सोनिया जी स्वस्थ रहें, देश का भी स्वास्थ्य अच्छा रहे

प्रकाश के रे बरगद के संपादक है.

केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया बीमार हैं और अमेरिका में उनका इलाज चल रहा है. ख़बरों के मुताबिक, उनकी हालत ठीक है और लगभग तीन हफ़्ते में वह स्वस्थ होकर देश लौट आयेंगी. हमारी शुभकामना है कि वह जल्दी स्वस्थ हों. ऐसे मौके पर सीधे सीधे राजनीति बतियाने की हमारी परंपरा नहीं है और शायद यह ठीक भी है. लेकिन मन नहीं मानता है. सोनिया जी की बीमारी और अमरीका में उनके ईलाज के बहाने कुछ कहने से अपने को रोक पाना कठिन है. अब यह कोई कहने की बात नहीं हैं और इस पर मेरी कोई आपत्ति भी नहीं है कि कॉंग्रेस अध्यक्ष के ईलाज का खर्चा इस देश की जनता वहन करेगी. वे सांसद हैं, सत्तारूढ़ गठबंधन और राष्ट्रीय सलाहकार समिति के प्रमुख होने के नाते उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल है. वे पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नी भी हैं. इन वज़हों से उनके ईलाज का खर्च देश उठाएगा और उसे उठाना भी चाहिए. यह बात मैं पूरी संजीदगी से कह रहा हूँ और इसे किसी भी तरह से अन्यथा न लिया जाये. इस सन्दर्भ में मैं कुछ बातें देश की गरीबी के बारे में करना चाहूँगा जिससे सारी बीमारियाँ पैदा होती हैं और देश का स्वास्थ्य ख़राब होता है.

यह अस्वाभाविक नहीं है कि जिस देश के कुल घरेलू उत्पाद का पच्चीस फ़ीसद के बराबर संपत्ति चंद घरानों के पास हो, वैश्विक भूख सूची के 88 देशों में उस देश का स्थान 67 वां  हो. देश का 55 फ़ीसद भयानक गरीबी में जी रहा है. अफ़्रीका के सबसे अधिक गरीब 26 देशों से भी अधिक गरीब भारत के आठ राज्यों- बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बंगाल- में हैं. पांच साल से कम उम्र के कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या को लें तो दुनिया भर में हमारी हालत सिर्फ़ ईथोपिया से बेहतर है. देश की दो-तिहाई औरतें खून की कमी से पीड़ित हैं. बूढ़े और मरणासन्न लोगों की देखभाल के मामले में भी हम निचले पायदान पर हैं. हर साल इस देश में दूषित जल से होने वाली बीमारियों से हज़ारों मर जाते हैं. देश में कुछ गिने-चुने ईलाके ही ऐसे हैं जहाँ का पानी पीने लायक है. करीब 14 लाख शिशु तो ऐसी पांच बीमारियों से मर जाते हैं जिनका ईलाज संभव है. यह आंकड़ा भी सालाना है. इनमें आठ लाख बच्चे जन्म के एक महीने के भीतर मर जाते हैं. भारत का नाम उन देशों में शुमार है जो स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च करते हैं. राज्य सरकारें अपने कुल घरेलू उत्पाद का महज 0.5 फ़ीसद ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करती हैं. देश की लगभग सवा अरब की आबादी में से सिर्फ़ 34 फ़ीसद की ही सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य-केन्द्रों तक पहुँच है. अब इन अस्पतालों और डिस्पेंसरियों की दशा के बारे में सबको मालूम ही है. प्रति व्यक्ति आहार उपलब्धता के मामले में भी हमारा स्थान अति पिछड़े और अफ्रीकी देशों से नीचे है. ये सारे आंकड़े भारत सरकार और संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न संस्थाओं के हैं. राहुल पंडिता की हालिया प्रकाशित किताब ‘हेलो बस्तर’ के उपसंहार में इन तथ्यों की ओर ध्यान माओवादी नेता कोबाद गांधी ने दिलाया है. यह भी कह देना उचित होगा कि मैं घोर माओवाद विरोधी हूँ, लेकिन कोबाद गाँधी की बातों से किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का विरोध नहीं हो सकता.

