फिल्मी जुनून के पचास साल

अरविन्द दास

पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीच्यूट ने भारतीय सिनेमा को कई बेहतरीन कलाकार और फिल्मकार दिए. समांतर सिनेमा का तो जैसे वह सूत्रधार ही रहा है. तकनीक के क्षेत्र में भी इसका योगदान कम नहीं. पचास साल पूरा करने पर इस संस्थान के सफरनामे का जायजा ले रहे हैं अरविंद दास.

FTII, Pune (photo: Arvind Das)

फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) की फिजा में मानसून की पहली बौछार की खुशबू है. पुणे स्थित इस कैंपस के अंदर पुराने बरगद और आम के पेड़ों की हरियाली लौट आई है. किंवदंती बन चुके आम के पेड़ ‘बोधवृक्ष’ पर बैठी कोयल की बोली एक अलग राग छेड़ती है. इस राग में कई धुन और कई किस्से हैं. सामने प्रभात स्टूडियो से बीच-बीच में, कैमरा! एक्शन! कट! की आवाज मेरे कानों में आती रहती है. इन वादी और प्रतिवादी स्वरों में एक अजीब आकर्षण है.

मेरा मन कई वर्ष पहले की ओर लौट चला है. उस साल गाँव में नाटक नहीं खेला गया था. पुस्तकालय के आहते में बड़े परदे पर एक फिल्म दिखाई गई थी. मैंने भी वह फ़िल्म देखी थी. फ़िल्म का नाम और कथानक याद नहीं, लेकिन उस फ़िल्म में टेढ़-मेढ़े रास्तों से घने जंगलों में भागते घोड़े मेरे सपनों में अब भी दौड़ते हैं. घोड़ों की टाप मेरे कानों में अब भी सुनाई पड़ती है.

समकालीन समय और समाज में शायद ही ऐसा कोई हो जो कभी न कभी सिनेमा के इस जादुई सम्मोहन की गिरफ्त में नहीं आया हो. सिनेमा आधुनिक कला का सबसे बड़ा तिलिस्म है, लेकिन इस विधा को लेकर जो जुनून और दीवानगी भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान में दिखती है वह और कहीं नहीं. एफटीआईआई की दीवारों पर बने चित्रों, पोस्टरों और नारों से यह बात बखूबी झलकती है. “फिल्म के अलावे कुछ भी नहीं,” एफटीआईआई में महज एक नारा नहीं है, बल्कि यहाँ के छात्रों-शिक्षकों के जीवन बन चुका है. पिछले पचास साल में हिंदुस्तानी समाज और सिनेमा ने बहुत कुछ बदलाव देखा, लेकिन ऐसा लगता है कि इस कैंपस में आकर समय ‘स्टिल फोटोग्राफ’ -सा ठहर गया है.

पंडित नेहरू के ख्वाबों की ताबीर इस संस्थान को तत्कालीन सोवियत संघ की राजधानी मास्को स्थित सरगी ग्रासीमोव फिल्म संस्थान की तर्ज पर भारत सरकार ने वर्ष 1960 में जब स्थापित किया तो उसका मूल उद्देश्य भारतीय सिनेमा उद्योग को दक्ष कलाकार और तकनीशियन मुहैया कराना था. वर्ष 1961 से फिल्म शिक्षण-प्रशिक्षण की विधिवत पढ़ाई यहाँ शुरू हुई तो संस्थान अपने उद्देश्य से कहीं आगे जाकर भारतीय सिनेमा जगत का एक अलग अर्थ और भाषा गढ़ने लगा, जो कमोबेश आज भी कायम है. असल में इस संस्थान को रचनात्मक ऊर्जा थाती में मिली, जिसका भरपूर इस्तेमाल यहाँ के छात्रों ने किया.

अमृत मंथन, संत तुकाराम, मानुष जैसी बेहद चर्चित फिल्में देने वाले प्रभात स्टूडियो का बन-बनाया लोकेशन, आधुनिक साज-सज्जा वाला ध्वनी उपकरण, संपादन की तकनीक वगैरह संस्थान को विरासत में मिली. वर्ष 1953 में जब प्रभात स्टूडियो बंद हुआ तो भारत सरकार ने इसे खरीद लिया और फिल्म संस्थान के रूप में तब्दील करने का निश्चय किया. पुराने छात्रों ने अपनी फिल्में प्रभात स्टूडियो में मौजूद इन्हीं तकनीक और लोकेशन के सहारे बनाई.

