समलैंगिकता: बहस के कुछ सन्दर्भ

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

ठीक दो साल आज के दिन दिल्ली उच्च न्यायलय ने अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के अंतर्गत अपराध माने गए ‘अप्राकृतिक’ यौन संबंधों के बारे में व्यवस्था दी थी कि वयस्कों के बीच आपसी सहमति से और निजी परिवेश/एकांत (प्राइवेट) में बनाये गए यौन संबंधों को अपराध मानना संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन है. इस फैसले पर स्वाभाविक रूप से समलैंगिक संबंधों के पक्षधर और प्रगतिशील तबके ने प्रसन्नता जतायी थी, लेकिन विभिन्न धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक-आध्यात्मिक गुरुओं ने धर्म, सभ्यता और संस्कृति की दुहाई देते हुए विरोध किया था जो अब भी ज़ारी है. दस सालों से चल रहा यह मसला अभी सर्वोच्च न्यायलय में है.

अदालत के फैसले के बावज़ूद यह मुद्दा सामाजिक स्तर पर लगातार विवादग्रस्त रहा है. यह विवाद हमारे समय का सबसे महत्वपूर्ण विवादों में से एक है क्योंकि यह कुछ लोगों के यौन-अधिकारों पर बहस मात्र नहीं है. यह बहस भारतीय गणतंत्र के बुनियादी आदर्शों और मूल्यों से जुडती हुई ज्ञान-विज्ञान की प्रस्थापनाओं को खंगालती है तथा इस प्रक्रिया में वह सभ्यता और संस्कृति के बहुत पुराने पन्नों को भी कई बार पलट जाती है. महज़ यौन-विमर्श मान कर इस बहस में शामिल होना या जल्दी में कोई फ़ैसला, फतवा या फ़रमान ज़ारी करना या अपने को इससे परे रखना इस व्यापक निहितार्थ के मुद्दे की सार्थकता को कमज़ोर करना होगा. इस लेख में बहस के ख़ास बिन्दुओं को रेखांकित करते हुए समलैंगिकता के उलझे सवाल को समझने की कोशिश की गयी है.

उच्च न्यायालय के फैसले के ख़िलाफ़ दिए जा रहे धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक तर्कों की पड़ताल से पहले इस फैसले और इस मुद्दे से जुड़े कानूनी इतिहास का संक्षिप्त सर्वेक्षण आवश्यक है.

अंग्रेज़ी राज द्वारा ब्रिटिश कानूनों के साये में भारतीय दंड संहिता का निर्माण किया गया था. पुरुषों में परस्पर यौन संबंधों को एक अपराध के रूप में इंग्लैण्ड में 1290 और 1300 ईस्वी की संहिताओं में दर्ज़ किया गया था और इसके लिये ज़िंदा जला देने की सज़ा तय की गयी थी. 1533 और फिर 1563 में इसमें बदलाव करते हुए फांसी की सज़ा का प्रावधान हुआ. 1861 में इंग्लैण्ड और वेल्स में मृत्युदंड हटा दिया गया पर समलैंगिकता एक आपराधिक कृत्य बना रहा. लॉर्ड मैकॉले ने जब इसी साल ब्रिटिश भारत के लिये दंड संहिता बनाई तो उसने इंग्लैण्ड के इस कानून को लागू करते हुए ‘प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध’ आपसी सहमति से की गयी यौन-क्रियाओं को अपराध घोषित किया तथा इसके लिये अधिकतम सज़ा उम्रक़ैद निर्धारित की. आज़ादी से पहले और बाद के विबिन्न अदालती फैसलों ने इस धारा की व्याख्या करते हुए स्त्री-पुरुष के बीच जननांगीय यौन-क्रिया को छोड़ हर तरह के यौनाचार को, भले वे परस्पर सहमति से किये गए हों, ‘प्रकृति-विरुद्ध’ कहा और ऐसे अपराधों को दंडनीय माना.

1967 में ब्रिटेन में यौन-अपराध कानून में संशोधन करते हुए समलैंगिकता और व्यस्क पुरुषों के बीच सहमति से होने वाले यौनाचार को अपराधों की श्रेणी से हटा दिया गाय. इस संशोधन का आधार 1957 की वोल्फ़ेंडें समिति की सिफारिशें थीं जिनमें सांसद को समलैंगिकता को अनाप्राधिक घोषित करने की सलाह दी गयी थी.

