आर्थिक महाशक्तियां चिल्लर नहीं रखतीं

प्रकाश के रे बरगद के संपादक है.

सुबह मैंने एक मित्र से थोड़ा सैड-सेंटी भाव में चवन्नी की विदाई की चर्चा की. तपाक से उनका जवाब था- तुम्हारे जैसे सिनिकल लोगों की यही दिक्कत है. देश बढ़ रहा है, देश के बढ़ने का दर बढ़ रहा है और तुम चवन्नी के फेर में पड़े हो. बात सही भी है. जहाँ हज़ार करोड़ से नीचे बात करने का फैशन ना हो, वहाँ चवन्नी को लेकर सीरियस होना फज़ूल है. आख़िर कब तक आदमी अपने होने का मतलब यादों के इडीअट बॉक्स में ढूंढें! लेकिन परेशानी तो यह है कि हम उतने व्यवहारिक भी नहीं हो पाए हैं कि सबकुछ आज के सन्दर्भ में ही समझ सकें. ख़ैर, चवन्नी का चलन आज से बंद हो जायेगा. सरकार का कहना है कि ऐसा स्टील की कीमतों के बढ़ने और मुद्रास्फीति की मजबूती के कारण किया जा रहा है.

अब हमें तो अर्थशास्त्र का ज्ञान है नहीं और फिर सरकार कह रही है तो सही ही कह रही होगी. यह बात और है कि प्रशांत भूषण बताते हैं कि चवन्नी तो छोड़िये, सरकार ख़ुद ही लोहे को कौड़ियों के दाम में बेच रही है. इस मसले पर बात को आगे बढ़ाएंगे तो आप को विकास-विरोधी, माओवादी समर्थक, ओल्ड-फैशन मार्क्सवादी भी कहा जा सकता है.

बहरहाल, चवन्नी तो विदा हो रही है लेकिन हमारे संस्कृति के नुक्कड़ों पर उसकी मौज़ूदगी बनी रहेगी. चवन्नी नहीं रहेगी लेकिन चवन्नी-छाप रहेंगे. राजनीति के बारे में चर्चा होगी तो आज़ादी की लड़ाई में चवन्निया मेम्बरी के माध्यम से लोगों को कॉंग्रेस के बैनर के तले इकठ्ठा करने की जुगत की चर्चा ज़रूर होगी. चवन्नी बचा बचा कर सिनेमा जाने का भगत सिंह का जुगाड़ भी बार-बार याद आएगा. बचपन के गुल्लकों में गिरती चवन्नी की झन की आवाज़ इस अपव्ययी समय में भी बची हुई है. और वह चुटकुला भी तो रहेगा जिसमें कहा जाता है कि हद है, यहाँ लोग ऐसे थूकते हैं कि चवन्नी का भ्रम होता है. जावेद अख्तर और अजय ब्रह्मात्मज की चिंताओं में तो कम-से-कम चवन्निया दर्शक बचा रहेगा.

मित्र प्रशांत राज फेसबुक पर लिखते हैं कि ‘दे दे मेरा पांच रुपैया बारह आना…’ अब बस एक गाना भर रह जायेगा. क्या करें, आना, सवैया, पहाड़े में ज़िंदगी का हिसाब लगाने वाला समाज भी तो नहीं रहा. अब तो डिजिटल का ज़माना है जहाँ ‘शून्य’ और ‘एक’ हैं. और फिर हमारी सरकार की ऑफीसियल ज़िद्द है जितना जल्दी हो सके देश की अस्सी प्रतिशत आबादी को शहरी बना देना है. अब शहर में चवन्नी का मतलब क्या है! वो तो हिसाब-किताब की मज़बूरी है नहीं तो अट्ठन्नी भी कभी की गायब हो गयी होती. वैसे उसके दिन भी गिनती के हैं.

आर्थिक महाशक्तियां चिल्लर नहीं रखतीं. खुल्ले के फेर में इस दूकान से उस दूकान चक्कर नहीं लगातीं. खुलेपन के दौर में खुल्ले उम्मीद ना करें. यह बात और है कि आज भी बड़ी आबादी का निपटान खुले में ही होता है. खुलापन एक व्यापक और विचित्र फेनोमेना है. रही बात उनकी जो हमारा भाग्य लिखते-बांचते हैं उनके बाथरूम का नलका चौबीस घंटे के समाचार चैनल की तरह चलना चाहिए. बाकी लोक इंद्र देवता की कृपा के लिये हवन करें और बच-खुचा चिल्लर पुरोहित की थाली में डाल दें.

कैसा रहा होगा वह समाज जो कौड़ियों से अपने धन का हिसाब लगा लेता था! कितना धन था उस समाज के पास? क्या वह दरिद्र था या बहुत धनी? क्या वह भूख से मरता था? क्या क़र्ज़ न चुका पाने के चलते वह ख़ुदकुशी करता था? क्या वह अपने बच्चों को दूध ना दे पाने की स्थिति में देशी शराब देता था जिससे वे सो जाएँ? क्या जमाखोरी, सूदखोरी, मुनाफाखोरी के दर्शन से परिचित था? जोड़ने-घटाने का उसका गणित कैसा था? वह कंजूस या कामचोर था? क्या उस समाज की सांस्कृतिक स्मृति या बच-खुची गंवई अनुभूति हममें से कईयों को इस आधुनिक दुनिया में पूरा-पूरा घुसने नहीं देती? या सच में इस आधुनिक से डरने की ज़रुरत है?

