महाशतक की मीडिया-कथा

चन्दन श्रीवास्तव  http://www.im4change.org से जुड़े हैं. उनके आलेख समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं. चन्दन से chandan@csds.in पर संपर्क किया जा सकता है.

चन्दन श्रीवास्तव

रहा होगा शतकों के शतक यानी “महाशतक” का सारे क्रिकेट-प्रेमियों को इंतजार लेकिन इस इंतजार की बेसब्री अपनी हदें सबसे ज्यादा दो ठिकानों पर पार कर रही थी। एक ठिकाना था मीडिया का और दूसरा ठिकाना मीडिया को मसाला परोसने वाली मॉडल पूनम पांडेय का। मीडिया इस महाशतक के जरिए एक तीर से कई शिकार करना चाहता था। वह नए मुद्दे ईजाद कर सकता था, पुराने मुद्दों को नई रोशनी में देख सकता था, और इन मुद्दों की माया से सदा चमत्कारों की खोज में रहने वाले मध्यवर्ग को बांधकर उसे अपने विज्ञापन दाताओं के हाथ में बेच सकता था।

मुख्यधारा की मीडिया मानकर चलता है कि सुपर-पॉवर बनना इस देश की ऐतिहासिक विकास-प्रक्रिया की अनिवार्य परिणति है, और ऐतिहासिक विकास-प्रक्रिया की इस गति को 10 फीसदी के ग्रोथ-रेट से बढ़ाकर अभी के अभी हासिल किया जा सकता है। अपनी इस धारणा की पुष्टी में उसे हर वक्त साक्ष्य तलाशना होता है। सचिन तेंदुलकर का महाशतक ऐसा ही साक्ष्य साबित हुआ। भगवान की कथा की तरह मीडिया में इस महाशतक के कई अर्थ निकले। पहला अर्थ इस आग्रह से जुड़ा था कि सुपर-पावर बनने की ऐतिहासिक विकास-प्रक्रिया को अगर कहीं सबसे ज्यादा स्वाभाविक रुप में देखना हो सचिन के महाशतक में देखिए।

मीडिया ने बताया जैसे व्यक्ति अपनी अनूठी प्रतिभा से पहले नायक फिर “ महानायक ” और सबसे बाद में “ भगवान ” यानी विकास की चरमावस्था में पहुंचता है वैसे ही व्यक्तियों से बना देश भी। देश पहले विकासशील होता है, फिर विकसित और अपनी विकासावस्था की चरम परिणति के क्षणों में अमेरिका सरीखा सुपर-पॉवर बन सकता है। टीवी और अखबारों में वॉलीवुड की शब्दावली उधार लेकर रागिनी बज रही थी कि इस देश में क्रिकेट खेलने वाला व्यक्ति पहला शतक जमाने के बाद स्टार होता है, शतकों की अबतक बनी संख्या पार करने के बाद सुपर-स्टार, निनान्बे शतकों की सीढ़ी चढने पर मेगास्टार या मिलेनियम स्टार और इसके बाद की संख्या पर पहुंचने के बाद उसके योग्य एक ही विशेषण बचता है- “भगवान” का। महाशतक जमा तो मीडिया ने बताया कि दरअसल यह सचिन तेंदुलकर के “ भगवान ” होने का परम प्रमाण है, और यह समय तेंदुलकर की “ भगवत्ता ” के आगे नतमस्तक होते हुए अपनी झोली से अकिंचन-मुद्रा में भारत-रत्न निकालकर अर्पित कर देने का है।

दूसरा अर्थ यह निकला जैसे कारपोरेट की “ सोशल-रेस्पांस्बिलिटी ” होती है वैसे ही कारपोरेट के विज्ञापन से करोड़ों कमाने वाले लोगों की कुछ “ इंडिविज्युल सोशल रेस्पांसबिलिटी”। जैसे सचिन इस गरीब देश के लिए कुछ करने के नाम पर चैरिटी में यकीन करते हैं, आप भी कीजिए। तीसरा अर्थ देश की अर्थव्यवस्था से संबंधित था। मीडिया ने कहा कि प्रणव मुखर्जी का बजट इसलिए भी शुभ माना जाना चाहिए क्योंकि इसके पेश होने के दिन ही यह महाशतक लगाया। एक अंग्रेजी चैनल पर खुद प्रणव मुखर्जी भी इसी अंदाज में सोचते नजर आये। उन्होंने कहा कि यह सचिन तेंदुलकर का सौवां शतक है और मेरा सांतवा बजट। उनके सोच में बजट और शतक समानार्थी हो गए, यह ध्वनित करते हुए कि शतक से देश खुश है तो उसे बजट से भी खुश होना चाहिए।

