अरब को बदलती कविता

प्रकाश के रे बरगद के संपादक है.

मैं सोचता था कि कविता सब कुछ बदल सकती है, इतिहास बदल सकती है और इंसानियत का भाव पैदा कर सकती है, और यह भी कि यह भ्रम बहुत ज़रुरी है ताकि कवि हालात से जुड़ें और भरोसा रखें. लेकिन अब मैं सोचता हूँ कि कविता सिर्फ़ कवि को ही बदलती है.

‘दर्ज़ करो कि मैं एक अरबी हूँ’ जैसी प्रभावी कविता लिखने वाले फ़लस्तीनी कवि महमूद दरवेश अगर आज जीवित होते तो किसी निराश क्षण में कहे गए अपने इन शब्दों को ख़ुद ही ख़ारिज़ कर देते. पिछले साल से चल रही अरब में क्रांति की बयार में अरबी कवियों की गूंजती कवितायें बदलते इतिहास की गवाह-भर ही नहीं बन रहीं, बल्कि अहम् किरदार भी निभा रही हैं. ट्यूनीशिया से मोरक्को तक उत्तरी अफ़्रीका और खाड़ी का कोई भी देश ऐसा नहीं है जिसने इस बरस तानाशाही और भ्रष्ट सत्ता-तंत्र के विरुद्ध लोगों के नारे नहीं सुना. अरब की इस बयार में इतिहास, विचारधाराएँ, राजनीतियाँ, समझदारियाँ, धर्मों के ध्वज- सब के सब इधर-उधर हो गए हैं. अरब की इन क्रांतियों को समझने के लिये हमें उसकी कविताओं के पास जाना होगा जहाँ दर्ज़ हैं ज़िन्दगी और उसका दर्द. यही कारण है कि कवितायें ही नेतृत्व कर रही हैं इस क्रांति का. हर चौक, गली, सड़क, जुलूस और मोर्चे में कवितायें पढ़ीं और गायी जा रहीं हैं.

अरब में यह आग उस दिन धधक उठी थी जब 17 दिसंबर 2010 को एक फेरीवाले मोहम्मद बौउज़ीज़ी ने ट्यूनीशिया के एक क़स्बे सीदी बौउज़िद में सरकारी कर्मचारियों की हरकतों से तंग आकर ख़ुद को आग लगा ली थी. अरब के देशों में सत्ताधीशों और उनके कारिंदों के ऐसे ज़ुल्म कोई नई बात नहीं थी. बरसों पहले सीरियाई कवि निज़ार क़ब्बानी ने लिखा था:

यदि मेरी रक्षा का वादा किया जाये,
यदि मैं सुल्तान से मिल सकूं

मैं उनसे कहूँगा: ओ महामहिम सुल्तान

मेरे वस्त्र तुम्हारे खूंखार कुत्तों ने फाड़े हैं,
तुम्हारे जासूस लगातार मेरा पीछा करते हैं.
उनकी आँखें
उनकी नाक
उनके पैर मेरा पीछा करते हैं
नियति की तरह, भाग्य की तरह
वे पूछताछ करते हैं मेरी पत्नी से

और लिखते हैं नाम मेरे तमाम दोस्तों के.
ओ सुल्तान!
क्योंकि मैंने की गुस्ताख़ी तुम्हारी बहरी दीवारों तक पहुँचने की,

क्योंकि मैंने कोशिश की अपनी उदासी और पीड़ा बयान करने की,
मुझे पीटा गया मेरे ही जूतों से.

ओ मेरे महामहिम सुल्तान!

तुमने दो बार हारा वह युद्ध *
क्योंकि आधे हमारे लोगों के पास जुबान नहीं है.

(*1948 और 1967 के अरब-इज़रायल युद्ध जिनमें अरब की संयुक्त सेना की हार हुई थी)

बौउज़ीज़ी इस दौर का पहला अरबी नहीं था जिसने आत्महत्या की कोशिश की थी लेकिन उसका आत्मदाह मुश्किलों से मुक्ति का प्रयास भर नहीं था. अगर ऐसा होता तो वह चुपचाप घर के एक कोने में खुदकुशी कर लेता. इस्लामी कानूनों के मुताबिक ख़ुद को जलाकर मरना सबसे बड़े पापों में शुमार किया जाता है. इस ग़रीब ठेलेवाले ने अपने इस कदम को एक राजनीतिक पहल का रूप दिया और अपनी खुदकुशी के लिये उसने जगह चुना शहर का चौराहा. इस घटना ने बेन अली और उसके शासन के भय और आतंक के साये में जी रही ट्यूनिशियाई जनता को झकझोर कर रख दिया. हस्पताल में बुरी तरह जला हुआ पच्चीस साल का बौउज़ीज़ी मुक्ति का नायक बन चुका था. अस्सी दशक पहले उसके देश के एक कवि ने मरते-मरते जब यह पंक्तियाँ लिखी थी तब उसकी भी उम्र इतनी ही थी-

