…कुछ हश्र तो इनसे उट्ठेगा, कुछ दूर तो नाले जायेंगे

प्रकाश के रे बरगद के संपादक है.

मनाल अल शरीफ

अरब में जारी इन्क़लाबी बसंत तख़्त गिराने और ताज उछालने के साथ बदलाव की नयी फ़िज़ां भी गढ़ रहा है. 25 सितम्बर को सऊदी अरब के राजा और इस्लाम के दो सबसे पवित्र मस्जिदों के सरंक्षक अब्दुल्ला बिन अब्दुल अज़ीज़ ने शूरा की एक महत्वपूर्ण बैठक में घोषणा की कि शूरा में महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिलेगा और वे नगरपालिका के चुनावों में बतौर उम्मीदवार हिस्सा ले सकती हैं और मतदान भी कर सकती है. अपने भाषण में उन्होंने कहा कि महिलाओं को समाज में हाशिये पर नहीं रखा जा सकता. महिलाओं को न्यूनतम नागरिक अधिकारों से भी वंचित रखने वाले सऊदी अरब में राजा की यह घोषणा किसी तानाशाह को उखाड़ फेंकने से कम महत्वपूर्ण नहीं है. सऊदी शाह को यह घोषणा अरब-क्रांति के दबाव में करनी पड़ी है जिससे उनका देश भी अछूता नहीं रहा. देश के कई हिस्सों में छोटे-बड़े  प्रदर्शनों के बाद कुछ महीने पहले उन्होंने नागरिकों के बुनियादी सुविधाओं के लिये बड़ी मात्रा में धन खर्च करने की घोषणा की थी. इसी बीच मनाल शरीफ़ नाम की एक लड़की ने फेसबुक पर यह आह्वान कर दिया था कि महिलाओं के वाहन चलाने पर पाबंदी के ख़िलाफ़ महिलायें सड़कों पर गाड़ियाँ लेकर निकलें. मनाल को गिरफ़्तार तो कर लिया गया, उससे माफ़ीनामा भी लिखवा लिया गया, उसके इन्टरनेट इस्तेमाल पर पाबंदी भी लगा दी गयी, लेकिन उसके आह्वान को रोका न जा सका और देश के कई हिस्सों में महिलाओं ने गाड़ियाँ चलायी और उसकी तस्वीरें इन्टरनेट पर डालीं.

मनाल बस एक लड़की का नाम भर नहीं है, वह उन लाखों-करोड़ों अरबी युवाओं में से एक है जो अपनी आज़ादी और अख्तियारों को लेकर सजग हैं. यह सजगता उन्हें विरोध और विद्रोह के लिये उकसा रही है जिसे अरब के बूढ़े और पतित सत्ताधारी अपनी ताक़त और फ़रेब से दबाने की कोशिश कर रहे हैं. इन तानाशाहों में से कुछ चालाक हैं और बदलते माहौल में कुछ अधिकार और सुधार लाने के लिये तैयार हैं. बहरहाल, अरब की क्रांति हमारी राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण की आधिकारिक अकादमिक समझ को भी चुनौती दे रही है. वहाँ कुछ ऐसा हो रहा है जिसे हमें ठीक से समझने में शायद सदियाँ लगें. 1940 में माओ से जब किसी ने 1789 के फ़्रांसिसी क्रांति के परिणामों के बारे में पूछा था तो माओ ने जवाब दिया था- अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी.

मोशाब अल शामी

ट्यूनीशिया के क्रांति के दौरान अरब के कुछ मित्रों से बातचीत में जब मैं पूछता था कि क्या और देशों में भी ऐसा कुछ होने की सम्भावना है तो जवाब होता था कि बाक़ी सरकारों की अपनी जनता पर मज़बूत पकड़ है और ट्यूनीशिया दोहराया नहीं जा सकता है. और यह भी कि ट्यूनीशिया में ही बेन अली के हटने की सम्भावना कम है. लेकिन बेन अली के भागने की घटना और काहिरा के तहरीर चौक पर जमे हुजूम ने इस निराशा को पूरी तरह बदल दिया और खाड़ी के कुछ छोटे द्वीपों को छोड़ दें तो उतरी अफ्रीका और अरब का कोई देश नहीं बचा जहाँ जनता अपनी सरकारों के ख़िलाफ़ सड़क पर नहीं उतरी. मुबारक के हटने के बाद काहिरा के मेरे एक मित्र मोशाब अलशामी ने ट्विट्टर पर अपने परिचय में लिखा- ‘मैंने विद्रोह किया और एक तानाशाह को अपदस्थ किया’. अलशामी को विद्रोह के दौरान गोली लगी थी लेकिन वह जल्दी ही ठीक हो गए और फिर तहरीर पहुँच गए. मुबारक के बाद सत्ता संभाल रही फौजी हुकूमत ने भी उन्हें गिरफ़्तार किया. एक दिन बातचीत में जब मैंने उनके कुशल-मंगल की चिंता की तो उन्होंने बिंदास भाव से कहा कि अब यह कारवाँ अरब के हर हिस्से में पहुंचेगा और यह कोई बड़ी बात नहीं कि मैं उसमें कितनी देर तक शामिल रह पाता हूँ. एक बाईस साल के नौजवान से ऐसी बातें सुनना भर रोमांचकारी था. यही युवक कल तक ‘कुछ नहीं हो सकता है’ कह रहा था.

