अलविदा ‘थार की लता’

गंगा सहाय मीणा जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में सहायक प्रोफेसर हैं. उनसे gsmeena.jnu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

गंगा सहाय मीणा

इस 21 जुलाई को पश्चिमी राजस्‍थान के मांगणियार नामक दलित समुदाय की माण्‍ड गायिका रुकमा बाई को इस संसार से चुपचाप गए एक साल हो गया. ‘थार की लता’ से नाम से मशहूर रुकमा के निधन के मौके पर राजकीय शोक तो दूर, मुख्‍यधारा के मीडिया में उनकी मृत्‍यु खबर भी नहीं बन सकी. बाजार द्वारा संचालित युग का एक प्रमुख अलिखित नियम है- उस हर व्‍यक्ति और वस्‍तु की उपेक्षा करना जिसका मुनाफे से कोई संबंध नहीं है. रुकमा भी इसी उपेक्षा की शिकार होकर चली गई.

     रुकमा जिस मांगणियार नामक समुदाय में पैदा हुई थी, यह एक मुस्लिम दलित समुदाय हैं जो राजस्थान में भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे बाड़मेर और जैसलमेर जिलों की मरुभूमि में निवास करता है। इनकी कुछ आबादी पाकिस्तान में भी रहती है। पाक के सिन्ध प्रान्त के मिटठी, रोहड़ी, गढरा, थारपारकर, उमरकोट, खिंपरो, सांगड आदि जिलों में मांगणियार जाति के लोग निवास करते हैं। पाक में रह रहे मांगणियार मूलतःबाड मेर-जैसलमेर जिलों के हैं, जो भारत-पाक युद्ध 1965 और 1971 में पलायन कर पाक चले गए। ये वंशानुगत पेशेवर संगीतकारों का समूह है जिनका संगीत अमीर ज़मींदारों और अभिजातों द्वारा पीढ़ियों से प्रोत्साहित किया जाता रहा है। मांगणियार समुदाय के लोक कलाकार मुस्लिम होते हुए भी भक्तिकालीन सूफियों की तर्ज पर अपने अधिकतम गीतों में हिंदू देवी-देवताओं, हिंदू त्योहारों तथा हिन्‍दू घरों की प्रेम कहानियों को अपना विषय बनाते हैं और ‘खमाचा’ अथवा ‘कमयाचा’ नामक एक खास वाद्‍य के प्रयोग करते हैं जो सारंगी से मिलता-जुलता है। इसे घोड़े के बालों से बने गज को इसके तारों पर फ़ेरकर बजाया जाता है।

माँगणियार समुदाय में वैसे तो कई मशहूर लोक कलाकार हुए लेकिन इस समुदाय की रुकमा देवी अपने समुदाय की एकमात्र ख्‍यात महिला कलाकार रही और इन्हें वर्ष २००४ में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा ‘देवी अहिल्या सम्मान’ से पुरस्कृत किया गया। माँगणियार लोक कलाकार मुख्यतः जिन शैलियों को प्रस्तुत करते हैं उनमें ‘माण्‍ड’ सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध है। माण्‍ड लोक संगीत की एक ऐसी शैली है जिसे न तो पूरी तरह राग का दर्जा मिला और न ही इसे पूरी तरह लोक-संगीत कहा जा सकता. यह ठुमरी और गजल से काफी करीब की गायन शैली है. शास्‍त्रीय संगीत के चाहने वालों की बीच भी इसे सम्‍मान प्राप्‍त है. शुरु में इससे जुडे कलाकार राजा तेजाजी, गोगाजी तथा राजा रामदेवजी की गौरव गाथा का बख़ान करते हुए ‘माण्‍ड’ गाया करते थे। पंडित अजय चक्रवर्ती के शोधों के अनुसार मांड के कई रंग होते है, और तक़रीबन सौ तरह की माण्‍डें गाई-बजाई जाती रहीं हैं. कई माण्‍ड गायकों को बडे सम्‍मान मिल चुके हैं, जैसे- अल्‍लाह जिलाई बाई (पद्म श्री 1982 व संगीत नाटक अकादमी 1988), मांगी बाई (संगीत नाटक अकादमी 2008), गवरी बाई (संगीत नाटक अकादमी 1975-76 व 1886)आदि.  मांड शैली का एक लोकगीत जो अत्यधिक लोकप्रिय हुआ, वह है – ‘केसरिया बालम आवो सा, पधारो म्‍हारे देस’। इसकी लोकप्रियता इतनी हुई कि आज यह गीत राजस्थान का प्रतीक बन गया है। यहाँ तक कि कई हिंदी फ़िल्मों में भी इसका खूब प्रयोग हुआ। एक समय ‘केसरिया बालम..’ और रुकमा देवी एक दूसरे के पूरक बन गए.

