जुलिआनो मेर ख़मीस: सौ फ़ीसद फ़लस्तीनी और सौ फ़ीसद यहूदी

प्रकाश के रे बरगद के संपादक हैं.

इज़रायली सेना की एक टुकड़ी किसी नाके पर फलस्तीनियों की गाड़ियों की तलाशी ले रही थी. यह कोई नई बात नहीं थी. जबसे इज़रायल बना है तब से आज तक फलस्तीनियों की गाड़ियों, घरों, दुकानों की छानबीन होती आई है. बिना बात फ़लस्तीनीयों की गिरफ़्तारी, हत्या और उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा के बूते ही तो इज़रायल फ़लस्तीन पर काबिज़ है. लेकिन बरसों पहले उस नाके पर ली जा रही तलाशी के दौरान कुछ ऐसा होना था जिसे फ़लस्तीनी जन-मानस में लोक-गाथा बन कर दर्ज़ होना था. एक नौज़वान सैनिक को उसके अफ़सर ने आदेश दिया कि वह एक बुज़ुर्ग फ़लस्तीनी को कार से घसीट कर बाहर निकाले जो बार-बार कहने के बावज़ूद बाहर नहीं आ रहा था. उस सैनिक ने अफ़सर का आदेश मानने से इंकार ही नहीं किया, बल्कि उससे हाथापाई तक कर डाली. सैनिक को इस हरकत के लिये जेल में डाल दिया गया और उसे फ़ौज़ से निकाल दिया गया. उस नौजवान सैनिक का नाम जुलिआनो मेर ख़मीस था. 1978 की यह घटना फ़लस्तीन के जेनिन शहर में हुई थी. तैंतीस साल बाद उसी जेनिन शहर में पिछले चार अप्रैल को जुलिआनो की गोली मार कर हत्या कर दी गयी. ख़ुद को ‘सौ फ़ीसद फ़लस्तीनी और सौ फ़ीसद यहूदी’ कहने वाले जुलिआनो की कहानी महज़ एक आदमी की कहानी भर नहीं है, वह इज़रायल-फ़लस्तीन की त्रासदी की दास्तान भी है और उससे उबरने की उम्मीद का पैग़ाम भी.

जुलिआनो की पैदाइश 1958 में नाज़रेथ हुई थी. फ़लस्तीनी मूल के ईसाई परिवार के उनके पिता सलिबा ख़मीस कम्युनिस्ट आन्दोलन से जुड़े थे और एक समय इज़रायल की कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव भी रहे थे. जुलिआनो के नाना गिडियन मेर जीव-विज्ञानी थे और उन्हें मलेरिया के ईलाज में योगदान के लिये याद किया जाता है. जुलिआनो की माता आर्ना मेर ने 1948 के अरब-इज़रायली युद्ध में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था लेकिन जल्दी ही वह कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गयीं और इज़रायल द्वारा फलस्तीनियों पर किये जा रहे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने लगीं. 1987 में शुरू हुए पहले इन्तिफ़ादा के दौरान वह फ़लस्तीनी बच्चों के शिक्षा और स्वास्थ्य के लिये काम करने लगीं और जेनिन में आज़ादी थियेटर की स्थापना की. उनके मानवीय कार्यों के लिये 1993 में उन्हें ‘वैकल्पिक नोबेल’ राईट लाईवलीहुड अवार्ड से सम्मानित किया गया था. अगले ही साल कैंसर से आर्ना की मृत्यु हो गयी और 2002 के दूसरे इंतिफादा के दौरान इज़रायली सेना ने उनके थियेटर को ध्वस्त कर दिया. आज़ादी थियेटर को जुलिआनो ने 2006 में फिर से शुरू किया.

जुलिआनो और इज़रायली युवकों की तरह सेना में भर्ती हुए लेकिन जल्दी ही उन्हें वहाँ से निकाल दिया गया. 1980 से उन्होंने फ़िल्म, थियेटर और टेलिविज़न में काम करना शुरू कर दिया और बाद में आज़ादी थियेटर में भी योगदान देने लगे. 2002 में इंतिफादा के दौरान बरबाद हो गए इस थियेटर और उससे जुड़े बच्चों, जो अब युवा हो चुके थे और उनमें से कई इन्तिफ़ादा में मारे गए थे, पर जुलिआनो ने डैनिअल डैनिअल के साथ ‘आर्नाज़ चिल्ड्रेन’ नाम से एक मार्मिक फ़िल्म बनाई. तब तक जुलिआनो इज़रायल और फ़लस्तीन के सबसे लोकप्रिय अदाकारों में शुमार किये जाने लगे थे और उनके पास विदेशों से अभिनय के कई प्रस्ताव भी थे. लेकिन जुलिआनो ने थियेटर को फिर से शुरू करने का निर्णय लिया. फ़लस्तीनियों के बीच काफ़ी लोकप्रिय जुलिआनो को कुछ अतिवादी संगठन पसंद नहीं करते थे और उनके बारे में यह दुष्प्रचार करते रहते थे कि वह इज़रायल द्वारा भेजा हुआ आदमी है. उन्हें लगातार धमकियाँ दी गयीं कि वह एक यहूदी है और उसे थियेटर बंद कर जेनिन से चले जाना चाहिए. लेकिन धुन के पक्के जुलिआनो अपने काम में लगे रहे, हालाँकि उन्हें ख़तरे का अंदेशा था. वह कहते थे कि जेनिन में उन्हें जितना ‘यहूदी’ अब समझा जाता है, उतने यहूदी तो वह कभी नहीं रहे. किन्हीं निराश क्षणों में उन्होंने कहा था कि यह सब करने के बावजूद किसी फ़लस्तीनी की गोली से मरना अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण होगा.

आज जुलिआनो उसी कब्रगाह में दफ़न हैं जहाँ उनकी माँ की कब्र है. माँ-बेटे के लिये आंसू दोनों तरफ बहे. ये दोनों भले आज मर चुके हैं लेकिन वे उस अँधेरे में आज भी उम्मीद को ज़िंदा बनाये हुए हैं. विडम्बना देखिये, जब आर्ना मेर ख़मिस की मौत हुई तो यहूदी रब्बाईयों ने उनके लिये कब्र की ज़मीन देने से मना कर दिया था क्योंकि वह फ़लस्तीन की आज़ादी की तरफ़दार थी. उसका बेटा एक फ़लस्तीनी हत्यारे की गोली का निशाना इसलिए बना कि वह एक यहूदी माँ की संतान था.

जिस रोज़ मेरा क़त्ल होगा
मेरा क़ातिल मेरी जेब में
टिकट पाएगा
एक अमन का, एक खलिहानों और बारिश का
और एक इंसानियत के ज़मीर का
तुमसे इल्तिज़ा है, मेरे क़ातिल, उन्हें बरबाद मत करना
तुमसे इल्तिज़ा है
खड़े मत रहो, जाओ…..

-समीह अल-क़ासिम

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