दिल्ली उच्च न्यायलय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश अजित प्रकाश शाह और न्यायाधीश एस मुरलीधर ने 2 जुलाई 2009 के अपने फैसले में साफ कहा है कि दो व्यस्क लोगों की परस्पर सहमति से बनने वाले यौन संबंधों को अपराधिक मानना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21, 14 एवं 15 में उल्लिखित मूलभूत अधिकारों की अवहेलना है. पंडित जवाहरलाल नेहरु द्वारा संविधान सभा में पेश ‘उद्देश्यपरक प्रस्ताव’, जो संविधान की प्रस्तावना का आधार है, को उद्धृत करते हुए न्यायाधीशों ने कहा है कि संविधान की मूल भावना यह है कि हर एक व्यक्ति का समाज में एक अहम् स्थान है और किसी को सिर्फ़ इसलिए बहिष्कृत नहीं किया जा सकता कि बहुमत की राय में वह ‘भिन्न’ है. उन्होंने यह भी कहा है कि भेदभाव समानता का शत्रु है तथा समानता के अधिकार की स्वीकृति हर एक व्यक्ति के आत्मसम्मान को सुदृढ़ करता है.

अदालत ने स्वयंसेवी संस्था नाज़ फाउंडेशन की याचिका के तर्कों से सहमति जताई थी. संस्था का कहना था कि इस धारा के तहत असहमति से और अवयस्कों से बनाये बनाये गए यौन-संबंधों को ही आपराधिक कृत्य माना जाये. नाज़ ने बताया था कि इस कानून के कारण सरकारी संस्थाएं भेदभाव का रवैया अपनाती हैं जिससे एड्स/एच आई वी के रोकथाम के लिये किये जा रहे प्रयासों में बाधा आती है. संस्था ने यह भी साबित किया था कि इस कानून की आड़ में उत्पीड़न, शोषण और हिंसा भी की जाती है.

विश्वनाथ मंदिर, खजुराहो

दिलचस्प है कि 2004 में उच्च न्यायलय ने नाज़ की याचिका को यह कहकर ख़ारिज़ कर दिया था कि विधि की संवैधानिकता पर दी गयी अकादमिक चुनौती को स्वीकार करने की ज़रुरत नहीं है. लेकिन सर्वोच्च न्यायलय ने 2006 में इस आदेश को ख़ारिज़ करते हुए याचिका पर सुनवाई का आदेश उच्च न्यायलय को दिया. सुनवाई के दौरान भारत सरकार, दिल्ली सरकार, कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं, विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं ने अपना पक्ष रखा था. भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन ने नाज़ संस्था की बातों का समर्थन किया था. कई संस्थाओं के साझा मंच- धारा ३७७ के विरुद्ध आवाज़ें- का तर्क था कि यह कानून असंवैधानिक होने के साथ इस बेतूकेपन पर भी आधारित है कि यौन-क्रिया का उद्देश्य महज़ बच्चे पैदा करना है. इन तर्कों को स्वीकार करते हुए न्यायाधीशों ने यह भी दर्ज़ किया था कि चिकित्सा एवं मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ समलैंगिकता को बीमारी या मानसिक असंतुलन नहीं, बल्कि यौन-व्यवहार का एक प्रकार मानते हैं.

इस खंडपीठ ने 105 पन्ने के अपने फ़ैसले में सविधान-प्रदत्त समानता और स्वतंत्रता के अधिकारों कि व्याख्या करते हुए इन्हें व्यापक आयाम दिए हैं. भारत सरकार के आकलन के मुताबिक, देश में समलैंगिकों, किन्नरों, कोत्तियों आदि की संख्या लाखों में है. इन्हें अपराधियों की जमात से निकाल कर पूर्ण नागरिकता का सम्मान देनेवाला यह ऐतिहासिक निर्णय इस मांग को समुचित आधार मिला है कि धारा 375 और धारा 377 में वर्णित दुष्कर्म की परिभाषा में संशोधन हो, जैसा विधि आयोग की 172 वीं रपट में कहा गया है. साथ ही, यह भी ज़रूरी है कि हमारे लोकतान्त्रिक अनुभवों तथा वैश्विक स्तर पर कानूनों में हुए प्रगतिशील बदलावों के आधार पर डेढ़ सौ साल से भी ज़्यादा पुराने भारतीय दंड संहिता में व्यापक फेरबदल किये जाएँ.

