अब सालेह की बारी

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

जहां तानाशाही सच है, वहां क्रांति जनता का हक़ है. -विक्टर ह्यूगो

बीते महीनों में दो मज़बूत तानाशाहों को भागने पर मजबूर कर चुकी अरब की अवाम अब बाकियों के ख़िलाफ़ लड़ रही है. कहीं यह लड़ाई दीये की लौ के मानिंद मद्धम है तो कहीं ज्वालामुखी की तरह भभक रही है. फ़रवरी के आखिरी दिनों में शुरू हुई यमन की क्रांति तीन दशकों से राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह को लगभग मौत के घाट उतार चुकी है और वह अपने संरक्षक सऊदी अरब के शाह के उसी हस्पताल में ईलाज करा रहे हैं जहाँ ट्युनिसिया के भागे तानाशाह बेन अली भर्ती हैं. अली सालेह की गैरमौजूदगी में शासन का जिम्मा उप-राष्ट्रपति अब्दो रबू हादी संभाल रहे हैं. हादी पर मजहबी नेताओं, विपक्षी दलों और सालेह-विरोधी युवा प्रदर्शनकारियों की तरफ से ज़बरदस्त दबाव है कि वह एक अंतरिम सरकार का गठन करें और साठ दिनों के भीतर नए राष्ट्रपति का चुनाव हो.

शनिवार को सौ से अधिक मजहबी नेताओं और ताकतवर कबीलाई प्रमुखों ने सालेह से पद छोड़ने की मांग करते हुए कहा है कि उन्हें अब राष्ट्रपति बने रहने का कोई अधिकार नहीं है. सालेह तीन जून को राष्ट्रपति आवास पर हुए हमले में बुरी तरह ज़ख्मी हो गए थे और फ़िलहाल वह सऊदी अरब में हैं. हालाँकि सत्ता पर अभी भी उनके परिवार, रिश्तेदारों, विश्वासपात्रों तथा उनके कबीले के लोगों की पकड़ बनी हुई है और ये लोग इस बात पर अड़े हैं कि सालेह स्वस्थ होते ही राष्ट्रपति का पद संभालेंगे.

अली अब्दुल्ला सालेह 1978 में जब राष्ट्रपति बने थे तब यमन दो देश हुआ करता था- उत्तरी यमन, जिसके राष्ट्रपति सालेह बने थे, और दक्षिणी यमन. 1990 में दोनों हिस्सों का एकीकरण हुआ और इसे यमन गणराज्य की संज्ञा दी गयी. उत्तरी यमन 1962 में गणराज्य बन गया था जबकि दक्षिण 1967 तक ब्रिटिश कब्ज़े में रहा और फिर दो दशकों तक वहाँ कम्युनिस्ट शासन रहा.

उल्लेखनीय है कि सैद्धांतिक रूप से यमन अरब प्रायद्वीप में एकमात्र गणराज्य है. इस क्षेत्र के बाक़ी देशों-  सऊदी अरब, ओमान, बहरीन, कुवैत, क़तर, और संयुक्त अरब अमीरात- में राजशाही है. यमन हर तरह से विविधताओं का देश है. कबीलों, मजहबी फिरकों, राजनीतिक विचारधाराओं आदि की बहुलता और आपसी मतभेदों का लाभ उठाकर सालेह लगातार चुनाव जीतते रहे. पहले दक्षिणी यमन में कम्युनिस्टों, और बाद में सऊदी विरोधी हूथी कबीले और अल-क़ायदा की मौजूदगी ने सालेह के लिये सऊदी अरब और अमेरीका की मदद के दरवाज़े भी खुले रखे. इन तीन दशकों में सालेह और उनके मातहतों के असीम अत्याचार और भयानक भ्रष्टाचार ने बहुसंख्यक यमनियों का जीना-दूभर कर दिया है. आधी आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे है तो एक-तिहाई आबादी कुपोषण का शिकार है. युवाओं की तिहाई आबादी बेरोज़गार है. आधी से अधिक आबादी रोज़गार और भरण-पोषण के लिये खेती पर निर्भर है, लेकिन पानी की लगातार होती कमी कुछ ही समय में बड़े भू-भाग को बंजर कर सकती है.