अरे ओ! अन्यायी तानाशाहों
अँधेरे के प्रेमियों
ज़िंदगी के दुश्मनों
तुमने मज़ाक बनाया निरीह लोगों के घावों का, और उनके खून से रंगी अपनी हथेलियाँ
रुको, मत बहलाओ ख़ुद को वसंत से, साफ़ आसमान से और सुबह के उजास से
क्योंकि क्षितिज से अँधेरा, तूफानों की गड़गड़ाहट और हवा के तेज़ झोंके
तुम्हारी ओर आ रहे हैं

सावधान हो जाओ क्योंकि राख के नीचे आग दबी है
जो कांटे बोयेगा उसे चुभन मिलेगी
तुमने लोगों के सर काटे और काटे उम्मीद के फूल, बालू के गड्ढों को सींचा
खून से और आंसूओं से तब तक कि वे भर नहीं गए

खून की नदियाँ तुम्हें बहा ले जायेंगी और तुम जलोगे क्रुद्ध तूफ़ान में….

अबू अल क़ासिम अल शाब्बी की यह कविता ट्यूनीशिया के प्रदर्शनकारियों की मुक्ति गान बन गयी थी. शाब्बी ने इतनी कम उम्र में प्रकृति से लेकर देशभक्ति से संबंधित अनेक कवितायें लिखीं. रूमान से भरपूर ये कवितायें समूचे अरब में बहुत जल्दी ही  लोगों के जुबान पर चढ़ गयीं. इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मिस्र के कवि मुस्तफा सादिक अल रफ़ी द्वारा रचित कविता को जब ट्यूनीशिया की आज़ादी के बाद राष्ट्र-गान बनाया गया तो उसके आख़िर में दो पंक्तियाँ शाब्बी की भी जोड़ी गयीं-

जिस दिन लोग जीने की ठान लेते हैं, नियति भी उनका साथ देना पड़ता है
और उनकी रातें ढलने लगती हैं, और जंज़ीरें टूटकर बिखरने लगती हैं

वह जिसमें जीवन के लिये ज़िद्दी अनुराग नहीं, हवा में गुम हो जाता है
यही बताया है मुझे अस्तित्व ने, यही घोषणा है अदृष्ट आत्माओं की……

बौउज़ीज़ी द्वारा आग लगाने की घटना के ठीक महीने बाद 17 जनवरी 2011 को काहिरा में अबू अब्दुल मोनाम हमेदेह ने मिस्र की संसद के सामने रोटियों के कूपन न मिलने के कारण अपने शरीर में आग लगा ली. लीबिया में विद्रोह की शुरुआत में बेनग़ाज़ी स्थित गद्दाफ़ी के सैन्य ठिकाने कतिबा के दरवाज़े को अली मेहदी ने अपनी कार में पेट्रोल और घर में तैयार बारूदों से भर कर विस्फोट कर उड़ा दिया. देखते-देखते ट्यूनीशिया की आग अरब के कई देशों में लग गयी और लोग तानाशाहों के दमन का मुक़ाबला करने के लिये सड़कों पर आ गए. हर जगह शाब्बी की कवियायें गायी जा रही थीं. निज़ार क़ब्बानी पढ़े जा रहे थे. सीरिया के शासक के क़हर ने क़ब्बानी को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया था. उनकी कविताओं में बिछुड़ा देश, लाचार लोग और एक नए सुबह की उम्मीद लगातार उपस्थित हैं. इस क्रांति से बहुत पहले वह लिख रहे थे-

सब्ज़ ट्यूनीशिया, तुम तक आया हूँ हबीब की तरह
अपने ललाट पर लिये इक गुलाब और इक किताब
क्योंकि मुझ दमिश्की का पेशा मुहब्बत है

शाब्बी की तरह क़ब्बानी भी पूरे अरब के कवि हो चुके थे और इसका बाक़ायदा अहसास कवि को था-