भगवत्ता के गढ़न्त के लिए बहुत जरुरी है- करिश्मे का होना। यह करिश्मा महाशतक के रुप में हुआ और करिश्मा करने वाला “ भगवान ” घोषित हो गया। लेकिन भगवत्ता को कुछ और भी चाहिए। “ भगवत्ता ” तब तक पूरी नहीं होती है जब तक कोई “ भक्त ” उसके लिए “ तन-मन-धन सब गोसाईं जी को अर्पण ” वाली भाव-दशा में ना आ जाय। भारतीय क्रिकेट की भगवद्-कथा के भीतर मीडिया ने यह संभावना मॉडल पूनम पांडेय में तलाश रखी है। उधर टीवी के समाचार-चैनलों और अखबारों को लगा कि इस महाशतक के मायने बड़े गहरे हैं इधर ट्वीटर पर ट्वीट-ट्वीट खेलने में सिद्धहस्त मॉडल पूनम पांडेय को लगा कि महाशतकीय भगवद्-उपाख्यान में अपनी दी गई भूमिका निभाने का असली वक्त आ गया है। हर भक्त के भावाशिष्ट होने का तरीका अलग-अलग होता है, मॉडल पूनम पांडेय का भी है। उनका भावावेश कहता है, सदियों से स्त्रीदेह को पुरुषसत्ता ने नानाविध बंधनों में बाँध रखा है, सो मुक्त होने का क्षण आये तो पहले दैहिक-बंधनों से मुक्त होना चाहिए। और उन्होंने अपने ट्वीटर अकाऊंट पर एक निर्वसन तस्वीर डाली, जो उनके अनुसार मार्फड् थी, यानी उनके मुक्तिराग में रस लेने वाले लाखों प्रशंसकों में से किसी एक की रचना, जिसमें देह तो किसी और का है मगर चेहरा पूनम पांडेय का। इस तस्वीर में कंप्यूटर की कारामात से नर्वसना नारी के हाथ में भगवती दुर्गा का फ्रेम मढ़ा फोटो है, फोटो का कोना क्रिकेट के मैदान को छू रहा है, और इस कोने से चंद कदम दूर एक क्रिकेट खिलाड़ी को सजदे की मुद्रा में लेटे हुआ दिखाया गया है। खिलाड़ी की पोशाक से जान पड़ता है, वह पाकिस्तानी क्रिकेट टीम का है।

मीडिया को महाशतकीय आख्यान से निकलने वाली भगवत्ता की प्रामाणिकता के लिए इस तस्वीर का उपयोग जरुरी लगा। कोलकाता के एक प्रसिद्ध अंग्रेजी अख़बार ने यह भूमिका निभायी। मगर दांव उल्टा पड़ गया। अख़बार को लगा कोलकाता क्रिकेट का जश्न मनाता है, उसके जश्न में इस तस्वीर से और रंग चढ़ेगा लेकिन रंग में भंग हो गया। 20 मार्च को हावड़ा जिले के टीकियापाड़ा में एक समुदाय विशेष के लोगों के लोगों ने इसे अपनी धार्मिक भावनाओं पर चोट माना। माहौल ऐसा सांप्रदायिक हुआ कि रैपिड एक्शन फोर्स की टुकडियां भेजनी पड़ीं।  पूनम पांडेय की ट्वीटर-पोस्ट पर लगी फोटो को छापने वाले अख़बार ने अपने पहले पन्ने पर यह कहते हुए माफी मांगी है कि हमारा इरादा हिन्दू या मुसलिम किसी समुदाय की भावनाओं को आहत करने का नहीं था और उसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की इस अपील को भी छापना पडा है कि इलाके के हिन्दू और मुसलमान शांति बनाये रखें क्योंकि अख़बार ने माफी मांग ली है। वैसे इस प्रकरण पर ममता बनर्जी की टीका कुछ अलग किस्म की है। उन्होंने इस घटना की जांच के लिए सीआईडी विभाग को लगा दिया और कहा कि लोग झूठी तस्वीर के बनाकर मेरे शासन के खिलाफ साजिश रच रहे हैं।