दिल्ली उच्च न्यायलय के इस फ़ैसले को कुछ धार्मिक संगठनों और व्यक्तियों ने सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आधारों पर सर्वोच्च न्यायलय में चुनौती दी है जिसकी सुनवाई चल रही है. इन आधारों का परीक्षण किया जाना चाहिए. विरोधियों का सबसे बड़ा तर्क है कि समलैंगिकता और अप्रजननमूलक यौनाचार परम्परा-विरुद्ध है और पश्चिम से आयातित है. लेकिन इस बात के प्रमाण बड़ी संख्या में मिलते हैं कि समाज में स्त्री-पुरुष के बीच प्रजननमूलक यौन-क्रिया के अलावा विभिन्न प्रकार के यौन-सम्बन्ध हमेशा से ही बनते रहे हैं. साथ ही, ऐसे यौनाचारों को लेकर विभिन्न प्रतिक्रियाएं भी रही हैं. मनुस्मृति में समलैंगिकता को अपराध माना गया है और इसके लिये अनेक सजाओं का उल्लेख है. यदि अधिक उम्र की स्त्री किसी युवती, जिसका कौमार्य भंग न हुआ हो, के साथ ऐसा करे तो उसका मुंडन कर या दो अंगुलियाँ काट कर गधे पर बैठा कर नगर घुमाने की सज़ा की व्यवस्था है. यदि दो युवतियां, जिनका कौमार्य भंग ना हुआ हो, ऐसा करें तो उन्हें छड़ी से पीटने और आर्थिक दंड का प्रावधान है. मनुस्मृति की इन व्यवस्थाओं में मुख्य चिंता कौमार्य की है जिसके भंग हो जाने से शादी की संभावनाओं पर विपरीत असर हो सकता था. इस ग्रन्थ में ऐसी स्त्रियों के संबंधों पर कोई व्यवस्था नहीं है जिनका कौमार्य भंग हो चुका हो. पुरुषों के समलैंगिक संबंधों पर यह ग्रन्थ अपेक्षाकृत अधिक उदार है. ऐसे पुरुषों की जाति का स्तर निम्न करने या पूरे कपड़े पहन कर स्नान की सज़ा का वर्णन है. यह ग्रन्थ अक्सर विषमलिंगी यौन-अपराधों के लिये समलैंगिकों की तुलना में कठोर सज़ा का उल्लेख करता है. इसमें ‘तृतीय लिंग’ यानि हिजड़ों की उत्पत्ति का विवरण भी दिया गया है जिसके अनुसार बालक और बालिका का जन्म क्रमशः वीर्य और स्त्री-तत्व की अधिकता से निर्धारित होता है और जब ये तत्व समान मात्रा में होते हैं तब तृतीय लिंग के शिशु (‘नपुसक’) या बालक-बालिका युग्म के जुडवा बच्चे पैदा होते हैं.

चौथी सदी के आसपास रचित नारद स्मृति में समलैंगिक पुरुषों की शादी वर्जित है. इस ग्रन्थ में चौदह प्रकार के पुरुषों का वर्णन है जिन्हें स्त्री के साथ यौनाचार के लिये अक्षम मना गया है. इसी काल के यौन-विषयक ग्रन्थ कामसूत्र में विभिन्न क्षेत्रों में विद्यमान समलैंगिक आचरण और कई लिंग-प्रकारों का वर्णन मिलता है. इस ग्रन्थ में किन्नरों (‘तृतीय प्रकृति’) और समलैंगिक पुरुषों में स्त्री-भाव और पुरुष-भाव होने तथा उनके पेशे का विस्तृत उल्लेख है. ऐसे लोगों के बीच वैवाहिक-संबंधों का विवरण भी दिया गया है. बारहवीं सदी में रचित कामसूत्र की महत्वपूर्ण टीका यशोधर-कृत जयमंगल में समलैंगिक पुरुषों के बीच विवाह के उल्लेख के साथ यह भी कहा गया है कि ऐसे पुरुषों में परस्पर मैत्री और विश्वास का गहन भाव मिलता है. कामसूत्र और जयमंगल में स्त्रिओं के समलैंगिक संबंधों का उल्लेख भी विस्तार से हुआ है. प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण चिकित्सा-ग्रन्थ सुश्रुत संहिता में कहा गया है कि समलैंगिक पुरुषों और किन्नरों की यौन-विशेषताएं गर्भ-धारण के समय ही निर्धारित हो जाती हैं. शब्द-कल्प-द्रुम संस्कृत कोष, काम-सूत्र और स्मृति रत्नावली जैसे ग्रंथों में बीस तरह के समलैंगिक पुरुष बताये गए हैं. खजुराहो, पुरी और तंजौर के मंदिरों में समलैंगिक संबंधों को दर्शाते चित्र बहुतायत में देखे जा सकते हैं. कई पुराने जैन और बुद्ध मंदिरों में भी ऐसे चित्र मिलते हैं.

