके ख्यालों के बीच सोचने पर मजबूर हूं कि किसान मां-बाप को कैसे समझाऊं जिनकी पूरी ज़िन्दगी ज़मीन और ज़मीन के लिए होते झगड़ों को सुलझाते हुए गुज़री है? जिनके लिए पुरोधा वही है जो उनकी ज़मीन बचाए रखने में उनका साथ देता हो? अगली बार अपनी नाम-पता-मिल्कियत-जाति-धर्म की जानकारी देकर मुझसे दोस्ती करना दोस्तों, कि हम विचार और व्यवहार के दो पाटों में फंसे हुए उलझे हुए से लोग हैं।

Advertisements