शशिकांत का खज़ाना

हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध हस्ताक्षर उदय प्रकाश ने शशिकांत पर लिखा यह नोट फेसबुक पर साझा किया है. हम इस नोट को उसके महत्त्व और इन दोनों के प्रति आदर और अनुराग के कारण उनसे पूछे बिना बरगद पर साझा करने की धृष्टता कर रहे हैं.

उदय प्रकाश

परसों रात हिन्दी के अब तक किसी तरह युवा बने रहने वाले पत्रकार और दिल्ली विश्व विद्यालय के वर्षों से अस्थायी अध्यापक (गेस्ट  असिस्टेंट प्रोफ़ेसर) शशिकांत मेरी कार में अपना एक प्लास्टिक का फोल्डर भूल गए थे. उस पीले रंग के सुन्दर से फोल्डर के भीतर दिल्ली विश्व विद्यालय की स्नातक कक्षाओं में ‘हिन्दी-साहित्य’  पढाई जाने वाली एक पाठ्य पुस्तक थी और हिन्दी में सर्वाधिक बिकने वाले अखबार ‘दैनिक भास्कर’ के दिल्ली संस्करण के किसी पन्ने  का एक मुड़ा हुआ पैकेट जैसा कुछ.

शशिकांत को मैं लगभग बारह वर्षों से अधिक समय से जानता हूँ. वे दिल्ली वि. वि. के ‘मानसरोवर छात्रावास’ के एक नीम अँधेरे कमरे में बहुत सारे कागजों और बेतरतीब किताबों के साथ, बहुत अभावों के बीच रह रहे थे. लेकिन कुछ ही मुलाकातों में उनकी ईमानदारी, पारदर्शिता, काम के प्रति लगन और व्यक्तित्व के खुलेपन का मुझे गहरा अहसास होने लगा. एक बात जो उन्हें सबसे अलग करती थी, वह थी उनके अन्दर किसी भी तरह की उन्मादी महत्वाकांक्षा की गैरहाजिरी. ऐसी महत्वाकांक्षा, जो अन्यों के प्रति किसी को निर्दय, तिकड़मी, अफवाहबाज़  और आततायी बना डालती है. शशिकांत की बस एक ही आकांक्षा थी, एक स्थिर-स्थाई नौकरी, हिन्दी विभाग में, किसी कालेज में…या कहीं और भी. ऐसी ‘महत्वाकांक्षा’ शायद हम सब में हुआ करती है. लेकिन आप सब जानते हैं कि हमारे देश में, खासतौर पर ‘हिदी’ से जुड़े किसी संस्थान आदि में नौकरियाँ किसे मिला करती हैं.  

सबसे पहले शशिकांत  भारतीय साहित्य के शिखर कथाकार विजयदान देथा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर साहित्य अकादमी के लिए बनाए जाने वाले ३० मिनट के वृत्तचित्र के निर्माण के दौरान मुझसे जुड़े. अपने काम और फ़िल्म में अपने समर्पित  योगदान की बदौलत उन्होंने हमारी पूरी टीम का दिल जीत लिया. इस फ़िल्म में मेरे कैमरामैन मजहर कामरान और जगदीश गौतम थे. जगदीश गौतम इन दिनों पी-७ टीवी चैनल में हैं और मजहर इसके पहले मेरे साथ कई अन्य वृत्तचित्रों में काम कर चुके थे.  शशिकांत इसके बाद उर्दू साहित्य की महान लेखिका  कुर्तुल-एन हैदर पर बनने वाली, (मज़हर के निर्देशन-निर्माण में ) वृत्तचित्र के साथ जुड़े. 

‘अंकुर’ और ‘सराय’ जैसी देश की प्रमुख गैर सरकारी संस्थाओं के साथ भी वे समूची निष्ठा के साथ काम करते रहे हैं. ‘राष्ट्रीय सहारा’ और ‘भास्कर’ दैनिकों  के सम्पादकीय विभाग में वे कार्यरत रहे. फ्रीलांसिंग की. स्थायी अध्यापक की नौकरी पाने के लिए वे इन पूरे बारह वर्षों तक लगातार हर किसी ‘मठाधीश’ का दरवाज़ा खटखटाते रहे. ‘हिन्दी’ के सबसे प्रख्यात आलोचक के परिवार को, ज़रुरत आ जाने पर उन्होंने अपना खून भी दिया. दिल्ली वि. वि. में एक समय ‘जीनियस’ कहे जाने वाले दीपक सिन्हा की मृत्यु जब कैंसर से हुई, वे दिन रात अस्पताल में, उनके बेड के बगल, कई-कई रात जागते हुए बैठे रहे….! उनके परिजनों के आने तक..और उनके अंतिम संस्कार तक. यह सब कुछ मेरा अपना देखा हुआ सच है. 