एक अध्ययन के अनुसार, राजधानी साना अगले बीस साल में जलहीन हो सकती है. ऐसी स्थिति में आम यमनी में सालेह और उनके शासन के विरुद्ध असंतोष होना स्वाभाविक ही है. इस असंतोष की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सालेह विरोधियों की ज़मात में वे सब शामिल हैं जो आमतौर से एक-दूसरे के घोर विरोधी हैं- इस्लाह (मुस्लिम ब्रदरहूड से सम्बद्ध), हूथी, यज़ीदी, शिया, सुन्नी, सलाफी, नासिरवादी, दक्षिण के समाजवादी आदि.

वरिष्ठ यमनी पत्रकार अली अल मुक़री कहते हैं कि यमन के इतिहास में कट्टरपंथी मुसलमानों और मार्क्सवादियों में कभी एक नहीं रहा लेकिन आज उन्हें एक साथ साना के ‘परिवर्तन चौक’ पर नमाज़ पढ़ते और ट्युनिसियाई कवि अबू अल क़ासिम अल काशी की कविता ‘जिस दिन लोग जीने की ठान लेते हैं, उस दिन किस्मत को भी उनका साथ देना पड़ता है’ गाते देखा जा सकता है. अल मुक़री के लिये यह माहौल यमनी क्रांति की ताक़त और उसकी भावना का परिचायक है.

अल मुक़री बताते हैं कि यमन के लोग भविष्य को लेकर चिंतित नहीं हैं क्योंकि वह यमन के वर्तमान से बुरा नहीं हो सकता. यमन का भविष्य अली सालेह से यमन की मुक्ति है. लेकिन, जैसा कि मशहूर साहित्यकार अलेक्सी द तॉकविल ने कहा है, उपन्यास के अंत की तरह क्रांति के अंत का निर्धारण क्रांति का सबसे मुश्किल हिस्सा होता है.

एक ओर ट्युनिसिया और मिस्र में कुछ दिनों में ही राष्ट्रपतियों को गड्डी छोड़ देना पड़ा था, वहीं दूसरी ओर लीबिया और यमन में कहीं महीनों से जनता आंदोलनरत है और भयानक दमन का शिकार हो रही है. क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक गणित ने तो बहरीन के अल-खलीफा परिवार के शासन को तो बचा ही लिया है. अली सालेह के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों की शुरुआत के साथ ही खाड़ी के शाहों और यमन के सत्ताधारियों ने क्रांति को बेअसर करने की बिसात बिछा दी थी.

सबसे पहले सालेह ने बेन अली, होस्नी मुबारक, कर्नल गद्दाफ़ी की तर्ज़ पर इस आन्दोलन को कुछ कट्टर इस्लामिक संगठनों और अल क़ायदा की साजिश कहा. फिर अमेरिका और पश्चिमी देशों तथा उसके बाद विदेशी मीडिया के साथ-साथ क़तर-स्थित अल जज़ीरा चैनल पर लोगों को भड़काने का आरोप लगाया. इन पैतरों को बेअसर देख सालेह ने घोषणा की कि वह अपना वर्तमान कार्यकाल पूरा करेंगे यानि 2013 तक पद पर रहेंगे लेकिन फिर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नहीं होंगे. साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि उनका बेटा भी राष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ेगा. परन्तु, इन घोषणाओं से विरोध थमना तो दूर, उसमें और गति आ गयी. धीरे-धीरे, विरोधियों की ज़मात में सालेह के कभी साथी रहे और बाद में उनके पैतरों के शिकार राजनीतिक प्रतिनिधि, पूर्व प्रशासक और सेना अधिकारी भी शामिल होने लगे. सालेह के दमन से भड़के जनाक्रोश को देख कई वर्तमान मंत्री-अधिकारी भी विरोधियों के खेमे में आ गए.

परेशान सालेह ने धमकी दी कि अगर विरोधी नहीं मानें तो देश गृह-युद्ध की आग में झुलसेगा. दिलचस्प बात है कि अगर आप क्रांति का सामना कर रहे अरब के तानाशाहों के बयानों और रणनीति को देखेंगे तो उसमें अजीब समानता देखेंगे. जैसा सालेह कह रहे थे, वैसा ही बेन अली और मुबारक ने कहा और कर्नल गद्दाफ़ी अब भी कह रहे हैं. हालत बिगड़ती देख सालेह ने पड़ोसी शाहों को आवाज़ दी.