शुरूआती दिनों से ही इस संस्थान में रचनात्मक स्वतंत्रता ऐसी थी कि वह छात्रों को अलग रास्ता चुनने और अपनी पहचान खुद बनाने के लिए प्रेरित करती रही. दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित मलयालम फिल्मों के निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन बताते हैं, “कालेज के दिनों में मेरी अभिरुचि नाटकों में थी. मैंने फिल्म के बारे में कभी नहीं सोचा था. जब मैंने फिल्म संस्थान में वर्ष 1962 में दाखिला लिया वहाँ देश-विदेश की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों को देख पाया. मुझे लगा कि यही मेरा क्षेत्र है जिसमें मैं खुद को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर सकता हूँ.”

संस्थान को ऋत्विक घटक, भाष्कर चंद्रावरकर और सतीश बहादुर जैसे मंजे निर्देशक-अध्येता शुरूआती दौर में मिले. असमिया फिल्मों के चर्चित निर्देशक जानू बरुआ बताते हैं, “मैं जिंदगी में पहली बार ऐसे आदमी (ऋत्विक घटक) से मिला जिसके लिए खाना-पीना, सोना, उठना-बैठना सब कुछ सिनेमा था. हमें प्रोफेसर सतीश बहादुर ने सिखाया कि सिनेमा मनोरंजन से आगे भी बहुत कुछ है. संस्थान में आने से पहले मैं फिल्म के बारे में कुछ भी नहीं जानता था.” ऋत्विक घटक के बिना इस संस्थान के बारे में कोई भी बात अधूरी रहेगी. वर्षों बाद आज भी उनकी उपस्थिति कैंपस के अंदर महसूस की जा सकती है. वर्ष 1964-65 में ऋत्विक घटक संस्थान में उप प्राचार्य के रूप में आए और उन्होंने भारतीय सिनेमा की एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया. 70 के दशक में व्यावसायिक फिल्मों से अलग समांतर सिनेमा की धारा को पुष्ट करने वाले अडूर गोपालकृष्णन, मणि कौल, और कुमार साहनी खुद को ‘ ऋत्विक घटक की संतान ’ कहलाने में फक्र महसूस करते हैं.

हते हैं प्रतिभाएँ अक्सर अराजकता लिए हुए होती है. ऋत्विक घटक एक ऐसी ही प्रतिभा थे. एक बार फिल्म निर्देशक सईद मिर्जा ने उनसे पूछा कि आपकी फिल्मों का प्रेरणास्रोत क्या है? उनका जवाब था, एक पॉकेट में शराब की बोतल दूसरे में बच्चों जैसी संवेदनशीलता. अराजकता उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा भले रही हो, पर उनकी फिल्मों और शिक्षण से वह कोसो दूर रही. फिल्म निर्देशक और अध्येता अरूण खोपकर ऋत्विक घटक के साथ बिताए रसरंजन की शामों को याद करते हुए कहते हैं, “उपनिषद का एक मतलब गुरू के नजदीक या उसके पैरों के पास बैठना होता है. हमने बोधवृक्ष के नीचे ऋत्विक दा के साथ बैठकर दुनिया और सिनेमा के बारे में बहुत कुछ सीखा. वे उपनिषैदिक गुरू थे.” मणि कौल कहते हैं, “अब भी मैं ऋत्विक दा से बहुत कुछ सीखता हूँ. उन्होंने मुझे नवयथार्थवादी धारा से बाहर निकाला.” वर्षों तक भारतीय फिल्म अध्येताओं और सिनेप्रेमियों की नज़र से ओझल रहने वाले भारतीय सिनेमा के इस मनीषी के सम्मान में स्वर्ण जयंती वर्ष में संस्थान ने उनके नाम पर एक अकादमिक पीठ स्थापित करने का निर्णय लिया है.

भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के एक विभाग के रूप में जब इस संस्थान को स्थापित किया गया तब शुरूआत में निर्देशन, सिनेमैटोग्राफी, ऑडियोग्राफी और फिल्म संपादन में प्रशिक्षण दी जाती थी. स्थापना के दो वर्ष के बाद यहाँ पर अभिनय में प्रशिक्षण की भी शुरूआत हुई, लेकिन दूसरे विभागों के साथ सामंजस्य के अभाव में और आपसी विवाद के चलते इसे वर्ष 1976 में बंद कर दिया गया. तब तक जया भादुड़ी, शबाना आजमी, शत्रुघ्न सिन्हा, टाम अल्टर, नसीरूद्दीन शाह, ओमपुरी जैसे अभिनेताओं की एक पूरी खेप तैयार हो चुकी थी. जब वर्ष 1974 में दिल्ली के टेलीविजन प्रशिक्षण केंद्र को इस संस्थान से जोड़ दिया गया तब से यह संस्थान भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान के नाम से जाना जाने लगा है. काफी लंबे समय तक टेलीविजन प्रशिक्षण के तहत मुख्य रूप से भारत सरकार के दूरदर्शन के अधिकारियों और कर्मचारियों को यहाँ पर प्रशिक्षित किया जाता रहा, लेकिन वर्ष 2003 से सामान्य छात्रों के लिए टेलीविजन के विभिन्न आयामों में एक वर्षीय पाठ्यक्रम की शुरूआत की गई. साथ ही समय के साथ हो रहे बदलाव की वजह से संस्थान में पटकथा लेखन और एनीमेशन में शिक्षण-प्रशिक्षण की भी शुरूआत की गई है. हालांकि नए पाठयक्रम और छात्रों की संख्या में बढ़ोतरी से पूरी तरह से आवासीय इस कैंपस में मौजूद मूलभूत सुविधाओं पर दबाव बढ़ा है.

वर्तमान में संस्थान सरकारी उपेक्षा का शिकार दिखता है. यह उपेक्षा छात्र-छात्राओं के लिए हॉस्टलों की कमी, विभन्न विभागों में शिक्षकों की कमी से लेकर फिल्म-टेलीविजन प्रशिक्षण के लिए जरूरी अति आधुनिक तकनीक की अनुपलब्धता में दिखती है. निर्देशन विभाग में महज एक शिक्षक स्थायी हैं. यही हाल कमोबेश, अभिनय और पटकथा लेखन विभाग का भी है. संस्थान के रजिस्टार के राजशेखरन कहते हैं, “हर विभाग में शिक्षकों की कमी है. कोई क्यों आएगा यहाँ. कोई इनसेंटिव, सुविधा नहीं है. यहां पर कई शिक्षक लेक्चरर बन कर आए और लेक्चरर बन कर सेवानिवृत्त भी हुए. कई शिक्षकों ने इस संस्थान को छोड़ कर निजी संस्थान ज्वॉइन कर लिया है. आज जो शिक्षक हैं यहाँ वह अंतिम पीढ़ी के हैं जिन्हें संस्थान से जुड़ाव है. इसके बाद पता नहीं क्या होगा.”

असल में इतने साल बाद भी यहाँ का प्रशासन एक सरकारी विभाग की तरह काम करता है. उदारीकरण के इस दौर में भी नौकरशाही रवैया बरकरार है. वर्षों से इस शिक्षण संस्थान के निदेशक के रूप में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ही काम-काज संभाल रहे हैं. वर्ष 1971 में गठित खोसला समिति ने इस संस्थान को एक स्वायत्त संस्थान के रूप में पुनर्गिठत करने और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के साथ संबद्ध करने की मांग की थी लेकिन वह मांग अब तक पूरी नहीं हुई. अलबत्ता वर्ष 1974 में संस्थान को एक स्वायत्त सोसायटी के रूप में गठित किया गया. अब संस्थान से जुड़े सारे निर्णय गवर्निंग काउंसिल के सदस्य मिल कर करते हैं. वर्तमान में कन्नड़ भाषा के प्रसिद्ध लेखक यूआर अनंतमूर्ति इस कौंसिल के चेयरमैन है. निर्देशन के छात्र अमन वधान कहते हैं, “एफटीटीआई के इतिहास में पहली बार छात्रों को बाहर किराए के मकान में रहना पड़ रहा है. डिप्लोमा फिल्म बनाने के लिए अपने घर से छात्रों को पैसा लगाना पड़ रहा है.”