वे पी एच. डी. है, विपुल प्रकाशन भण्डार है उनके पास,देश की लगभग हर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. अपनी  मां, बहन, भांजे-भांजियों समेत कई परिजनों का आर्थिक भार वे वर्षों से उठाते रहे हैं.

जब से मैंने उन्हें जाना, तब से आज तक बारह वर्ष बीत गए. वैसे कहा जाता है कि बारह वर्षों का ही एक युग  बना करता है. 

इस एक युग में, जब से मैं उन्हें जानता हूँ, वे हिन्दी में लिख-पढ़ और पढ़ाकर अपना जीवन कई और जिंदगियों की ज़िम्मेदारी उठाते हुए चलाते रहे हैं. अभी तक वे युवा लगते हैं. संघर्षों और निरंतर तनावों ने, भाग-दौड़ ने उन्हें ‘युवा’ बनाए रखा है. 

जहां तक मैं समझता हूँ, यू जी सी द्वारा निर्धारित, शिक्षक होने की सारी अर्हताएं उनके पास हैं. इन वर्षों में यह भी देखा है कि उनकी तुलना में बहुत कम योग्य, बहुत कम प्रतिभाशाली और उनसे बहुत कम उम्र के लोग जो सिर्फ जुगाड़पंथ  की टेक्नालाजी के शातिर हुनरमंद हैं, वे कहीं के कहीं पहुँच चुके हैं. विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों, राज भाषा ‘हिन्दी’ से सम्बंधित बैंकों से कोयला-लोहा खदानों तक के विभागों  से लेकर अखबारों के साहित्यिक पृष्ठों के सम्पादन तक में  स्थायी, मोटी तनख्वाहों के साथ फिट हो चुके हैं. उनके चहरे पर बेतहाशा पीने और बेइंतहा खाने की चिकनाई और चमक है. वही हैं वे अधेड़ होते जाते हिन्दी के उत्तर-इतिहास और उत्तर-लोकतंत्र के ‘कामयाब’ लोग, शशिकांत के समकालीन या उनसे भी बहुत बाद के ‘पोस्ट-पोस्ट-पोस्ट मर्दानिस्ट’ जो अभी भी ‘युवा-आलोचनाएं’ लिख रहे हैं, ‘युवा-कविता-कहानी’ पाठ कर रहे हैं. वे कामयाबियों के सारे चोर-दरवाजों को जानते हैं, सारे शार्ट-कट्स का उन्हें पता है.

शशिकांत

जब बीसवीं शताब्दी ढल रही थी और इक्कीसवीं सदी एक नयी सहस्राब्दी के साथ आ रही थी, तब मैंने ‘पीली छतरी वाली लड़की’ लिखने का जोखिम मोल लिया था. शशिकांत उसके पहले पाठक हुआ करते थे. वही उसकी हर कड़ी को ‘हंस’ के दफ्तर तक पहुंचाया करते थे. 

इसके बाद का किस्सा आप सब जानते हैं. हिन्दी भाषा, जो और कुछ नहीं ब्राह्मणवादी चेतना को अन्यों के दिमाग में प्रक्षेपित करने का एक दो-ढाई सौ साल पुराना औज़ार है, उस भाषा से हम जैसे लोग बे-दखल कर दिए गए. मेरे कई एसाइनमेंट्स निरस्त कर दिए गए, सारे आर्थिक स्रोतों को बंद कर दिया गया. अफवाहों का एक ऐसा तूफ़ान उठ खडा हुआ, जो अभी तक लपटों की तरह कभी कभी कौंध उठता है.

