ईमानदारी की ताबीज़ और सरकारी-गैर सरकारी कदम ताल

गोपाल कृष्ण पर्यावरण और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता हैं. उनका ईमेल krishna2777@gmail.com है. 

गोपाल कृष्ण

आज के दिन आमजन लोकपाल के अलावा संसद और राज्य के विधान सभाओं से यह मांग कर रहा है कि देश को गैर सरकारी संस्थानों के जन्मदाता 1860 के और 1882 के ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कानून से आज़ाद किया जाए. अधिकतर गैर सरकारी संस्थानों की ऐतिहासिक और राजनीतिक  समझ का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उन्होंने यूनिक आइडेन्टटी नंबर/आधार संख्या/नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर जैसी गुलामी की बेड़ी को देश के हुक्मरानों और कंपनियो के आश्वासन पर इमानदारी की जादुई ताबीज मान लिया है. अभी-अभी विकिलिक्स से पता चला है कि मिस्र के पूर्व तानाशाह होस्नी मुबारक ने अपने देशवासियों का यूनिक आइडेन्टटी (पहचान) पत्र का संग्रह (डेटाबेस), संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की गुप्तचर संस्था फेडेरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन को सौप दिया था. जून 29, 2011 को मनमोहन सिंह ने 6 संपादकों से बातचीत में ‘लोकपाल’ के बजाये यूनिक आइडेन्टटी नंबर/आधार संख्या से भ्रष्टाचार मिटाने की बात की है. हैरानी की बात है कि गैर सरकारी संस्थानों को यह नजर क्यों नहीं आया!

सत्ता परिवर्तन के बजाये अगर व्यवस्था परिवर्तन लक्ष्य है तो केवल लोकपाल से तो ये होने से रहा. आपातकाल के दौरान हुए आन्दोलन से जुड़े अधिकतर लोग अपनी-अपनी गैर सरकारी संस्थान की दूकान खोल कर क्यों बैठ गए? इससे पहले कि वे सन्यास लें या विस्मृति के गर्त मे चले जाएँ, हमें जबाब चाहिए. उन्होंने अपने आन्दोलन को विश्व इतिहास के सन्दर्भ मे क्यों नहीं खंगाला और ‘संपूर्ण क्रांति’ शब्द को क्यों अर्थहीन किया? अब वे और उनसे जुड़े लोग बताये कि क्या लोकपाल से ‘संपूर्ण क्रांति’ होगी?

image: prakash k ray

इसमें भी एक बात तो सरकारी लोकपाल की है. दूसरी अन्ना जी की सदारत में जन लोकपाल की है. तीसरी बात है आम जन लोकपाल की.

इन तीनों में शायद एक बात की सहमति है कि देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में जहर घोल दिया है कम्पनी के मालिकान ने. और अब बड़ी चालाकी से इन तीनों को आमने-सामने कर दिया है. इन तीनों में मेरी सहमति आम जन लोकपाल से है. अभी पिछले दिनों संसद के पुस्तकालय में मेरी नज़र 9 मई 1968 के ‘लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक’ पर पड़ी जिसे तत्कालीन गृह मंत्री यशवंतराव बलवंतराव चव्हाण ने लोकसभा में पेश किया था. उसी के पास लोकपाल विधेयक, 1977 भी रखा हुआ था जिसे राजनितिक बदलाव के बाद तत्कालीन गृह मंत्री चरण सिंह ने पेश किया था जब शांति भूषण कानून मंत्री हुआ करते थे. सन 1971 में भी ‘लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक’ तत्कालीन गृह राज्य मंत्री राम निवास मिर्धा ने लोक सभा में पेश किया था. लोकपाल विधेयक को 1985 में कानून मंत्री अशोक कुमार सेन ने, 1989 में कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी ने, 1996 में कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन राज्य मंत्री एस आर बाला सुब्रमण्यम, 1998 में कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन राज्य मंत्री कदाम्बुर ने और 2001 में कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन राज्य मंत्री वसुंधरा राजे ने लोक सभा में पेश किया था. इस सम्बन्ध में  संसदीय समिति गृह मंत्रालय ने 1996, 1998 और 2001 में अपनी रिपोट भी संसद में रखी थी. एक बार फिर चालीस पन्नों वाला लोकपाल विधेयक, 2011 को  4 अगस्त, 2011 को लोक सभा मे कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन राज्य मंत्री वी. नारायणसामी ने पेश कर दिया गया है.