ख़ैर, बात चवन्नी की हो रही थी. मुझे महंगाई का अर्थशास्त्र समझ में नहीं आता. दरअसल मुझे अर्थशास्त्र ही समझ में नहीं आता. चवन्नी को बंद कर दिए जाने से बस मुझे वैसे ही बेचैनी हो रही है जैसे बचपन में कोई हाथ से खिलौना छीन लेता था. बाज़ार में सब्जियों के दाम देख कर गाँव की बाड़ी में लगे हुए टमाटर और लटकी हुईं लौकियाँ दीखने लगती हैं. आलू की खेत की मेढ़ पर आलू को पका कर खाना याद आ जाता है.

पता नहीं, आर्थिक आंकड़ों में क्या है लेकिन यकीन मानिये तब किसान ज़्यादा सुखी था. अब नहीं हैं. बनिए और बिचौलिए तब भी मुनाफा बनाते थे और आज भी बनाते हैं. उत्पादन भी बढ़ा है. तो फिर कहीं तो कुछ और हो रहा है जिसने चवन्नी की कीमत और ज़रुरत दोनों समाप्त कर दी! यह मैं कैसे समझूँ कि प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है और व्यक्ति गरीब हो रहा है? सकल घरेलू उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और देश में अधिकांश लोगों के पास बुनियादी चीज़ें और सुविधाएं नहीं पहुँच रहीं. यह क्या चमत्कार है!

चवन्नी का जाना बचे खुचे का जाना है. हम आज कुछ और गरीब हुए हैं. बस एक चवन्नी छाप उम्मीद है, सो है…

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3 thoughts on “आर्थिक महाशक्तियां चिल्लर नहीं रखतीं

  1. जिसे सरकार मरा हुआ करार दे देती है, वह समाज में तब भी बचा हुआ रहता है- एक गांव दूसरे गांव से पूछता है कितने कोस पर हो, बगैर इस बात की फिक्र किए कि सरकारी किताब में कोस नहीं किलोमीटर चलता है..ऐसा पूछते वक्त क्या गांव याद रखता है कि किलोमीटर में ना सोच सकने के ही कारण वह विदेश मान लिया गया…गांव की तो छोड़ दें- ऐन दिल्ली के बाजारों में जब कोई बुजुर्ग दुकानदार से पूछता है कि आम कितने रुपये धड़ी तो उसे कहां याद रहता है कि सेर-सवासेर के हिसाब को सरकारी किताब में चुके हुए बरसों बीत गए..उस बुजुर्ग और दुकानदार को कहां चिन्ता होती है कि जो अपना हिसाब किलोग्राम में नहीं सोचते उन्हें नए होने को उतावले ये लोग और इनकी सरकारें अवैध करार देती हैं..जिस समय शुद्धता का पैमान यह हो कि आप डॉलर के मुकाबले कितना उठ और गिर रहे हैं- वहां चवन्नी में छुपे हुए आना के भीतर अपने पास-पड़ोस की हकीकत परखने वाला समाज -कैसे कह सकता है कि हम अब भी किसी बात के बारे में यही पूछते हैं कि वह सोलह आने सच है या नहीं…तो चवन्नी गई..और चवन्नी के जाने के साथ एक बार फिर साबित हुआ कि कुछ के जिन्दा रहते ही कैसे इस के पहरुओं ने उसको मुर्दा घोषित किया..जय बोले कफनचोर की..

  2. शायद प्रसंग श्री 420 फिल्म का है… बेरोज़गार राज कपूर और नरगिस चाय पीने जाते हैं लेकिन राज कपूर के पास पैसे कहाँ. नरगिस स्कूल में पढ़ाती हैं..राजकपूर अंगुलियों के इशारों से पूछते हैं…’आपके पास छुट्टा होगा…’ अब हमारे ‘आधुनिक शहरी समाज’ के पास ना छुट्टा है ना छुट्टा रखने की फुरसत!

    आपके लेख से माँ के आँचल की गठरी, और उसमें बंधे कुछ चवन्नी-अठन्नी की याद हो आई…भुज्जा और बरफ खरीदने के लिए हमारी जिद और आखिर चवन्नी पाकर खुश होना. अच्छा लगा आलेख. शुक्रिया.

  3. …. चवन्नी को बंद कर दिए जाने से बस वैसे ही बेचैनी हो रही है जैसे बचपन में कोई हाथ से खिलौना छीन लेता था. बाज़ार में सब्जियों के दाम देख कर गाँव की बाड़ी में लगे हुए टमाटर और लटकी हुईं लौकियाँ दीखने लगती हैं. आलू की खेत की मेढ़ पर आलू को पका कर खाना याद आ जाता है. पता नहीं, आर्थिक आंकड़ों में क्या है लेकिन यकीन मानिये तब किसान ज़्यादा सुखी था. अब नहीं हैं !

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