और दमिश्क देता है अरबियत को उसका रूप
और उसकी धरती पर ज़माने लेते हैं आकार

जब इस क्रांति की लहर लीबिया पहुँची तो एक आश्चर्यजनक दास्तान दुनिया के सामने आई जो ज़िंदगी की तमाम उम्मीदों को इस खौफ़नाक वक़्त में एक बार फिर ज़िंदा कर जाती है. बयालीस सालों के क्रूर शासन में अमाज़ीर कबीलों को अपनी भाषा बोलने, लिखने और पढ़ने की अनुमति नहीं थी. कभी-कभार किसी ने अगर हुक्म मानने में कोताही की तो उसे दंड का भागी होना होता था जिसमें मौत की सज़ा भी शामिल थी. गद्दाफ़ी के क़हर से अमाज़ीर संस्कृति किसी अँधेरे कोने में छुप गयी थी. विद्रोह के शुरू में ही नफ़ूसा पहाड़ियों के अमाज़ीर इलाक़ों ने गद्दाफी के ख़िलाफ़ अपने को दांव पर लगा दिया और कुछ ही हफ़्तों में ये इलाक़े आज़ाद हो गए. गाँव-कस्बों की दीवारों पर अमाज़ीर भाषा में नारे और कवितायें लिखे जाने लगे. इतना ही नहीं, लोगों ने रेडियो प्रसारण के साथ साहित्यिक किताबें भी छापनी शुरू कर दीं. यह सब इतना हैरान कर देने वाला है कि आख़िर ऐसे भयानक दमन के बावजूद इतने सालों तक अमाज़ीरों ने अपनी भाषा और साहित्य को कैसे बचाकर रखा होगा! उम्मीद है कि आनेवाले दिनों में यह भाषा और समृद्ध होगी. लीबिया के नवगठित मंत्रिमंडल में एक अमाज़ीर युवती को संस्कृति मंत्रालय का ज़िम्मा सौंपा गया है.

अरब-क्रांति तानाशाही से मुक्ति का आन्दोलन तो है ही, यह जर्जर और वृद्ध होते अरब के शासन और समाज के विरुद्ध युवाओं का विद्रोह भी है. तानाशाहों के सैनिकों, उनकी बंदूकों और भाड़े के लड़ाकों के सामने खड़े ये युवक किसी एक विचारधारा या संगठन के नहीं हैं. इसमें सभी शामिल हैं और उनका मूल नारा लोकतंत्र या सत्ता-परिवर्तन का नहीं, बल्कि आज़ादी का है- अल हुर्रेया- का है. निज़ार क़ब्बानी ने एक लम्बी कविता अरब के बच्चों के लिये लिखी थी-

अरब के बच्चों,
भविष्य के मासूम कवच,

तुम्हें तोड़ना है  हमारी जंजीरें,
मारना है हमारे मस्तिष्क में जमा अफीम को,
मारना है हमारे भ्रम को.

अरब के बच्चों,
हमारी दमघोंटू पीढ़ी के बारे में मत पढ़ो,
हम हताशा में क़ैद हैं.
हम तरबूजे की छाल की तरह बेकार हैं.

हमारे बारे में मत पढ़ो,
हमारा अनुसरण मत करो,
हमें स्वीकार मत करो,
हमारे विचारों को स्वीकार मत करो,
हम धूर्तों और चालबाजों के देश हैं.

अरब के बच्चों,
वसंत की फुहार,
भविष्य के मासूम कवच,

तुम वह पीढ़ी हो जो
हार को कामयाबी में बदलेगी…

सीरिया से निर्वासित कवयित्री आयशा आर्नौत कहती हैं कि चीख़ों के अक्षर नहीं होते. हर भाषा में ये एक जैसी होती हैं. उनकी अपील है कि दुनिया भर के रचनाकारों को अरब के लोगों का साथ देना चाहिए क्योंकि यह सिर्फ़ अरब का मसला नहीं है. यहाँ मानवता के साझा भविष्य की इबारत लिखी जा रही है. उनका कहना है कि चूंकि ऐसे आन्दोलनों का वास्ता दुनिया-भर से होता है इसलिए समय की इस पुकार को सुन सबको दौड़ना होगा, चाहे हमारे विचार और हमारी मान्यताएं अलग-अलग हों. अरब से हिन्दुस्तान का वास्ता बहुत पुराना है. लेकिन अफ़सोस की बात है कि हमारे लेखक, कवि और रचनाकार हमारे समय के सबसे बड़े घटना-क्रम पर खामोशी साधे हुए हैं. बीता साल फ़ैज़ और नागार्जुन जैसे कवियों का जन्म-शताब्दी वर्ष था जिन्होंने वियतनाम, फ़लस्तीन, अफ़्रीका, बेरुत आदि के दर्द को अपना दर्द जाना. यह कैसे हो सकता है कि हमारा कवि सीदी बौउज़िद के चौराहे पर जलते बौउज़ीज़ी से लेकर काहिरा की सड़कों पर बूटों तले रौंदी जा रही उस ब्लू ब्रा वाली लड़की तक अरब के बहादुर बच्चों की लम्बी कतार के लिये एक कविता समर्पित न करे!

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