संस्थान के निदेशक पंकज राग मूलभूत सुविधाओं की कमी की बात स्वीकार करते हैं, लेकिन उनका कहना है कि संस्थान को भूमंडीलय स्तर पर (ग्लोबल स्कूल) अपग्रेड किया जा रहा है जिसके तहत नए भवन, कक्ष बनाए जाएँगे. लेकिन छात्रों का कहना है सरकार का जोर संस्थान का निजीकरण करने पर है. अब तो प्रशासन ने सभी पाठ्यक्रमों की फीस में बढ़ोतरी कर दी है. अमन कहते हैं, “ ग्लोबल स्कूल में बिजनेस मीडिया, ब्राडकास्टिंग जर्नलिज्म, एडवरटाइजिंग की पढ़ाई होगी. यह संस्थान फिल्म-टेलीविजन में शिक्षण-प्रशिक्षण को लेकर जाना जाता है. मीडिया के लिए देश में दूसरे संस्थान हैं, फिर इसकी यहाँ क्या जरूरत है.”

संस्थान के छात्र रहे युवा फिल्म निर्देशक गुरविंदर कहते हैं कि जो कुछ इस संस्थान ने दिया वह अब महज इतिहास बन कर रह गया है. पिछले दो दशक में संस्थान के प्रशिक्षण स्तर, छात्रों के चयन, डिप्लोमा फिल्मों के निर्माण सभी में गिरावट आई है. पहले संस्थान में छात्र बाहरी दुनिया से अनुभव लेकर आते थे. उनकी औसत उम्र 28-30 वर्ष होती थी. अब संस्थान का जोर कालेज से तुरंत निकले स्नातकों को नामांकन देने पर है. वे कहते हैं कि यदि यहाँ के छात्र कुछ अच्छा कर रहे हैं तो अपनी प्रतिभा के बूते, इसमें संस्थान का कोई योगदान नहीं है.

लंबे अरसे से संस्थान से जुड़े रहे प्रोफेसर सुरेश छाबरिया कहते हैं, “उदारीकरण के बाद दुनिया काफी बदल गई है. कला और मौलिकता पर बाजार हावी है. ऐसे में खास कर निर्देशन के छात्रों को वर्तमान में काफी संघर्ष करना पड़ रहा है. हम अपने छात्रों से कहते हैं कि बाहर जाकर रोजी-रोटी के लिए कुछ भी कीजिए, लेकिन यहाँ पर एक कला के रूप में सिनेमा को अच्छी तरह से आत्मसात कर लीजिए.”

कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों में संस्थान के छात्रों ने फिल्म निर्देशन या अभिनय के क्षेत्र में भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ नया आयाम नहीं जोड़ा है. वर्ष 2004 में अभिनय में प्रशिक्षण की फिर से भले ही शुरूआत हुई हो, यह पाठयक्रम अभी तक गति और लय नहीं पकड़ पाया है. हालांकि छात्रों का मानना है कि संस्थान में इस पाठयक्रम का होना जरूरी है. संस्थान की छात्र रह चुकी प्रसिद्ध अभिनेत्री शाबाना आजमी कहती हैं, “मैं हमेशा मानती रही हूँ कि भले ही आपमें अभिनय की प्रतिभा हो, लेकिन उसे धार देने की जरूरत होती है. प्रशिक्षण संस्थान आपमें धार पैदा करता है. एफटीटीआई ने मेरे व्यक्तित्व को सवांरा.”

कैंपस से निकलने पर फिल्मी दुनिया में पूछ बढ़ जाती है, लेकिन लंबे संघर्ष करने के लिए सबको तैयार रहना पड़ता है. अभिनय-निर्देशन के क्षेत्र में यह बात ज्यादा सच है. हालांकि पिछले दशकों में टेलीविजन के क्षेत्र में काफी अवसर बढ़े है जिसका फायदा छात्रों को मिल भी रहा है. ध्वनी संयोजन, कैमरा और संपादन के क्षेत्र में भारतीय फिल्म और टेलीविजन उद्योग में शुरूआती दिनों से ही एफटीटीआई के छात्रों का बोलबाला रहा है.