तस्वीर झूठी थी, मॉडल पूनम पांडेय के हिसाब से एक प्रशंसक की बनायी हुई, जिसमें देह किसी और की दिख रही है, चेहरा सिर्फ उनका है। तस्वीर का विन्यास भी झूठा है, दुर्गा की तस्वीर फोटोग्राफी की कारामाती तकनीक से नर्वसना नारी के हाथ में दिखायी गई है, और अपनी पोशाक से पाकिस्तानी और मुद्रा से सिजदा करता जान पड़ने वाला खिलाड़ी ना तो तस्वीर की निर्वसना नारी के सम्मुख कभी गया है, ना ही इस नारी के हाथ में पकड़ाये गए देवी दुर्गा के फ्रेम के सामने। बस इतना कहा जा सकता है कि इस खिलाड़ी ने खेल के एक खास मौके पर खुशी के मारे या तो जमीन चूमी होगी या फिर अपने ईश्वर को शुक्रिया कहा होगा।लेकिन इस झूठी तस्वीर ने सार्वजनिक होने के बाद एक सच्चे अर्थ का निर्माण किया। कोलकाता के एक कोने में मिज़ाज सांप्रदायिक हुआ, अख़बार ने माफी मांगी, मुख्यमंत्री ने शांति की अपील की, सीआईडी की जांच बैठी और अर्थविस्तार यहां तक हुआ कि यह शासन के खिलाफ एक साजिश है।

कुछ और भी हुआ, मसलन यही कि मीडिया को कहने का मौका मिला, सुपर-पॉवर बनने का ख्वाब देखने वाले इसी देश में ऐसे भी लोग हैं जो अपनी चेतना में बड़े पिछड़े हैं, कायदे से सेक्यूलर ना बन पाये हैं, ना तो रचना का सम्मान करते हैं, ना ही अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ समझते हैं। मॉडल पूनम पांडेय कहेंगी- देखा। अचेतन में नारी-देह पर नियंत्रण की कामना से भरा हुआ यह पितृ-सत्तात्मक समाज नारी की आजादी की संकेतात्मक अभिव्यक्तियों पर भी कितना उबाल खाता है। मीडिया को अपने विज्ञापन दाताओं के लिए पाठक-दर्शक मिल जायेंगे, पूनम पांडेय को ट्वीट पर फॉलोवर, और फॉलोवर की संख्या के आधार पर कंपनियों के एंडोर्समेंट। कुछ ना कुछ ममता बनर्जी को भी मिलेगा, मसलन इस सदाबहार तर्क की पुष्टी में एक और प्रमाण कि उनके शासन के खिलाफ साजिश की जा रही है। और आम जनता के बारे में क्या ?  उसे इस महाशतकीय भगवद्-कथा से क्या मिलेगा ? उसे मिलेगी सभ्य बनने की सीख – “पढ़ना-लिखना सीखो, ये मेहनत करने वालों ”। कोई नहीं पूछेगा कि आखिर एक विराट झूठ को समाचार का अंश बनाकर किस नैतिकता से पेश किया गया।

विराट झूठ को समाचार बनाकर परोसने की मंशा को कुरेदना है तो आपके लिए हाजिर है लुडविग फायरबाख की भूली-बिसरी किताब एसेंस ऑव क्रश्चिनिटी का वह हिस्सा जिसे द सोसायटी ऑव द स्पेक्टेकल्स के लेखक जी. डेबोर्ड ने किताब की शुरुआत में उद्धृत किया है- ” मौजूदा वक्त में, जो संकेतित चीजों से ज्यादा तरजीह उनके संकेत-चिह्नों को देता है, मूल की जगह नकल को,  यथार्थ के स्थान पर उसके प्रतिरुप और सारतत्व की जगह उसके आभास को..सिर्फ भ्रम ही पवित्र है, सच्चाई तिरस्कृत। ऐसे वक्त में पवित्रता उतनी ही बढ़ती है जिस सीमा तक सत्य की कमी और भ्रम की बढोतरी होती है,  और इस तरह भ्रम जब अपनी सर्वोच्च स्थिति पर पहुंचता है तो उसे सर्वोच्च पवित्रता मान लिया जाता है।” इस हिस्से के अर्थ-विस्तार में अपनी तरफ से डिबोर्ड ने जो सूत्र दिए हैं उनमें से दो ये हैं – “ छविमयता सिर्फ छवियों का संग्रह भर नहीं है, बल्कि एक सामाजिक ताना-बाना है, जिसका निर्माण छवियों के सहारे होता है।“ और छविमयता है, पूंजी का उस हद तक संग्रब की पूंजी खुद छवि बन जाय। ”

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