‘फिर वही हम, फिर वही अमीनाबाद’: मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का 20 वाँ सम्मलेन

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

वर्ग-चेतस सर्वहारा के अपने ही आजमाए हुए झंडे हैं और उसे पूंजीपति वर्ग के झंडे के नीचे गोलबंद होने की कोई आवश्यकता नहीं है. -स्टालिन

स्टालिन का यह कथन 9 अप्रैल को संपन्न हुए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बीसवें सम्मलेन में विचारधारात्मक मुद्दों पर स्वीकृत प्रस्ताव की आखिरी पंक्ति है. इतिहास विडंबनाओं और विरोधाभासों से भरा होता है और कम्युनिस्ट आन्दोलन का इतिहास भी इनसे अछूता नहीं है. परन्तु माकपा का वर्तमान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ विडम्बनायें और विरोधाभास ही उसकी वैचारिक और राजनीतिक नियति बन गए हैं. इस सम्मलेन से उम्मीद की जा रही थी कि पार्टी नए तेवर और तरीके के साथ भारतीय राजनीति में अपनी खोयी हुयी ज़मीन को पाने और उसे बढ़ाने की जुगत और जज़्बे के साथ नज़र आएगी. लेकिन, इसके उलट यह सम्मलेन और इसकी क़वायदें पुराने ढर्रे पर ही चलते हुए दिखे.

माकपा दुनिया की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों में से एक है तथा सीमित और सिमटते जनाधार के बावज़ूद भारत के राजनीतिक-पटल पर उसका प्रभाव है लेकिन मौज़ूदा वक़्त उसके राजनीतिक इतिहास का सबसे कठिन दौर भी है. बंगाल और केरल के विधानसभा चुनावों में हार, लोकसभा में बहुत-थोड़ी सीटें, बंगाल में समर्थकों पर माओवादियों-तृणमूल के दस्तों का लगातार हिंसात्मक हमला, माकपा-समर्थित मजदूर संगठनों और कर्मचारी संगठनों का कमज़ोर होना आदि ऐसे कारक हैं जिनके कारण पार्टी का राष्ट्रीय राजनीति में दखल कम हुआ है. ऐसे में यह सम्भावना थी कि पार्टी संगठन और देश के हालात पर खुलकर आत्म-मंथन करेगी और बेहतरी के लिए कारगर कदम उठाएगी. यह उम्मीद इसलिए भी की जा रही थी कि आज भी माकपा में राजनीतिक और बौद्धिक रूप से ईमानदार और सक्षम नेताओं की कमी नहीं है और यह भी कि वैश्विक संकट और देश में उसके कुप्रभाव से त्रस्त जनता को राहत दिलाने के लिए वामपंथ की सक्रिय उपस्थिति समय की ज़रुरत भी है.

लेकिन माकपा के इस सम्मलेन में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. उसके दस्तावेज़ और पारित प्रस्ताव पुरानी समझदारियों का पुलिंदा ही हैं, बस उनमें हाल की घटनाओं का उल्लेख-भर कर दिया गया है. देश के राजनीतिक और आर्थिक का विश्लेषण तो कर दिया गया है लेकिन उनसे निपटने के लिए ठोस रणनीति तैयार नहीं की गयी है. आश्चर्य की बात है कि जिन सवालों को अन्ना हजारे, रामदेव, सुब्रमण्यम स्वामी या जनरल वी के सिंह उठा रहे हैं, उनपर माकपा की राजनीति बस टिप्पणी करने तक सीमित रह गयी है. हद देखिये, यूपीए-1 के समय न्यूक्लियर समझौते पर ज़मीन-आसमान एक कर देने वाली और महाराष्ट्र के जैतापुर में प्रस्तावित न्यूक्लियर संयंत्र के विरिद्ध आंदोलनरत पार्टी तमिलनाडु के कूडनकुलन के न्यूक्लियर संयंत्र को खुला समर्थन दे रही है. जन-पक्षधरता का दावा करने वाली माकपा विभिन्न जनांदोलनों पर ढाए जा रहे क़हर पर ख़ामोश है. मनमोहन सिंह-नंदन निलेकनी-चिदंबरम के प्रिय कार्यक्रम आधार कार्ड पर उसने प्रेस-विज्ञप्ति जारी करने से अधिक कुछ नहीं किया जबकि संसद की स्थायी-समिति तक ने उसे सवालों के घेरे में ला खड़ा कर दिया है. मानवाधिकारों पर बढ़-चढ़ कर बोलने वाले माकपा नेता सेना को प्राप्त विशेषाधिकारों और ग्रीन-हंट जैसी गतिविधियों पर चुप्पी साधे हुए हैं. जिन नीतियों के कारण यूरोप और अमरीका में आमलोगों को भयावह आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है, उन्हीं नीतियों को जब हमारी सरकार बेशर्मी से लागू करती जा रही हो, तब माकपा संसद में और उसके बाहर विरोध की महज़ खानापूर्ति कर रही होती है. कोज़ीखोड़ सम्मलेन में गैर-कॉंग्रेस और गैर-भाजपा का राग तो निरंतर अलापा गया लेकिन व्यावहारिक स्तर पर ऐसा कुछ नहीं किया जा रहा है जिससे पार्टी की गंभीरता का आभास हो. अरब देशों में जन-क्रांतियों को तो सम्मलेन में बहुत सराहा गया लेकिन पारित प्रस्ताव भारत सरकार के आधिकारिक नीतियों से अधिक कुछ और नहीं कह पाए. अफ़सोस की बात है कि पार्टी लीबिया और सीरिया में तानाशाहों को नैतिक समर्थन देते हुए दिख रही है. ईरान पर अमरीकी नीतियों का विरोध तो ठीक है लेकिन ईरान के भीतर जो दमन का तंत्र सक्रिय है, उस पर चुप्पी है. यही हाल सऊदी अरब को लेकर है. किसी देश के शोषण-तंत्र पर चुप्पी को उस देश का आतंरिक मसला कह कर सही तो ठहराया जा सकता है लेकिन तब यह साम्यवादी आन्दोलन के अंतर्राष्ट्रीयवाद के सिद्धांत के साथ धोखा भी होगा.

