म्यांमार क्या फिर बर्मा बन सकेगा!

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं. भारतीय प्रधानमंत्री की बर्मा-यात्रा के बहाने वर्तमान परिदृश्य पर एक टिप्पणी.

म्यांमार (बर्मा) में हाल में संपन्न हुए उपचुनावों में ऑंग सान सू की और उनेक दल नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी को भारी जीत मिली है. सू की दशकों से चले आ रहे सैनिक तानाशाही के विरुद्ध चल रहे लोकतान्त्रिक आन्दोलन की मुखिया हैं और बरसों अपने घर में नज़रबंदी के बाद पहली बार संसद-सदस्य के रूप में अब राजनीतिक भूमिका में हैं. हालाँकि म्यांमार की संसद में अभी भी सैनिक सत्ता के समर्थक दल का प्रचंड बहुमत है लेकिन इन चुनावों के लीग की सदन में उपस्थिति को लोकतंत्र बहाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

1990 में हुए आम चुनाव में सू की के भाग लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था लेकिन उनके दल ने 80 प्रतिशत से अधिक सीटें जीती थीं. इस प्रचंड बहुमत को नकारते हुए सैनिक शासन ने अपनी तानाशाही बरकरार रखा. 2010 के चुनावों का सू की और लीग ने बहिष्कार किया था जिसके कारण सेना-समर्थित दल यूनियन सोलिडारिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी को एकतरफा जीत मिल गयी थी. वैश्विक दबाव में तानाशाही को पिछले साल कुछ लोकतान्त्रिक सुधार करने पड़े थे जिसके तहत मंत्री बने सांसदों को अपनी सीटें छोड़नी पड़ी थीं. एक अप्रैल को उन्हीं 45 सीटों पर मतदान हुए थे जिसमें लीग को अधिकतर सीटें मिली हैं और अब वह सदन में मुख्य विपक्ष की भूमिका में हैं. भले ही, म्यांमार में लोकतंत्र के साकार होने में अभी कई अड़चनें हैं लेकिन इस परिणाम ने दुनिया-भर में लोकतान्त्रिक मूल्यों और संघर्षों को नई उम्मीद दी है.

प्राचीन काल से ही भारत एवं बर्मा के गहरे सम्बन्ध रहे हैं और आधुनिक इतिहास के तो कई अध्याय बिना एक-दूसरे के उल्लेख के पूरे ही नहीं हो सकते. यह विडम्बना ही है कि पिछले कई वर्षों से बर्मा हमारी विदेश-नीति और राजनीतिक विमर्श में लगभग अनुपस्थित रहा है. पर सू की की इस जीत को भारतीय मीडिया ने जिस उत्साह से उल्लिखित किया और अब डॉ मनमोहन सिंह बर्मा की यात्रा कर रहे हैं, इससे यह आशा बंधती है कि आने वाले समय में हमारी सोच और समझदारी में बर्मा को यथोचित स्थान दिया जायेगा. लेकिन मीडिया, विद्वानों और सरकार ने गंभीरता से पूरे प्रकरण को देखने की कोशिश नहीं की है और इसे बस एक महत्वपूर्ण समाचार की तरह प्रस्तुत कर छोड़ दिया गया है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह वही बर्मा है जहाँ भारतीय स्वाधीनता की पहली संगठित लड़ाई का अगुवा बहादुरशाह ज़फर क़ैद कर रखा गया और वहीँ उसे दफ़नाया गया. बरसों बाद बाल गंगाधर तिलक को उसी बर्मा में क़ैद रखा गया. रंगून और मांडले की जेलें अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों की गवाह हैं. उस बर्मा में बड़ी संख्या में गिरमिटिया मजदूर ब्रिटिश शासन की गुलामी के लिए ले जाए गए और वे लौट कर नहीं आ सके. उनकी संतानें आज वहां की नागरिक तक नहीं मानी जातीं और भयानक शोषण और यातनाओं का शिकार बनतीं हैं. इनके आलावा रोज़गार और व्यापार के लिए गए भारतियों की भी बड़ी संख्या वहाँ निवास करती है. सैनिक सत्ता की दृष्टि में इनकी स्थिति दोयम नागरिकों की है. यह वही बर्मा है जो कभी हमारे पॉपुलर संस्कृति में ‘मेरे पिया गए रंगून, वहाँ से किया है टेलीफून’ जैसे गीतों में दर्ज हुआ करता था. बर्मा के अधिकतर लोग बौद्ध हैं और इस नाते भी हमारा सांस्कृतिक सम्बन्ध बनता है. पड़ोसी देश होने के कारण भारत के लिए बर्मा का आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक महत्व भी है. अतः हमें बर्मा के राजनीतिक घटनाक्रम को न सिर्फ ठीक से समझने की ज़रुरत है, बल्कि हमें वहाँ लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए चल रहे संघर्ष को राजनीतिक और नैतिक समर्थन भी देना चाहिए.