वाल्मीकि रामायण के एक विवरण के अनुसार लंका में हनुमान ने ऐसी स्त्रियाँ देखा जो आपस में प्रणय-क्रिया करती थीं और रावण भी उसमें शामिल होता था. पद्मपुराण में दो रानियों की कथा है जिसमें उन्होंने परस्पर रति-क्रिया कर एक अस्थिरहित शिशु को जन्म दिया था. महान संगीतकार मुथुस्वामी दीक्षितर की नवग्रह कीर्ति में बुध को नपुंसक यानि न तो पूर्ण पुरुष और न ही पूर्ण स्त्री माना गया है. पुराणों की कथा का हवाला देते हुए उन्होंने लिखा कि जब बृहस्पति को पता चला कि उनकी पत्नी तारा के गर्भस्थ शिशु का पिता चन्द्र है तो उन्होंने शिशु को उभयलिंगी होने का श्राप दे दिया. इसप्रकार पैदा हुए बुध ने इला से शादी की जो एक पुरुष था किन्तु एक श्राप के कारण स्त्री हो गया था. महाभारत के अनुसार इनके संसर्ग से चन्द्र वंश की उत्पत्ति हुई. पौराणिक कथाओं में ऐसे दृष्टान्तों की भरमार है. नारद एक तलब में गिरकर स्त्री हो गये और उन्हें माया का ज्ञान हुआ. शिव यमुना में नहा कर गोपी बने ताकि कृष्ण के संग रास कर सकें. वृन्दावन के गोपेश्वर मंदिर की यही कथा है. अहमदाबाद के निकट स्थित बहुचार जी मंदिर के बारे में कथा प्रचलित है कि कभी यहाँ एक तालाब था जिसमें नहाने से स्त्रियाँ पुरुष हो जाती थीं. आज स्त्रियाँ इस मंदिर में पुत्र-प्राप्ति के लिये पूजा करती हैं और वहाँ के भक्तों का आशीर्वाद ग्रहण करती हैं. ये भक्त पुरुष होते हुए भी स्वयं को स्त्री मानते हैं और साड़ियाँ पहनते हैं. तमिलनाडु के एक गाँव में हर वर्ष अरवणी काहे जाने वाले किन्नर अरवण की मृत्यु का शोक मानाने के लिये जमा होते हैं. कथा है कि अरवण अर्जुन और उसकी सर्व पत्नी उलूपी का पुत्र था जिसकी बलि चढ़ा कर ही पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हो सकते थे. अरवण ने बलि से पहले शर्त रख दी कि उसकी शादी कर दी जाये. अब कोई स्त्री ऐसे व्यक्ति से शादी के लिये तैयार नहीं हो सकती थी जिसकी मृत्यु निश्चित थी. अंततः कृष्ण ने स्वयं मोहिनी रूप धारण कर उससे शादी की और सुहागरात मनाई. सुबह बलि के बाद मोहिनीरूपी कृष्ण ने विधवा के रूप में विलाप भी किया था.

तंजावुर के अय्यामपेटाई स्थित द्रौपदीअम्मा मंदिर का आकर्षक तेरह फीट उंचा अरवण (चित्र- बालाजी श्रीनिवासन)

महाभारत की कथा में स्त्री रूप में विदा हुए शिखंडी को उसके पिता द्रुपद ने पुरुष की तरह पाला था और उसकी शादी भी कर दी थी. जब उसकी पत्नी को वास्तविकता का पता चला तो वह शिखंडी को छोड़ अपने पिता के घर चली आई. क्रोधित पिता ने द्रुपद के विनाश की चेतावनी दे दी. हताश शिखंडी जंगल में जाकर आत्महत्या का विचार कर रहा था. वहीं एक यक्ष ने उसकी स्थिति पर दया करते हुए रात भर के लिये अपना लिंग उसे दे दिया ताकि वह अपना पुरुषत्व सिद्ध कर सके. उधर यक्ष की इस हरकत से नाराज़ यक्षराज कुबेर ने उसे श्राप दे दिया कि शिखंडी के जीते जी उसे अपना लिंग वापस नहीं मिल पायेगा. यही शिखंडी महाभारत में भीष्म के घायल होने और अंततः उनकी मृत्यु का कारण बना. कथा के अनुसार शिखंडी पिछले जन्म में अम्बा नामक राजकुमारी था जिसका दो बहनों के साथ भीष्म ने अपहरण कर लिया था. भीष्म इन बहनों की शादी शारीरिक रूप से अक्षम अपने अनुज विचित्रवीर्य से करना चाहते थे. अम्बा ने भीष्म को बताया कि उसका प्रेमी है और प्रार्थना की कि उसे मुक्त कर दें. भीष्म ने उसे मुक्त कर दिया लेकिन उसके प्रेमी ने उसे अपनाने से मना कर दिया और उसे वापस विचित्रवीर्य के पास लौटना पड़ा. अब विचित्रवीर्य ने भी उसे अस्वीकार कर दिया. अब अम्बा ने भीष्म के सामने विवाह का निवेदन रखा लेकिन उन्होंने तो आजीवन ब्रह्मचारी रहने व्रत लिया हुआ था. क्रोधित अम्बा ने परशुराम से भीष्म की हत्या करने को कहा लेकिन वह असफल रहे. निराश अम्बा ने शिव की आराधना की और यह वरदान माँगा कि इच्छा मृत्यु का वर पाए भीष्म की मृत्यु का कारण वह बने. शिव ने कहा कि यह अगले जन्म में ही संभव हो सकेगा.