उल्लेखनीय है कि अरब क्रांति ने क्षेत्र के सबसे बड़े तानाशाह सऊदी शाह अब्दुल्ला बिन अब्दुल अज़ीज़ और अरब में ज़बरदस्त राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक प्रभाव रखने वाले अमरीका को परेशान कर दिया है. शाह अब्दुल्ला तो अपनी गद्दी पर आसन्न ख़तरे से डरे हुए हैं और अमरीका इस तेज़ बदलाव से. इन दोनों ने सालेह को बचाने की कोशिश के मद्देनज़र कुछ राजनीतिक सुधारों की हिमायत की. इस क्रम में खाड़ी सहयोग परिषद् ने विरोधियों के सामने सुलह का प्रस्ताव भी रखा. इन सारी कोशिशों के दौरान सबसे बड़ी गलती अली सालेह ने यह की कि उन्होंने पुलिस, फ़ौज़ और अपने कबीले द्वारा विरोधियों पर दमन ज़ारी रखा. इससे उनकी बची-खुची विश्वसनीयता भी ख़त्म हो गयी और सुलह के प्रस्ताव भी आधार में लटक गए. इसी बीच सालेह ने यमन के सबसे ताकतवर कबीले अल-अहमर पर कारवाई कर दी. अल-अहमर के लड़ाकों ने राजधानी में भयानक लड़ाई लड़ी और अनेक महत्वपूर्ण सरकारी इमारतों पर कब्ज़ा करते हुए अली सालेह के महल तक पहुँच गए. इसी लड़ाई के दौरान एक मिसाइल हमले में सालेह गंभीर रूप से ज़ख्मी हुए थे.

सालेह के वापस यमन आने को लेकर कई अटकलें हैं. एक अनुमान यह है कि सालेह और उनके समर्थक समय बीतने के साथ विरोध के कुछ मद्धम होने का इंतज़ार कर रहे हैं. दूसरा अनुमान यह है कि ये लोग विरोधियों के साथ एक सम्मानजनक समझौते की फ़िराक़ में हैं ताकि सालेह की हालत बेन अली और होस्नी मुबारक की तरह ना हो. उल्लेखनीय है कि इन दोनों पूर्व राष्ट्रपतियों और उनके नजदीकी सहयोगियों पर उनके देशों में भ्रष्टाचार और हिंसक दमन के आरोपों में अदालती कारवाई शुरू हो चुकी है. ज़ाहिर है कि सालेह ऐसी दुर्गति नहीं चाहेंगे. अन्य अनुमान के मुताबिक सालेह अपनी और अपने सहयोगियों की अकूत सम्पति और यमन में रहने के अधिकार की रक्षा की गारंटी चाहते हैं. कुछ अन्य रिपोटों की मानें तो सालेह अब वापस नहीं आयेंगे और सऊदी अरब तथा अमरीका मसले को तबतक उलझाये रखना चाहते हैं जबतक कोई ऐसा राजनीतिक दल या गठबंधन न उभर कर सामने आ जाये जो उनके मनोनुकूल हो.

(बाएं से) बेन अली, अली सालेह, कर्नल गद्दाफ़ी और होस्नी मुबारक

ख़ैर, इतना तो तय है कि सालेह की सत्ता के दिन अब गिने-चुने हैं. बस, एक औपचारिक घोषणा होनी बाकी है. अरब और उत्तरी अफ़्रीका के अन्य हिस्सों की तरह यमन भी बदलाव की राह पर है जो अनिश्चित है. यह तो समय की कोख में है कि यमन आपसी हिंसा में झुलसेगा या लोकतंत्र की राह में अग्रसर होगा. लेकिन इतना तो तय है, जैसा अल मुक़री कहते हैं, अब सालेह से बुरा कुछ नहीं हो सकता. और फिर अबू अल क़ासिम अल काशी की इस कविता का कुछ तो मतलब होगा- ‘जिस दिन लोग जीने की ठान लेते हैं, उस दिन किस्मत को भी उनका साथ देना पड़ता है’.

Advertisements