     पश्चिमी राजस्‍थान के बाढमेर जिले के एक गांव जाणकी में जन्‍मी रुकमा का पूरा जीवन गरीबी में बीता. रुकमा को लोक-संगीत विरासत में मिला. वे लोक गायक बसरा खान और मांड गायिका आसी देवी की संतान थीं. उनकी दादी अकला देवी भी गायिका थीं. पारिवारिक माहौल और स्‍वयं की अटूट रुचि ने रुकमा को लोक गायकी में एक ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया कि पूरा थार आज उन्‍हें गर्व की दृष्टि से देख रहा है. रुकमा दोनों पैरों से विकलांग थीं, लेकिन अपने लक्ष्‍य की प्राप्ति में उन्‍होंने जीवनपर्यंत न तो गरीबी को रोडा बनने दिया, न विकलांगता को. रुकमा देवी ने अपने गांव, जिले, राज्‍य और देश की सीमाएं पार करते हुए लोक गायिकी में अंतर्राष्‍ट्रीय ख्‍याति अर्जित की और मांड जैसी क्षेत्रीय लोक-गायन विधा को वैश्विक पहचान दिलाई. जब रुकमा ढोल की थाप पर ‘केसरिया बालम…’ गाती थीं तो लोक-संगीत प्रेमी भाव विभोर हो जाते थे. जब सुरीली आवाज में इस गीत को गाया जाता है तो उस नायिका की प्रेम संवेदना और विरह वेदना साकार हो उठती है, जिसके प्रियतम परदेस गए हैं और उनके लौट आने की प्रतीक्षा में दिन-रात गिनते-गिनते जिसकी उंगलियों की रेखाएं घिस गई हैं और तन इतना क्षीण हो गया है कि उंगली की अंगूठी से बांह निकल जाती है।

     आजकल जिस तरह से लोक संगीत का फिल्‍मों में दुरुपयोग हो रहा है, रुकमा इसके खिलाफ थी. उनके अनुसार लोकगीतों की भाषा से खिलवाड, उनकी धुन और लय का सायास आधुनिकीकरण और फिल्‍मीकरण करना इनकी मौलिकता को नष्‍ट करता है, इसलिए ऐसा करने से बचना चाहिए. लोगों की संगीत संबंधी अभिरुचि बदल रही है लेकिन फिर भी लोक संगीत के प्रेमियों की कमी नहीं है, इसलिए लोकसंगीत की मौलिकता को बचाए रखना चाहिए.

     अपने साठ बरस के जीवन में रुकमा ने गरीबी की वजह से बहुत कष्‍ट झेले- खासकर अपने अंतिम वर्षों में. उनके पास पुरस्‍कारों और प्रमाण पत्रों की कोई कमी नहीं रही. राष्‍ट्रीय देवी अहिल्‍या सम्‍मान के अलावा रुकमा को सत्‍यति सम्‍मान, भोरुका सम्‍मान, कर्णधार सम्‍मान आदि पुरस्‍कारों और ताम्रपत्र आदि से नवाजा जाता रहा, लेकिन रुकमा के पास जीवनयापन हेतु बुनियादी सुविधाओं का हमेशा अभाव रहा. यह हमारी व्‍यवस्‍था का सच है कि गांवों के जमींदारों और नौकरीपेशा लोगों के नाम निर्धनता सूची में शामिल हैं, लेकिन गरीब, विधवा रुकमा का नाम बीपीएल की चयनित सूची में शामिल नहीं हो सका. उन्‍हें विधवा पेंशन या अन्‍य किसी योजना का लाभ भी नहीं मिल सका. पॉप के जमाने में लोक संगीत की इस महान कलाकार की त्रासद मौत बहुत कुछ कह जाती है. यह लोक संगीत के प्रशंसकों के लिए आत्‍मालोचना का समय है. रुकमा देवी के जाने से माण्‍ड गायन की एक समृद्ध लोक-संगीत परंपरा अवरुद्ध हो गई है.  

     लोक संगीत भौगालिक सीमाएं नहीं मानता. रुकमा तथा अन्‍य मांगणियार लोक गायक लोकगीत-संगीत के जरिए भारत-पाक सीमा का अतिक्रमण करते रहे हैं। इस तरह लोक संगीत की किसी भी परंपरा का अंत होना उस साझी विरासत के लिए खतरे का संकेत है जो इंसान को इंसान से जोडती रही है.

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