परदे पर कविता

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से पी एच डी अरविन्द दासपत्रकार और फोटोग्राफ़र हैं. साहित्य और सिनेमा में गहरी रूचि. इनसे arvindkdas@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

अरविन्द दास

पिछले साल मानसून में मैं पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (एफटीआईआई) में फिल्म एप्रीसिएशन पाठयक्रम की पढ़ाई कर रहा था. इस संस्थान ने पिछले साल ही अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे किए. एफटीआईआई की यात्रा और भारतीय सिनेमा में उसके योगदान को लेकर मैंने एक लेख लिखा था और इसी सिलसिले में मणि कौल को मैंने फोन किया था. उन्होंने कहा कि ‘मैं आ ही रहा हूँ वहीं बैठ कर बात कर लेंगे.’

पाठ्यक्रम के आखिरी दिन मणि कौल ने अपना व्याख्यान दिया था. मैं उनके हंसमुख व्यक्तित्व और मजाकिया लहजे से परिचित था. ‘ओसियान’ फिल्म समारोह के दौरान दिल्ली में उनसे गाहे-बगाहे मुलाकात हो जाती थी. बीते कुछ वर्षों से वे दिल्ली ही रह रहे थे और ओसियान से जुड़े थे.

एफटीआईआई-एनएफएआई में फिल्म एप्रीसिएशन पाठयक्रम, 2010 के दौरान व्याख्यान देते मणि कौल (चित्र: अरविन्द दास)

व्याख्यान के दौरान जब एप्रीसिशन पाठयक्रम के संयोजक सुरेश छाबरिया ने उनका परिचय कराते हुए कहा कि ‘मणि हमारे समय के सबसे बेहतरीन फिल्म निर्देशक हैं’ तो कई सहपाठियों ने विस्मय से रूप से उनकी ओर देखा था. हमारी पीढ़ी जिसने नब्बे के दौरान होश संभाला, मणि कौल और उनकी फिल्मों को नहीं जानती. लेकिन मणि कौल एक निर्देशक के साथ-साथ सिनेमा के कुशल शिक्षक भी थे. व्याख्यान के दौरान उन्होंने बताया कि ‘सिनेमा ध्वनि और बिंब का कुशल संयोजन होता है और उसे उसी रूप में पढ़ना चाहिए.’ पढ़ाई के दौरान में हमें उनकी बहुचर्चित फिल्म ‘सिद्धेश्वरी’ दिखाई गई थी. फिल्म के प्रदर्शन से पहले फिल्म की भूमिका बांधते हुए उन्होंने अपने परिचित अंदाज में मुस्कुराते हुए कहा था कि ‘अगर कुछ चीजें समझ में नहीं आए तो ज्यादा दिमाग मत लगाइएगा यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है.’ लेकिन ‘सिद्देश्वरी’ देखते हुए ऐसे लगा कि हम एक लंबी कविता को परदे पर पढ़ रहे हैं.

दरअसल, मणि कौल खुद के बारे में बेहद मजाकिया लहजे में बात करते थे. दर्शकों के बीच अपनी फिल्म के पहुँच को लेकर उन्होंने हमें एक वाकया सुनाया था. चर्चित अभिनेता राज कुमार उनके चाचा थे. एक फिल्म पार्टी के दौरान उन्होंने आवाज देकर मणि कौल को बुलाया और कहा, ‘जानी, मैंने सुना है कि तुमने फिल्म बनाई है..उसकी रोटी. क्या है यह? रोटी के ऊपर फिल्म! और वह भी उसकी रोटी? तुम मेरे साथ आ जाओ हम मिल कर अपनी फिल्म बनाएँगे- अपना हलवा.” बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि ‘मैं हिंदी में ही सोचता और लिखता हूँ.’ उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दुविधा, सतह से उठता आदमी और नौकर की कमीज हिंदी की चर्चित कृतियाँ है. मणि कौल ने हिंदी साहित्य की इन कृतियों को आधार बना कर फिल्म रची और इन्हें एक नया आयाम दिया. मुंबइया फिल्मों के कितने फिल्मकार आज हिंदी में सोचते और रचते हैं? मणि कौल को संगीत की गहरी समझ थी. उन्होंने डागर बंधुओं से विधिवत संगीत सीखा था और जिसकी परिणति ‘ध्रुपद’ फिल्म में सामने आई. मणि कौल ने माना था कि उन्हें फिल्म बनाने में वित्तीय संकट से जूझना पड़ रहा हैं. पर सृजनात्मकता से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. अंतिम दिनों में वे विनोद कुमार शुक्ल की कृति ‘खिलेगा तो देखेंगे’ को सिनेमाई भाषा में रच रहे थे.

वर्ष 1969 में महज 25 वर्ष की उम्र में मोहन राकेश की कहानी ‘उसकी रोटी’ पर इसी नाम से फिल्म बना कर उन्होंने हिंदी फिल्मों को ‘पापुलर सिनेमा’ से बाहर निकाल कर ‘समांतर सिनेमा’ का एक नया रास्ता दिखाया था. वर्ष 1964-65 में ऋत्विक घटक उप प्राचार्य के रूप में एफटीआईआई नियुक्त हुए थे और एक पूरी पीढ़ी को सिनेमा की नई भाषा से रू-ब-रू करवाया. मणि कौल ऋत्विक घटक के शिष्य थे. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने बताया कि मणि कौल घटक के सबसे ज्यादा करीब थे. अपने गुरु ऋत्विक घटक के प्रति मणि कौल बेहद कृतज्ञ थे. उनका कहना था “मैं ऋत्विक दा से बहुत कुछ सीखता हूँ. उन्होंने मुझे नवयथार्थवादी धारा से बाहर निकाला.” अक्सर ऋत्विक घटक की फिल्मों की आलोचना मेलोड्रामा कह कर की जाती है. मणि कौल का कहना था कि वे मेलोड्रामा का इस्तेमाल कर उससे आगे जा रहे थे. उस वक्त उन्हें लोग समझ नहीं पाए.

घटक की तरह ही हम उनके योग्य शिष्य मणि कौल की फिल्मों को उनके जीते जी समझ नहीं पाए.

समांतर सिनेमा को दुरूह और अबूझ कह कर खारिज करने की कोशिश की जाती रही है. हालांकि उन्होंने कहा था कि ‘वर्तमान में जब अनुराग कश्यप और इम्तियाज अली जैसे निर्देशक मुझे फोन कर के कहते हैं कि मेरी फिल्मों से उन्हें काफी सीख मिलती है तो काफी खुशी होती है.’ दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में हिंदी फिल्मों में संवेदनशील, प्रयोगधर्मी युवा फिल्मकारों की आवक बढ़ी है जो मणि कौल की फिल्मों से प्रेरणा ग्रहण कर भीड़ और लीक से हट कर हिंदी सिनेमा का एक नया संसार रच रहे हैं.

लेकिन आज जब कुछ लोग ‘डेल्ही बेली’ और उसमें प्रयुक्त भौंडेपन और गालियों को ही सिनेमा की भाषा मानने पर लोग जोर दे रहे हैं, ऐसे में मणि कौल की फिल्मों की पहचान कैसे होगी?

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