माकपा-सम्मलेन में एक महत्वपूर्ण बात यह कही गयी है कि भारत में साम्यवादी क्रांति को रूस, चीन या अन्य किसी देश से अलग रास्ता चुनना है जो देश की वास्तविक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया हो. यह विचार स्वागतयोग्य है लेकिन प्रस्तावों में यह बात स्पष्टता के साथ परिलक्षित नहीं होती. देश में व्याप्त जातिवाद, विभिन्न समुदायों की उपस्थिति और संस्कृतियों की बहुलता जैसे मुद्दों पर पार्टी अब भी पुराने ढर्रे पर सोचती है. अगर इस दस्तावेज़ों को ध्यान से पढ़ा जाये तो पता चलता है कि पार्टी एक केन्द्रीय राष्ट्रवाद की और उत्तरोत्तर उन्मुख है. पार्टी के विचाराधात्मक भटकाव और राजनीतिक असफलताओं के पीछे यह एक महत्वपूर्ण कारण है. उसे वर्ग, जाति, एथनिसिटी, साम्प्रदायिकता, विकेंद्रीकरण, साम्राज्यवाद जैसे प्रश्नों पर गंभीर आत्ममंथन की ज़रुरत है. इस प्रक्रिया में पार्टी को पार्टी से बाहर के बुद्धिजीवियों, सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं, स्थानीय आंदोलनों और अनुभवों से साझा करना होगा जो शायद उसके राजनीतिक-बौद्धिक आभिजात्य और अहंकार के अनुकूल नहीं है.

इस सम्मलेन से एक निराशाजनक पहलू यह भी सामने आया है कि पार्टी पर अब भी बूढ़े कॉमरेडों का दबदबा है. बंगाल और केरल के विधानसभा चुनावों और केरल में लोकसभा चुनावों में पार्टी ने युवा चेहरों को बड़ी संख्या में उम्मीदवार बनाया था. इससे यह उम्मीद बंधी थी कि पार्टी में नई पीढ़ी को महत्वपूर्ण स्थान मिलेगा. लेकिन सम्मलेन में कॉमरेड प्रकाश कारत के नेतृत्व में निर्वाचित पोलित ब्यूरो और सेन्ट्रल कमिटी के सदस्यों में लगभग सभी पुराने चेहरे हैं और युवाओं की संख्या नगण्य है. जो कुछ नए सदस्य शामिल किये गए हैं वे भी इस पीढ़ी के नहीं हैं और वे अबतक इसलिए नहीं चुने जा सके थे क्योंकि बुज़ुर्ग जगह खाली नहीं कर रहे थे. और ऐसा तब हो रहा है जब पार्टी को नए तेवर की आवश्यकता है और उत्तर भारत में उसकी सदस्य-संख्या भी बढ़ी है. कॉंग्रेस और भाजपा जैसे दलों की राजनीति के ढंग अलग हैं और वहां लॉबी, धन और पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर नेता थोपे जाते हैं लेकिन माकपा जैसी कैडर-आधारित पार्टी में नए चेहरों और नई पीढ़ी का न आना न सिर्फ साम्यवादी आन्दोलन के लिए, बल्कि भारतीय राजनीति के लिए भी दुखद सूचना है.

बहरहाल, पार्टी ने इस सम्मलेन में जो राजनीतिक निर्णय लिए हैं, उनपर अभी फ़ैसला देना ठीक नहीं होगा. उम्मीद की जानी चाहिए कि संसद के मॉनसून-सत्र में सदन में और सड़क पर माकपा जनता के सवालों को संजीदगी से उठाएगी. उधर, दूसरे वामपंथी दल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने पटना सम्मलेन में कॉमरेड सुधाकर रेड्डी को नया महासचिव चुना है जो अपने जुझारूपन और संघर्षशील व्यक्तित्व के लिए जाने जाते हैं. आनेवाले कुछ महीनों में भारत के साम्यवादी आन्दोलन की नई समझदारियों का इम्तेहान होगा जो माकपा और भाकपा के सम्मेलनों के निर्णयों को परखेगा. देश के लिए यह अच्छी बात नहीं होगी जब यह कहना पड़ जाये कि इस नई बोतल में वही पुरानी शराब है.

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