ध्यान रहे, प्रति व्यक्ति आंकड़े औसत से निकाले जाते हैं. उदहारण के लिये, प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े में टाटा-बिरला-अम्बानी आदि की आय के साथ फटा सुथन्ना पहने हरचरना की आय जोड़ कर उसे जनसंख्या से विभाजित कर दिया जाता है. इसका मतलब यह हुआ कि असलियत में स्थिति इन आंकड़ों की भयावहता से भी कहीं अधिक भयावह है. ख़ैर, कुछ और आंकड़ों पर नज़र डालें. स्त्री रोग एवं प्रसूति विज्ञान से संबंधित देश की सबसे बड़ी संस्था FOGSI के अनुसार, गर्भ और शिशु-जन्म से जुड़ी परेशानियों के कारण देश में हर रोज़ लगभग 300 औरतें मर जाती हैं जबकि इनमें से 90 फ़ीसद से अधिक को बचाया जा सकता है. प्रजनन की उम्र के दौरान मरने वाली कुल स्त्रियों में से 15 फ़ीसद महिलाओं की मृत्यु के कारण गर्भधारण से जुड़े हैं. 40 फ़ीसद से अधिक गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य सम्बन्धी गंभीर समस्याएं होती हैं जिनमें 15 फ़ीसद समस्याएँ जच्चा और बच्चा के लिये जानलेवा हो सकती हैं. असुरक्षित गर्भपात भी बड़ी संख्या में मौतों के लिये जिम्मेवार है. जैसा कि ऊपर कहा गया है कि राज्य सरकारें अपने कुल घरेलू उत्पाद का महज 0.5 फ़ीसद ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करती हैं, वहीं केंद्र सरकार का खर्चा महज 0.9 फ़ीसद है. इस मामले में में दुनिया के आधे दर्जन देश भी हमसे पीछे नहीं हैं.

अब ज़रा बच्चों की स्थिति पर नज़र दौड़ाएं. कुछ बातें तो ऊपर कही गयी हैं. हर एक हज़ार बच्चों में से 66 बच्चे पांच साल की उम्र तक पहुँचने से पहले दम तोड़ देते हैं. 2009 में देश में 2,67,87,000 बच्चे पैदा हुए और 17,26,000 बच्चे पांच साल की उम्र से पहले मौत के मुँह में चले गए. बच्चों की मौत का औसत पांच हज़ार रोज़ाना से ऊपर का बैठता है. इन मौतों को रोका जा सकता है अगर हमारी सरकारें बच्चों के लिये साधारण और न्यूनतम स्वास्थ्य का उपाय कर दें. देश में लगभग 84 फ़ीसद मेडिकल खर्च लोगों को अपनी जेब से देना होता है. ऐसे में गरीब परिवारों के लिये ईलाज करना असंभव हो जाता है. उल्लेखनीय हैं कि गरीबों का ईलाज का वायदा कर देश भर में बड़े-बड़े निजी अस्पताल कौड़ियों के भाव ज़मीन ले रहे हैं लेकिन उनका ईलाज करना तो दूर, गरीबों को उनके आसपास भी फटकने नहीं दिया जाता है. ये अस्पताल निःशुल्क ईलाज के झूठे कागजात तैयार कर ग़लत आमदनी दर्ज़ करवा कर टैक्स की चोरी भी करते हैं.

और सबसे खतरनाक बात. गरीब और लाचार भारतीयों का दुःख-दर्द कुछ लोगों के लिये बेहिसाब दौलत कमाने का मौका भी बना है. देश में चिकित्सकों और दवा वालों की चांदी तो है ही, विदेशी भी इस मौके का पूरा फ़ायदा उठा रहे हैं. दवा बनाने वाली बड़ी अमरीकी कम्पनियां चिकित्सकीय शोध संस्थाओं की आड़ में भारत के गरीब रोगियों पर अपनी दवाओं का परिक्षण कर रहे हैं जिसका धंधा तकरीबन 30 बिलियन डॉलर का है और यह सब अमरीकी और भारतीय सरकारों के सरंक्षण में हो रहा है.

कई लोगों ने यह बात उठाई है कि आख़िर महाशक्ति बन रहे देश की सबसे शक्तिशाली नेता को ईलाज के लिये अमरीका क्यों जाना पड़ा. ख़ैर, मेरा इस बात से कोई लेना देना नहीं है. मेरा तो आग्रह इतना है कि सोनिया जी जल्दी ठीक हो जाएँ और इन समस्याओं पर गंभीरता दिखाएँ. देश के करोड़ों लोगों की किस्मत का ठेका उन्हीं के पास है.

Advertisements