मैं अस्थि-यक्ष्मा (बोन ट्यूबरक्युलोसिस) से पीड़ित हुआ. लगभग ग्यारह महीने बिस्तर पर रहा …और तब यह जाना कि आफीशियल ‘हिन्दी’ कट्टर जातिवादी फासीवादियों का उपनिवेशित इलाका है. इस तत्समी खिचडी संस्कृत में आधुनिकता के पक्ष में कोई भी तर्क वर्जना के दायरे में है. इलेक्ट्रानिक मीडिया, पत्रकारिता, साहित्य और शिक्षा के सारे केंद्र और संस्थान उसी बीज-गणित और रासायनिक सूत्र पर चलते हैं, जिसमें हमारी आज की राजनीति चल रही है. मध्ययुगीन वर्ण-आश्रमवादी आइडियोलाजी. यह ठगी, झूठ, अन्याय और लूट की पुरोहिती भाषा है. यह अपने मूल-चरित्र और व्यावहारिक बनावट में भ्रष्ट और ब्राह्मणवादी है. आधुनिकता के साथ इसका संवाद अनुपस्थित है. यह आधुनिकता से डरे हुए क्रूरता के निरंकुश धार्मिक रंगमंच की भाषा है. क्या अब भी आप यह जानने में असमर्थ हैं कि इसके राष्ट्रवाद, प्रगतिकामी विचारधारा और इसके सेक्युलर दावों की असलियत क्या है? इस भाषा के भीतर कौन है जो इस भाषा के इलाके में कामयाब हो सकता है?

उन्हीं दिनों मैंने शशिकांत को फिराक  साहब का एक शेर सुनाया था- ‘जो कामयाब हैं दुनिया में उनकी क्या कहिये  / है इससे बढ़ के भले आदमी की क्या तौहीन.’

शशिकांत को बहुत पसंद आया था यह शेर, वही शेर, जो लगता नहीं था कि फिराक जैसे महीन-पसंद कवि का लिखा होगा, …और जो मुझे पहले से ही बहुत पसंद था.  

परसों रात वही शशिकांत मेरी कार में पीले रंग का प्लास्टिक का वह सुन्दर फोल्डर छोड़ गए थे. जिसमें दिल्ली वि.वि. के बी.ए. की कक्षाओं में पढाई जाने वाली हिन्दी की किताब थी. ..और ‘दैनिक भास्कर’ के दिल्ली संस्करण का  बहुत जातां से, संभाल कर सहेजा गया एक दुपता-चौपटा,कागज़ था. 

मुझे उत्सुकता हुई कि इसमें आखिर ऐसा क्या छपा है, जिसे इस तरह सुरक्षित-संरक्षित किया गया है. शायद शशिकांत का ही लिखा कुछ होगा.

मैंने उसके पन्नों को धीरे धीरे खोलना शुरू किया. लेकिन प्याज की परतों की तरह वे पन्ने उतरते ही चले जा रहे थे, छिलकों की तरह. मेरी दादी, जो अस्सी पार कर चुकी थीं, उनकी एक मैली-सी कपडे की गठरी में भीतर गठरी, फिर उसके भीतर एक और गठरी..और फिर … उसके अन्दर ..इसके बाद डिब्बी के भीतर डिब्बी….और उसके भीतर एक और….! यह अनंत सिलसिला चलता था…तब जा कर उस ‘फ़ार्म’ या ‘शिल्प’ के अन्दर छुपे मूल -’अंतर्वस्तु’ तक पहुंचा जा सकता था….

तो वह एक लम्बी, थकाऊ-उबाऊ प्रक्रिया थी…हिन्दी के सर्वाधिक प्रसार संख्या वाले ‘दैनिक भास्कर’ के दिल्ली एडीशन यानी ‘राष्ट्रीय संस्करण’ के पन्नों को प्याज के छिलकों की तरह उतारने-छीलने की प्रक्रिया….

और …तब जा कर वह मिला …! वह अद्भुत, मार्मिक, चेतना को हिला देने वाली ‘अंतर-वस्तु’ ….दि आर्गेनिक कंटेंट आफ अ रूलिंग लैंग्वेज़…!!

वह था एक सूखे हुए भरुआ मिर्च के अचार का एक बहुत छोटा-सा टुकडा…!

मैंने अपने आंसुओं के धुंधले-कांपते मद्धिम होते उजाले के बीच यह अंदाजा लगाया कि शशिकांत इस एक चौथाई सूखे मिर्च की अचार के साथ भी उस कालेज के लंच टाइम में घर से, मां के बनाए हुए दो या चार पराठे खा लेते होंगे..उस कालेज में जहां वे अस्थायी तौर पर, बहुत मामूली रकम के साथ , जिसे ‘वेतन’ कहा जाता है, के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिन्दी हैं….

अगली सुबह जब मैंने उन्हें फोन किया और सारा वाकया बताया तो वे हँसे…! इतनी ज़ोरों से उनकी हंसी के ठहाके फोन के उस पार से आ रहे थे…कि…लगा दिल्ली की सारी दीवारें हिल रही होंगी….!!

उनमें दरारें ज़रूर पडी होंगी कल सुबह…!! 

क्या कोई दिल्ली की दीवारों की इन दरारों को देखेगा ?

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