कंगाल यूरोप को बेहाल भारत की मदद

आनंद पांडे कॉंग्रेस के छात्र संगठन के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव हैं. उनसे anandpandeymail@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

आनंद पांडे

ऐसे में जब भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा बुरी हालत में हो और दिशा निराशाजनक तब प्रधानमंत्री की आर्थिक चिंता और यूरोप को आर्थिक संकट से उबारने के लिए १० बिलियन का आर्थिक सहयोग देने की घोषणा के दो मतलब होते हैं एक तो यह कि सरकार के पास पैसा बहुत है लेकिन वह मंहगाई से बदहाल जनता को राहत देने को कोई लाभदायक काम नहीं मानती है और दूसरा यह कि भारत के नेता दुनिया में अपनी प्रतिष्ठा के लिए जनता को भूखा रखने में कुछ भी गलत नहीं मानते हैं. यह भी कि जब प्रधानमंत्री एक तरफ भारत की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से उम्मीद लगाने को गैरजरूरी घोषित कर रहे हों और दूसरी तरफ विश्व समुदाय की बड़ी रकम देकर मदद दे रहे हों तब क्या वे यह साबित करना चाहते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था क्या दुनिया की अर्थव्यवस्था से स्वतंत्र और संप्रभु है. बहरहाल, बात प्रधानमंत्री की अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को १० बिलियन अमेरिकी डालर देने की घोषणा पर.

प्रधानमंत्री ने घोषण की है कि भारत अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को १० लाख बिलियन अमेरिकी डालर की आर्थिक सहायता देगा जिससे यूरोपीय देशों की कर्ज की समस्या का समाधान किया जायेगा. मनमोहन सिंह ने यह बताया है यह पैसा मुद्रा कोष के पास जमा रहेगा और जब जरूरत होगी तब इसे ख़र्च किया जायेगा अन्यथा भारतीय रिजर्व के रूप में पड़ा रहेगा. इसी तर्क के सहारे उन्होंने ने विपक्ष के विरोध को गैरज़रूरी बताया है. उनका कहना है कि ऐसा नहीं है कि भारत ही अकेले यूरोप की सहायता करने जा रहा है बल्कि सारे ब्रिक्स देश कुल मिलाकर ७५ बिलियन डालर की रकम दे रहे हैं. इस रकम को मिलाकर ४३० बिलियन अमेरिकी डालर का इंतजाम किया जायेगा जिससे यूरोपीय संघ के देशों को कर्ज के संकट से उबारा जा सके. आजकल पहले देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए निजी कंपनियों को सब कुछ सौंपा जाता है. वे तरह-तरह से दुनियाभर में भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण बढ़ाती हैं,बड़ा -बड़ा आर्थिक लाभ भी दिखाती हैं फिर पता नहीं कब और कैसे दिवालिया हो जाती हैं और फिर शुरू होता है उन्हें बेल आउट करने का काम. सरकारें जनता की मेहनत के पैसे से फिर उन कंपनियों को जिन्दा करती हैं. ऐसा लगता है कि यूरोपीय देशों का आर्थिक संकट ऐसा ही है, जिसे कृत्रिम कहा जा सकता है. 

ब्रिक्स में अंग्रेजी वर्णमाला के ५ वर्ण आते हैं बी आर आई सी और एस. ये पांच देशों के नामों के पहले वर्ण के संकेतक हैं- जिसका पूरा रूप है – ब्राजील, रूस, चीन, इण्डिया, साउथ अफ्रीका. ब्रिक्स का गठन किया गया था तब अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर नज़र रखने वाले प्रेक्षक यह मान रहे थे कि यूरोपीय संघ और यूरो-अमेरिका केन्द्रित अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के बरक्स यह एक नहीं वैश्विक ताकत बनेगा जो दो धुवीय से एक ध्रुवीय हो गयी दुनिया की ताकत को फिर विकेन्द्रित करेगा. क्या यूरोप को आर्थिक मदद देकर ब्रिक्स देश यह साबित करने जा रहे हैं की उनका समय आ गया है. हो सकता है कि ब्रिक्स देशों के शासकों की गर्वीली मानसिकता की पूरी कीमत इन देशों की जनता को ही चुकानी पड़े और दुनिया भर के पूंजीपति मौज उड़ाते रहें.

यह भी हो सकता है कि यूरोपीय संघ को विश्व समुदाय कर्ज के संकट से निकाल पाने में कामयाब हो जाय और भारत की दुनिया में प्रतिष्ठा भी बढ़ जाय लेकिन क्या उन नीतियों को बदलने की जरूरत महसूस होगी जिनकी वजह से जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा लगाकर निजी क्षेत्र के भ्रष्टाचार, चार सौ बीसी और कुप्रबंधन को जिन्दा रखा जाता है और दुनियाभर में पर्यावरण और आर्थिक बराबरी के लिए संकट पैदा किया जाता है. बदले में दुनिया को भूमंडलीकरण इत्यादि मोहक नामों से नए ढंग की गुलामी और साम्राज्यवाद का शिकार बनाया जाता है. 

अंत में एक सवाल कि जिस यूरोप ने पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद फैलाकर संसार के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर अपने को ‘पहली दुनिया’ बनाया और दूसरी, तीसरी दुनिया का नर्क बनाया उसे आर्थिक शक्ति देकर दुनिया को क्या सन्देश दिया जाने वाला है. आखिर ऐसी क्या बात है कि एक मजबूत यूरोप और एक कमजोर यूरोप दोनों दुनिया के लिए कष्टदायक हैं. दोनों की कीमत दुनिया के और देश अदा करें. और क्यों दुनिया को यूरोप का ख्याल पहले करना चाहिए. जाहिर है, साम्राज्यवाद, सांस्कृतिक और बौद्धिक साम्राज्यवाद के सहारे दुनिया को इस तरीके से ढाल दिया गया है कि वह यूरोप के बिना जी ही नहीं सकती है. कम-से-कम आजकल विकास और अर्थशास्त्र के ज्ञानी ऐसा ही मानते हैं और शायद इसी मानसिकता के तहत यह भरी भरकम मदद दी भी जा रही है. क्या इसके लिए और प्रमाण देने की जरूरत है कि यह दुनिया यूरो-अमेरिका केन्द्रित दुनिया बना दी गयी है. जहाँ उन्हीं की चिंताएं और समस्याएं दुनिया की चिंता और समस्याएं बन जाती हैं.

भारत एक जिम्मेदार देश होने के नाते जरूर विश्व समुदाय की जरूरत पड़ने पर मदद करे, ब्रिक्स के अन्य देश भी करें लेकिन जरा यूरोप के इतिहास पर भी नज़र डाल लेते और अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता की आवश्यकता भी महसूस कर लेते तो ज्यादा अच्छा होता.

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