ऑंग सान परिवार के साथ हत्या से कुछ दिन पहले/ 1947

बर्मा 4 जनवरी 1948 को ब्रिटिश उपनिवेशवाद के चंगुल से मुक्त हुआ और वहाँ 1962 तक लोकतान्त्रिक सरकारें निर्वाचित होती रहीं. 2 मार्च, 1962 को जनरल ने विन के नेतृत्व में सेना ने तख्तापलट करते हुए सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया और यह कब्ज़ा तबसे आजतक चला आ रहा है. 1988 तक वहाँ एकदलीय प्रणाली थी और सैनिक अधिकारी बारी-बारी से सत्ता-प्रमुख बनते रहे. सेना-समर्थित दल बर्मा सोशलिस्ट प्रोग्राम पार्टी के वर्चस्व को धक्का 1988 में लगा जब एक सेना अधिकारी सॉ मॉंग ने बड़े पैमाने पर चल रहे जनांदोलन के दौरान सत्ता को हथियाते हुए एक नए सैन्य परिषद् का गठन कर दिया जिसके नेतृत्व में आन्दोलन को बेरहमी से कुचला गया. अगले वर्ष इस परिषद् ने बर्मा का नाम बदलकर म्यांमार कर दिया. फिलहाल बर्मा में थीं सीन के नेतृत्व में राष्ट्रपतीय शासन व्यवस्था है और मौजूदा दो सदनों के सदस्यों में से कुछ सैन्य परिषद् द्वारा नामांकित होते हैं और कुछ जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं.

ब्रिटिश शासन के दौरान बर्मा दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे धनी देशों में से था. दुनिया का सबसे बड़ा चावल-निर्यातक होने के साथ टीक सहित कई तरह की लकड़ियों का भी बड़ा उत्पादक था. वहाँ के खदानों से टीन, चांदी, टंगस्टन, शीशा, तेल आदि प्रचुर मात्र में निकले जाते थे. द्वितीय विश्युद्ध में खदानों को जापानियों के कब्ज़े में जाने से रोकने के लिए अंग्रेजों ने भारी मात्र में बमबारी कर उन्हें नष्ट कर दिया था. स्वतंत्रता के बाद दिशाहीन समाजवादी नीतियों ने जल्दी ही बर्मा की अर्थ-व्यवस्था को कमज़ोर कर दिया और सैनिक सत्ता के दमन और लूट ने बर्मा को आज दुनिया के सबसे गरीब देशों की कतार में ला खड़ा किया है. सैनिक शासन के खिलाफ़ अमरीका, कनाडा, यूरोपीय संघ आदि ने बर्मा पर अनेक तरह के प्रतिबन्ध लगाया हुआ है. पिछले सालों से किये जा रहे लोकतान्त्रिक-सुधारों और सू की की रिहाई के बाद यह आशा की जा रही है कि इन प्रतिबंधों को धीरे-धीरे हटा लिया जायेगा, हालाँकि यह बहुत-कुछ सैनिक शासन के रवैये पर निर्भर करेगा. वर्तमान में बर्मा में चीन, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, भारत और थाईलैंड जैसे देश निवेश कर रहे हैं. देश की अर्थ-व्यवस्था और निवेश में चीन की मज़बूत उपस्थिति ने क्षेत्र में भारत के प्रभाव पर प्रतिकूल असर डाला है जिसे हमारी सरकार को दूरदर्शिता और समझदारी से निपटना होगा. वर्ष 1997 में ही चीन के दबाव में म्यांमार को दक्षिण-पूर्व देशों के संगठन एशियान में शामिल कर लिया गया था लेकिन कई चर्चाओं के बावजूद दक्षिण एशियाई देशों के संगठन दक्षेस (सार्क) का वह सदस्य नहीं बन सका है. हालाँकि 2008 से वह संगठन में पर्यवेक्षक के रूप में शामिल हो रहा है. भारत द्वारा आर्थिक निवेशक किये जाने तथा पाकिस्तान और बांग्लादेश के शासन-प्रमुखों की बर्मा-यात्रा ने बेहतर संबंधों की आस जगाई है. लोकतान्त्रिक बर्मा की दक्षेस में उपस्थिति दक्षिण एशिया के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य के लिए आवश्यक परिघटना होगी.