बौउज़ीज़ी को हस्पताल में देखने आये बेन अली (तत्कालीन राष्ट्रपति)

अरब क्रांति का यह कारवाँ अब त्रिपोली पहुँच चुका है. अब मोशाब शान से कह सकते हैं- ‘मैं एक अरबी हूँ और अभी-अभी मैंने तीसरे तानाशाह को अपदस्थ किया है’. दशकों पहले सीरियाई कवि निज़ार क़ब्बानी ने अपनी कविता में जिन अरब बच्चों से नई दुनिया गढ़ने और पुरानी दुनिया को ख़ारिज़ का देने आह्वान किया था, निश्चित ही यह वही पीढ़ी है.

मोनाम हमेदेह

अरब की मौजूदा क्रांतियाँ का दौर सभ्यता के इतिहास में सबसे अधिक किंवदंतियाँ रचे जाने का दौर भी है. हर शहर, जुलूस, चौक, मोर्चे पर इतिहास रचा जा रहा है जिसे तफ़्सील से दर्ज़ कर पाना किसी भी मुहर्रिर के लिये मुमकिन नहीं. इसी वज़ह से इस इतिहास का बड़ा हिस्सा किंवदंतियों के खाते में जा रहा है. मोहम्मद बौउज़ीज़ी ने ट्यूनीशिया के सीदी बौउज़िद में सरकारी कर्मचारियों की हरकतों से तंग आकर अपने को आग लगा ली. यह घटना 17 दिसंबर 2010 को हुई थी. इसके ठीक एक महीने बाद 17 जनवरी 2011 को काहिरा में अबू अब्दुल मोनाम हमेदेह ने मिस्र की संसद के सामने रोटियों के कूपन न मिलने के कारण अपने शरीर में आग लगा ली. लीबिया में विद्रोह की शुरुआत में बेनग़ाज़ी स्थित गद्दाफ़ी के सैन्य ठिकाने कतिबा के दरवाज़े को अली मेहदी ने अपनी कार में पेट्रोल और घर में तैयार बारूदों से भर कर विस्फोट कर उड़ा दिया. क्या इतिहास बस इनको शहीदों की फेहरिश्त में डाल कर दूसरी ओर रूख कर जायेगा? अब तक तो इतिहास के ग्रंथों में शहीदों का ज़िक्र भर ही मिलता है और उसमें भी अधिकतर नाम शुमार नहीं होते. तो इनकी जगह कहाँ होगी? या फिर इतिहास और उसे नियंत्रित करने वाला तंत्र कोई नया पैंतरा देगा और इतिहास के नए आन्दोलनों में से किसी एक के हवाले कर अपनी जिम्मेवारी की इतिश्री कर लेगा? इतिहास नायकों के साथ न्याय नहीं करता, नायक के साथ जूझते और योद्धाओं के साथ तो कतई नहीं. उन्हें जगह देती हैं लोक-गाथाएं, उन्हें गाते हैं लोक-गीत. पीढ़ियाँ अपने बच्चों को कथाओं के रूप में दे उन्हें विरासत का हिस्सा बनाती हैं. आपका वर्तमान इतिहास ने नहीं, श्रुतियों ने तय किया है. अरब की इस बयार में इतिहास, विचारधाराएँ, राजनीतियाँ, समझदारियाँ, धर्मों के ध्वज- सब के सब इधर-उधर हो गए हैं.

काहिरा के तहरीर में अरब देशों के झंडे लिये लोग

इक्कीसवीं सदी की बाकायदा शुरुआत चार जनवरी 2011 को बौउज़ीज़ी की मौत से होती है.

रघुवीर सहाय की यह पंक्तियाँ बरबस याद हो आती हैं-
कुछ तो होगा
कुछ तो होगा
अगर मैं बोलूँगा
न टूटे न टूटे तिलस्म सत्ता का
मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा
टूट मेरे मन टूट
अब अच्छी तरह टूट
झूठ मूठ अब मत रूठ

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