सार्कोज़ी, ज़रदारी, दलाली और आतंक

प्रकाश के रे बरगद के संपादक है.

प्रसिद्ध अमरीकी साहित्यकार नैथनियल हव्थोर्न ने लिखा था कि गुज़रा हुआ समय वर्तमान के ऊपर किसी मृत दानव के शरीर की तरह पड़ा होता है. इस बात को आज फ़्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सार्कोज़ी और पकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी से बेहतर कोई महसूस नहीं कर सकता है. 1994 में फ़्रांस और पकिस्तान के बीच हुए पनडुब्बी सौदे में ली गयी और दी गयी दलाली का मसला एक बार फिर दोनों शासनाध्यक्षों की नींद हराम कर रहा है. लक्ज़मबर्ग पुलिस के हालिया रिपोर्ट के मुताबिक सौदे में दलाली का लेन-देन लक्ज़मबर्ग में पंजीकृत दो कंपनियों के मार्फ़त हुआ था और दोनों कम्पनियाँ 1994 में तत्कालीन फ्रांसीसी प्रधानमन्त्री एदवर्द बलादुर और उनके बजट मंत्री निकोलस सार्कोज़ी के सीधे आदेश से बनी थीं. इन कंपनियों के माध्यम से दलाली के धन का एक हिस्सा 1995 के राष्ट्रपति चुनाव में बलादुर के प्रचार में खर्च हुआ जिनकी उम्मीदवारी को सार्कोज़ी का समर्थन हासिल था. इस रिपोर्ट के बाद फ़्रांस की राजनीति में भूचाल आ गया है और विपक्षी समाजवादी खेमे ने उनसे सफाई मांगी है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस ताज़ा झमेले से उबरना सार्कोज़ी के लिये बहुत कठिन होगा जिनकी लोकप्रियता कई कारणों से वैसे भी गिरती जा रही है. हाल के कुछ सर्वेक्षणों की मानें तो राष्ट्रपति की लोकप्रियता का प्रतिशत ३० से नीचे चला गया है.

यह हमारे समय का एक भयानक सच है कि जब भी पाकिस्तानी राजनीति की बात होती है तो उसके साथ भ्रष्टाचार और हिंसा का वीभत्स आयाम भी अनिवार्य रूप से जुड़ा होता है. पनडुब्बी सौदे की इस कहानी में भी ऐसा ही है. 8 मई 2002 को कराची में हुए एक आत्मघाती हमले में 14 लोग मारे गए थे. मरनेवालों में 11 फ्रांसीसी नौसेना के इंजीनियर थे जो फ़्रांस से खरीदी गयी तीन अगोस्ता पनडुब्बियों पर काम कर रहे थे. आतंकी गिरोह अल-क़ायदा पर इस हमले का आरोप लगाया गया और यह घटना भी पकिस्तान में रोज़मर्रा की बात बन चुके आतंवादी हिंसा की सूची में दर्ज़ कर दिया गया. लेकिन मरने वाले फ्रांसीसियों के परिवार ने कुछ समय बाद आरोप लगाया कि इस घटना का सम्बन्ध पनडुब्बी सौदे की दलाली से है और दलाली का ठीक से भुगतान नहीं होने से नाराज़ पकिस्तान के ख़ुफ़िया और सेना के अफसरों ने यह हमला करवाया है. हालाँकि अभी यह साबित नहीं हो सका है, लेकिन पिछले साल से मामले की जांच में जुड़े न्यायाधीश मार्क त्रायीवेदिक ने इस आरोप को गंभीरता से लेते हुए कारवाई शुरू कर दी थी. लक्ज़मबर्ग पुलिस की सहायता इसी प्रक्रिया में ली जा रही है. दरअसल 2007 में ही फ्रांसीसी जाँच अधिकारियों को नौसेना के निर्माण विभाग से ऐसे दस्तावेज़ मिले थे जिसमें यह खुलासा था कि सार्कोज़ी ने बजट मंत्री के तौर पर लक्ज़मबर्ग में हाईन नाम की फर्जी कम्पनी खोलने का निर्देश जारी किया था. इसके साथ ही एक संसदीय समिति भी दलाली मामले की जाँच कर रही है.