जब रेसुल पोकुटी को ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ में ध्वनी संयोजन के लिए वर्ष 2009 में ऑस्कर से नवाजा गया तब सबकी नजर एफटीआईआई की ओर गई. वे इस संस्थान के छात्र रह चुके हैं. रेसुल पोकुटी का नाम लेते ही संस्थान के शिक्षकों, छात्रों और कर्मचारियों की आँखें खुशी और गर्व से चमक उठती हैं. भूमंडलीकरण के इस दौर में भारतीय फिल्में भारतीयता की एक पहचान बन चुकी है. देश-विदेश में इस पहचान को पुख्ता करने में निस्संदेह इस संस्थान की प्रमुख भूमिका रही है. लेकिन क्या इसका भी वही हश्र होगा जो आजाद भारत में अन्य शिक्षण संस्थानों का हुआ है?

कीमती संग्रह

सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सिनेमा को संरक्षित करने के उद्देश्य से फिल्म संस्थान की स्थापना के कुछ ही वर्ष बाद 1964 में पुणे स्थित फिल्म संस्थान में ही राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय की स्थापना की गई. अपने आप में देश में यह एक मात्र ऐसा संस्थान है जो फिल्मो के संग्रहण, प्रसार और संरक्षण में जुटा है. वर्ष 1973 तक संग्रहालय का कार्यालय और भवन फिल्म संस्थान के कैंपस में ही था जहाँ पर फिल्मों के रख-रखाव के लिए अनुकूल सुविधा नहीं थी. फिल्मों को बेतरतीब ढंग से एक टीन शेड में, बिना किसी वैज्ञानिक सूझ-बूझ के रखा जाता था. लेकिन वर्ष 1991 से यह संस्थान एफटीआईआई से कुछ फर्लांग की दूरी पर एक अलग भवन में काम कर रहा है जहाँ पर ‘भूमिगत वाल्ट’ का निर्माण कर देश-विदेश की पुरानी और नई फिल्मों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जा रहा है. साथ ही संग्रहालय भवन में फिल्मों के प्रदर्शन के लिए आधुनिक उपकरणों से सज्जित एक थिएटर है, जहाँ पर समय- समय पर एफटीआईआई के छात्रों के लिए फिल्मों का प्रदर्शन, फिल्म समारोह होता रहता है.अब तक संग्रहालय में देश-विदेश की क़रीब छह हज़ार पाँच सौ फिल्में संग्रहित हैं. टाइटल हैं. इनमें फीचर, डॉक्यूमेंट्री और एनिमेशन फिल्में शामिल हैं.

भारत में हर साल करीब 1000 फिल्में बन रही है, इस लिहाज से यह संग्रहण बेहद कम है. संग्रहालय के निदेशक विजय जाधव कहते हैं, “भारतीय फिल्म उद्योग से जिस तरह के सहयोग की अपेक्षा की जा रही है वह नहीं मिल रही है. अभी हमारा जोर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्मों, सामाजिक मूल्यों, नैतिक विषयों को लेकर बनने वाली फिल्मों पर ज्यादा है.” पिछले दो वर्षों से संग्रहालय में फिल्मों, पोस्टर, पैंफलेट को डिजिटल रूप में बदलने की प्रक्रिया शुरू की गई है.

पिछले 35 साल से संग्रहालय एफटीआईआई के साथ मिलकर सिने प्रेमियों, पत्रकारों और फिल्म अध्येताओं के लिए हर साल मई-जून में एक महीने की अवधि का फिल्म एप्रीसिएशन पाठयक्रम का आयोजन पुणे स्थित एफटीटीआई कैंपस में करता रहा है. पाठयक्रम के संयोजक प्रोफेसर सुरेश छाबरिया कहते हैं, “दुनिया में अपने आप में यह अनूठा कोर्स है जिसमें हम सिनेमा के इतिहास, सिनेमा के सिद्धांत, सिनेमा की भाषा और आधुनिक कला के एक माध्यम के रूप में इसके प्रभाव और कला के अन्य माध्यमों से सिनेमा के रिश्ते से प्रतिभागियों को अवगत कराते हैं. साथ ही देश-विदेश की दुर्लभ फिल्मों का प्रदर्शन और परिचर्चा इस पाठयक्रम का महत्वपूर्ण भाग है.”