मार्च 22, 2012 को अपने क्षेत्र में चुनाव-प्रचार के दौरान सू की/ चित्र: तू ते ज़ार

भारत-बर्मा संबंधों में तमाम और महत्वपूर्ण बिन्दुओं के साथ सबसे ज़रूरी मसला वहाँ बसे भारतीय मूल के लोगों के अधिकारों को सुनिश्चित करना है. बर्मा में लगभग उन्नतीस लाख भारतीय हैं जिनमें ढाई लाख लोग भारतीय मूल के हैं, दो हज़ार भारतीय नागरिक है और चार लाख लोग बिना-नागरिकता के हैं. चिंताजनक बात है कि बिना-नागरिकता वाले ये ‘राज्य-विहीन’ चार लाख लोग बर्मा में ही पैदा हुए हैं और बहुत पहले ले जाये गए गिरमिटिया मजदूरों के वंशज हैं. 1982 में बने कठोर बर्मी नागरिकता कानूनों के अनुसार इनके पास नागरिकता का दावा पेश करने का कोई दस्तावेजी आधार नहीं है. इन्हें किसी भी तरह के नागरिक और आर्थिक आधिकार से वंचित रखा गया है. इनकी शोचनीय दशा का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि ये लोग न तो बर्मा के हैं और न ही भारत वापस आ सकते हैं. दुर्भाग्य से, दोनों देशों ने कभी-भी गंभीरता से इस मुद्दे पर कोई ठोस पहल नहीं की है और ये लोग पशुवत जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं. बर्मा में भारतियों की उपस्थिति की व्यापक ऐतिहासिकता के बाद भी उनके अधिकारों का हनन किया जाता है और यह नागरिकता-प्राप्त भारतियों के साथ भी होता है. इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि किसी समय भारतीय शिक्षकों और छात्रों से भरे रहने वाले रंगून विश्वविद्यालय में अब उनकी उपस्थिति नगण्य है. सू की भारत में पली-बढ़ी हैं और उनकी शिक्षा दिल्ली के जीसस एंड मेरी विद्यालय और दिल्ली विश्विद्यालय से हुई है. बर्मा की स्वतंत्रता के प्रमुख नेता उनके पिता ऑंग सान के भारतीय नेताओं से अच्छे सम्बन्ध थे और उनकी माता खीं की भारत में लम्बे समय तक बर्मा की राजदूत रही थीं. भारत के लोकतान्त्रिक तबकों ने हमेशा से सू की के संघर्ष को समर्थन दिया है. अब जब सू की म्यांमार की संसद में हैं और उनका संघर्ष एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है, यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे बर्मा में बसे भारतियों के अधिकारों को सुनिश्चित कराने की कोशिश करेंगी. भारत की सरकार को भी इस दिशा में लगातार पहल करते रहना होगा. प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और उनकी सरकार की नीतियों और ढीलेपन के कारण भारत लगातार पिछले सालों में अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर हाशिये पर है. फिर भी, उनकी बर्मा-यात्रा से बहुत उम्मीदें हैं.

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