अगस्त 8 को पीटीआई की एक खबर से पता चला कि राज्य सभा के सभापति और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने इस विधेयक को कांग्रेस प्रवक्ता और राज्य सभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन को सौप दिया है. जिस सरकार ने इसे पेश किया है उसमें और जो संसदीय समिति इसकी पड़ताल करेगी उसमें ‘संपूर्ण क्रांति’ की बात करने वाले लोग भी शामिल है. इस संसदीय समिति मे 6 और सांसदों की भर्ती होना बाकी है. आनेवाले दिनों मे इसमें किस-किस की भर्ती होती है वह देखना राजनीतिक रूप से दिलचस्प होगा.

संसद मे और संसद के बहार क्या कोई है जो बतायेगा कि ऐसा क्यों हुआ कि 1968 से 1977 तक लोकपाल का मामला गृह मंत्रालय के तहत आता था, वह 1985 में कानून मंत्रालय मे चला गया और फिर कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन मंत्रालय के पास. समय के साथ सरकार की लोकपाल के सम्बन्ध में तत्परता में प्राथमिकता की कम होती जा रही है. ऐसा क्यों है कि जब यह स्पष्ट हो गया है कि लोक सभा इस विधेयक को पारित करने में 1968 से 2001 तक नाकामयाब रही है, फिर भी विधेयक को लोक सभा मे ही क्यों पेश किया गया. ऐसे ऐतिहासिक और भारी-भरकम विधेयक का बोझ लोक सभा के कंधे पे डाल कर यही साबित होता है कि आम जन लोकपाल, जन लोकपाल की तो छोड़िये, सरकार अपने विधेयक को लेकर भी थोड़ी सी भी गंभीर नहीं है अन्यथा इसे राज्य सभा मे पेश किया जाता जैसे कि महिला आरक्षण विधेयक के सम्बन्ध में किया गया. सरकार चाहती है कि इस विधेयक का अंजाम भी वही हो जो अतीत मे पेश किये गए विधेयकों का हुआ. सभी दल सरकार में रहे है और उन्होंने बहुत कड़ी मेहनत की है. मगर उनमे इच्छा शक्ति इतनी नहीं थी कि वह ‘सरकारी लोकपाल’ विधेयक संसद से पारित करा पाते.

राजनितिक दलों मे इच्छा शक्ति राष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण विधेयक, 2010 को खंगालने की भी नहीं है जो कि सरकार का आम नागरिक समाज के खिलाफ असली हथियार है जबकि बिना विधेयक के पारित हुए बिना ही १ करोड़ ९० लाख यूनिक आइडेन्टटी नंबर/आधार संख्या बना लिए गए है जो नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) से जुड़ा हुआ है जिसे देशवासियों की आँखों की पुतलियों, उंगलियों के निशान और तस्वीर के आधार पर बनाया जा रही है जो कि अमानवीय है.

राजनितिक दलों में इच्छा शक्ति का अभाव कंपनी विधेयक, 2009 के सम्बन्ध में भी दिख रहा है जिसे जे जे ईरानी समिति की सिफारिशों के आधार पर बनाया गया है. इसके तहत केवल एक व्यक्ति भी कंपनी बना सकता है. भारत के आर्थिक गणना 2005 के अनुसार देश मे 4 करोड़ 20 लाख लोग उद्योग धंधे में है जबकि कंपनियों की संख्या 3 लाख से भी कम है. इस कानून के जरिये 4 करोड़ 20 लाख उद्योग धंधो का कम्पनीकरण किया जा रहा है मगर गैर सरकारी संस्थानों को इसे खंगालने की फुर्सत या नियत नहीं है. जबकि नए कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री वीरप्पा मोइली इसे पारित करवाने को अपनी प्राथमिकता बता रहे है. कंपनी कानून को नजर अंदाज ऐसे देश मे किया जा रहा जो 23 जून को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से अपने पराजित होने और शोषित होने का अपनी 254वाँ वर्षगाठ मनाने से कतरा रहा है. इसी दिन की हार के कारण ब्रिटिश संसद को भारत के सम्बन्ध मे कानून बनाने का अधिकार मिला. उसमें ब्रिटिश कम्पनी कानून भी शामिल है जिसे भारत ने बड़ी मासूमियत से अपना लिया. देश और सरकार का भी कम्पनीकरण किया जा रहा है. गैर सरकारी संस्थानों और कम्पनी आधारित अखबारों और चैनलों से यह उम्मीद करना कि वे देश और सरकार के कम्पनीकरण को रोकेंगे, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है.