इसी शिखंडी को कृष्ण ने अपने रथ पर आसीन किया और अर्जुन के साथ भीष्म के सामने आ खड़े हुए. भीष्म ने कृष्ण पर युद्ध धर्म के विरुद्ध आचरण का आरोप लगाते हुए एक स्त्री पर वार करने से मना कर अपना धनुष नीचे रख दिया. कृष्ण ने भीष्म को उत्तर दिया कि आपने हमेशा ही अपने द्वारा निर्धारित मानदंडों पर निर्णय लिया है और धर्म की अवहेलना की है. आज भी उन्हीं मानदंडों पर वे शिखंडी को स्त्री बता रहे हैं जिसका पालन उसके पिता ने पुरुष की तरह किया है और उसके पास यक्ष का दिया हुआ पुरुष-लिंग भी है. भीष्म ने फिर भी युद्ध करने से मना कर दिया जिसपर कृष्ण ने शिखंडी और अर्जुन को ललकारा कि वे भीष्म पर वार करें ताकि भेदभाव पर आदृत उनकी मान्यताओं की जगह समावेश को महत्व देने वाले धर्म की स्थापना हो सके.

कत्थक नृत्यांगना अभीना (चित्र: उत्तरिका कुमारन)

शिखंडी समलैंगिकों, किन्नरों आदि समूहों का प्रतीक-व्यक्तित्व है जिन्हें आज ‘क्वियर’ कहा जाता है. जिन प्राचीन संहिताओं में समलैंगिकता को अपराध और किन्नरों को हेय माना गया है उन संहिताओं के व्यापक स्वीकृति के प्रमाण तो इतिहास में नहीं हैं, पर पारंपरिक और पौराणिक साहित्य में ‘क्वियर’ की बड़ी उपस्थिति समाज की सहिष्णुता और सहजता का बड़ा प्रमाण है. यही उपस्थिति भारत के अन्य मतों, पंथों, धर्मों और समुदायों के साहित्य में भी दर्ज़ है. इस तथ्य का अस्वीकार सर्वग्राही और समावेशी भारत की निर्माण-प्रक्रिया की उस राह को अवरुद्ध करना है जिसका संस्कार अर्द्धनारीश्वर की पूजा, सूफ़ी-संतों की वंदना, किन्नरों के आशीर्वाद और आज़ादी की लड़ाई के आदर्शों से उपजे संविधान की पवित्र व्यवस्था से बनता है.

और अंत में एक और कथा महाभारत से. युद्धोपरांत भीष्म के मृत्यु-वरण से पूर्व पांडव उनका आशीर्वाद लेने गए. बातचीत में युधिष्ठिर ने पूछा- पितामह! पुरुष और स्त्री में किसे अधिक यौन सुख प्राप्त होता है? संतान द्वारा माता और पिता कहे जाने से माता और पिता में किसे अधिक कर्णप्रिय लगता है? भीष्म ने उत्तर दिया- राजा भंगाश्वन के अतिरिक्त इन प्रश्नों का उत्तर कोई नहीं जानता. उनकी अनेक अनेक पत्नियाँ और संतानें थीं. इंद्र के श्राप से वह स्त्री बन गया और उसने एक पुरुष से शादी कर संतानों को भी जन्म दिया. इसप्रकार उसके ज्ञान में पति और पत्नी तथा माता और पिता का अनुभव है. वही तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम है.

Advertisements