एफटीआईआई के निदेशक पंकज राग से बातचीत
‘आजादी और माहौल देते हैं’

एफटीआईआई की स्वर्ण जयंती किस रूप में मनाई जा रही है?

हमने मार्च में तीन दिनों का एक कार्यक्रम किया था जिसमें पहले बैच के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों का सम्मान किया गया. संस्थान से प्रकाशित होने वाली ‘लेंस साइट’ पत्रिका के विशेष अंक का विमोचन किया गया. आगे कई योजनाएँ हैं. अगस्त महीने में हम ‘सांप्रदायिकता के विरुद्ध सिनेमा’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन करेंगे, साथ ही कई अन्य विषयों पर भी संगोष्ठी की योजना है. सितंबर महीने में पहली बार अंतराष्ट्रीय छात्र फिल्म समारोह का आयोजन किया जाएगा साथ ही एफटीआईआई के इस ऐतिहासिक सफर पर एक किताब भी प्रकाशित की जाएगी.

पचास साल के इस सफर को आप किस रूप में देखते हैं?

इस संस्थान ने भारतीय सिनेमा जगत को समांतर सिनेमा की एक अलग धारा दी. यह एक बड़ा योगदान है. संस्थान ने भारतीय सिनेमा को अलग विधा दी जो व्यावसायिक नहीं थी. निर्देशन, अभिनय, संपादन, कैमरा, ध्वनी पाठ्यक्रम के छात्रों ने अपने ढंग से भारतीय फिल्म जगत को संमृद्ध किया है और लगातार कर रहे हैं. संस्थान के छात्र रहे रेसुल पोकुट्टी को जब पिछले वर्ष फिल्म ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ में ध्वनी संयोजन के लिए ऑस्कर दिया गया तब हमारे लिए यह गौरव का क्षण था. वर्तमान में कला और व्यावसायिक फिल्मों का विभाजन खत्म हो चुका है. संस्थान के छात्र इस बदलते समय में अपना रचनात्मक योगदान दे रहे हैं.

एफटीआईआई का माहौल कैसा है?

एफटीआईआई की एक विशिष्ट संस्कृति है. यहाँ पर छात्रों को पूरी आजादी मिलती है, ताकि वे अपनी रचनात्मकता का बेहतरीन इस्तेमाल कर सकें. उन्हें अपनी पसंद की फिल्में बनाने के लिए अनूकूल माहौल मिलता है. इसे हम रचनात्मक स्वंतंत्रता कह सकते हैं. पिछले कुछ सालों में देश के सभी शिक्षण संस्थानों में छात्रों की रूचि पढ़ने में कम हुई है, यह बात इस संस्थान पर भी लागू होती है. हमारी कोशिश है कि छात्रों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए. फिल्मों से जुड़े विषयों पर शोध के लिए हम तीन छात्रवृत्ति इस वर्ष से दे रहे हैं. यह संस्थान के बाहर के शोधार्थी भी इसका लाभ उठा सकते हैं.

संस्थान मूलभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है. ऐसे में इस संस्थान का विस्तार और पुनर्गठन कैसे होगा?

हमने इस संस्थान को एक डीम्ड विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता दिलवाने के लिए आवेदन किया था जो स्वीकृत नहीं हुआ. हमारी कोशिश है कि यहाँ पर छात्रों को जो डिप्लोमा दी जा रही है उसे डिग्री के रूप में स्वीकार किया जाए. संस्थान को हम वैश्विक स्तर पर अपग्रेड कर रहे हैं और योजना आयोग से जिसकी स्वीकृति भी मिल चुकी है. इस योजना के तहत नए स्टूडियो, डिजीटल लैब, कक्षा भवन बनाए जाएँगे. इसमें समय लगेगा. निर्देशन पाठयक्रम में स्थायी शिक्षकों की कमी है, लेकिन गेस्ट फैकल्टी समय-समय पर संस्थान में आकर छात्रों को प्रशिक्षित करते हैं.

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2 thoughts on “फिल्मी जुनून के पचास साल

  1. bahut badhiyan laga, FTII ke 5o barshon ki yatra par par yah niband. Ek wyapak star par humlogon ko yah bhi sawal puchhana hoga ki kyon un saare rashtriya sansthaano ka patan ho raha hai, jisne kai pidhiyon ka nirmaan kiya.

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