अन्ना जी की सदारत वाली जन लोकपाल ‘सरकारी लोकपाल’ को आइना दिखा रही है. आइना दिखाना तो ठीक है. मगर अन्ना जी गैर सरकारी संस्थानों के बड़े तबके और उन जनों की तरफ से बोल रहे हैं जो काले धन से तो पीड़ित है मगर काले धन पर आधारित राजनितिक और आर्थिक व्यवस्था को बदलने की पहल अब तक नहीं कर पाए है. गैर सरकारी संस्थानों का जन्म 1860 के और 1927 के ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कानून से हुआ है. यह संस्थान, कानूनी तो हैं पर असल में सामाजिक, लोकतान्त्रिक और शायद संवैधानिक भी नहीं है. उन्हें यह भी याद नहीं कि महात्मा गाँधी ने एशियाटिक रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1907 का विरोध इसलिए किया था क्योंकि वह उंगलियों की निशानदेही पर आधारित था ठीक वैसे ही जैसा कि यूनिक आइडेन्टटी नंबर/आधार संख्या और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) में हो रहा है. ब्रिटिश सरकार के इस कानून जिसके तहत एशिया और भारत के लोगों को पहचान पत्र दिए जा रहे थे उसे काला कानून कहा था और उसे सरे-आम जला दिया था. उन्होंने शोध कर यह कहा कि उंगलियों की निशानदेही से सम्बंधित वो किताब जिसे एक पुलिस अफसर ने लिखा था उससे ये पता चलता है कि “उंगलियों की निशानदेही की जरुरत केवल अपराधियों के लिए होती है.”  अन्ना जी की सदारत वाली जन लोकपाल टीम को भी अपने विचार और अभियान को महात्मा गाँधी के आईने मे देखना होगा.

सच यह है कि कुछेक को छोड़ कर गैर सरकारी संस्थानों मे सब गमले में उगे हुए बरगद है. उनके होने मात्र से ब्रिटिश संसद की 1857 की पहली आज़ादी की लड़ाई के बाद की कारस्तानियों की याद ताज़ा हो जाति है. गैर सरकारी संस्थान आम जन का प्रतिनिधित्व नहीं करते है. कंपनियों की तानाशाही, उनके अपराधों और राजनितिक दल की फंडिंग के बारे मे अगर वो खुल कर बोलते हैं तो हम उनका सम्मान तो कर सकते है मगर ऐसा नहीं कह सकते कि वे आम जन का प्रतिनिधित्व करते है. भारत मे 2009 के एक अनुमान  के मुताबिक 33 लाख गैर सरकारी संस्थान हैं. इतने तो अपने देश में स्कूल और अस्पताल भी नहीं हैं. यदि यह सारे अन्ना जी के साथ आ भी जाएँ तो भी ऐसा नहीं कह सकते कि वे सारे आम जनों की तरफ से बोल रहे हैं.

अविभाजित भारत (पाकिस्तान और बंगलादेश सहित) पर जो असर 1860 के और 1882 के ब्रिटिश संसद द्वारा पारित गैर सरकारी संस्थानों के निर्माण के कानून का पड़ा है उसी का ये नतीजा है कि इस इलाके मे आम जन त्राहि-त्राहि कर रहे है मगर कोई पुख्ता और सचमुच का आन्दोलन खड़ा नहीं हो पा रहा है. आम जन लोकपाल की मांग है कि गैर सरकारी संस्थानों से जुड़े कानूनों को निरस्त किया जाए. और 1860 से लेकर अब तक जितने गैर सरकारी संस्थान बने हैं उनपर एक श्वेत पत्र लाया जाये. गैर सरकारी संस्थानों से अनेक भले लोग विकल्पहीनता के कारण भी जुड़े हैं.

जहाँ तक जन लोकपाल और आम जन लोकपाल की बात है उसमें संवाद की गुंजाईश है अगर 1860 के और 1882 के ब्रिटिश संसद द्वारा पारित गैर सरकारी संस्थानों के निर्माण के कानून, कंपनी कानून और अनूठी पहचान/आधार संख्या के नागरिक विरोधी होने की बात पर सहमति बने और टुकड़े-टुकड़े में बात करने के बजाये सचमुच का साझा, लोकतान्त्रिक मंच बनाये जिसमे नागरिक होना प्राथमिक हो न कि व्यवसायी होना या व्यवसायियों से जुड़े होना.

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