अभी तक विभिन्न जांचों से जो कहानी सामने आयी है वह कुछ इस तरह से है. 1994 में फ़्रांस और पाकिस्तान के बीच तीन अगोस्ता पनडुब्बी की खरीद का सौदा हुआ था. इन पनडुब्बियों को फ्रांसीसी नौसेना निर्माण निदेशालय ने तैयार किया था. उस समय बालादुर फ़्रांस के प्रधानमंत्री तथा सार्कोज़ी बजट मंत्री थे. सौदे के समय पकिस्तान में वर्तमान राष्ट्रपति ज़रदारी की पत्नी बेनज़ीर भुट्टो प्रधानमंत्री थीं और ख़ुद ज़रदारी निवेश मंत्री थे. इस सौदे के मुताबिक इन पनडुब्बियों की कीमत 800 मिलियन यूरो (लगभग 4800 करोड़) तय हुई थी. सौदे की मंजूरी के बदले दलालों को 80 मिलियन यूरो (लगभग 480 करोड़) कमीशन दिया गया. फ़्रांसीसी मीडिया के अनुसार इस धन का बटवारा आसिफ अली ज़रदारी के हाथों हुआ था और इसका एक हिस्सा उन दो कंपनियों के खाते में जमा हुआ जिसे लक्ज़मबर्ग में सार्कोज़ी ने पंजीकृत करवाया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री बालादुर 1995 के राष्ट्रपति चुनाव में लड़ना चाहते थे और इसके लिये उन्हें बड़ी रकम की जरुरत थी. इसके लिये उन्होंने सार्कोज़ी के मार्फ़त इस सौदे में दखल दिया और दलाली में से एक बड़ा हिस्सा ले लिया. पड़ताल से यह पता चला है कि ठीक चुनाव से पहले बालादुर के चुनाव कोष में फ़र्ज़ी कंपनियों से पैसा जमा हुआ था. उल्लेखनीय है कि फ़्रांस के कानून में उस समय दलाली देना वैध था, लेकिन दलाली में हिस्सा लेने पर पाबंदी थी. हालांकि फ़्रांस की राजनीति में ऐसे धन का उपयोग हमेशा से होता आ रहा है और अक्सर वहाँ के नेताओं पर घुस खाने का आरोप लगता रहा है. 2000 में हर तरह की दलाली देने पर रोक लगा दी गयी है. बहरहाल, इस चुनाव में बालादुर पराजित हुए और जैक़ शिराक राष्ट्रपति बने. शिराक को बालादुर के चुनाव-प्रचार में इस्तेमाल धन के बारे में अंदाज़ा था और उन्होंने दलाली की बाक़ी रक़म देने पर रोक लगा दी जिससे तथाकथित रूप से क्षुब्ध हो कर पाकिस्तानी सेना के अफ़सरों ने कराची हमला करवाया.

खोज़ी फ्रांसीसी पत्रकारों के अनुसार पकिस्तान की जाँच ब्यूरो को ब्रिटेन के अधिकारियों ने 2001 में ही इस सौदे में की गयी दलाली के बारे में जानकारी दे दी थी जिसमें कहा गया था कि ज़रदारी के स्विस खाते में लेबनानी उद्योगपति अब्दुल रहमान अल असीर ने 1994-95 के दौरान कई बार भारी रक़म जमा की. यह वही लेबनानी है जिसे फ़्रांस ने इस सौदे में एजेंट बनाया था. जब ज़रदारी पहली बार 1988 में मंत्री बने थे तभी से उनपर भ्रष्टाचार के कई संगीन आरोप लगते रहे है. यहाँ तक कि पकिस्तान में उन्हें मिस्टर 10% कहकर बुलाया जाने लगा.

दोनों राष्ट्रपतियों की ओर से इन आरोपों का औपचारिक खंडन किया जा चुका है लेकिन बीते वर्षों में जो तथ्य सामने आए हैं और इन तथ्यों की रौशनी में चल रही जाँच-प्रक्रिया से सार्कोज़ी और ज़रदारी को बेचैनी तो हो ही रही है. इस बेचैनी को उनके प्रवक्ताओं के बयानों में पढ़ा जा सकता है. लेकिन एक कहावत यह भी है कि चोर चोरी भले न करे लेकिन वह हेराफेरी से बाज़ नहीं आता. पाकिस्तानी नौसेना ने जर्मनी से पनडुब्बी खरीदने के लिये सौदा लगभग पक्का कर लिया है. लेकिन ऐसा लग रहा है कि पाकिस्तानी हुकूमत का एक शक्तिशाली तबका इस सौदे को रोकना चाहता है और उसकी कोशिश है कि यह सौदा फ़्रांस से हो. फ्रांसीसी कूटनीति की भी कोशिश है कि पकिस्तान जर्मनी से सौदा न करे. अगर अगोस्ता की दलाली की कहानी में सच्चाई है तो सार्कोज़ी और ज़रदारी की जुगलबंदी एक बार फिर हो सकती है. फ़्रांस में पाकिस्तानी राजदूत के रूप में ज़रदारी के एक विश्वासपात्र किन्तु कनिष्ठ की नियुक्ति क्या यही संकेत देती है?

Advertisements